पर्यावरण प्रेम, साहित्य और जनसरोकारों के माध्यम से सुमन जी के बलिदान को किया याद, कवि सोमवारी लाल ‘निशांत’ का भावपूर्ण कविता पाठ
चंबा, टिहरी | सो.ला.सकलानी ‘निशांत’ | 24 जुलाई 2025
स्वतंत्रता संग्राम के महानायक, बलिदानी श्रीदेव सुमन जी की पुण्यतिथि पर चंबा स्थित सुमन स्मारक पर आज एक श्रद्धापूर्ण वातावरण में उन्हें याद किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में नगरवासियों, समाजसेवियों, जनप्रतिनिधियों, साहित्यकारों तथा युवाओं ने भाग लिया।
सुबह से ही लोगों का सुमन स्मारक पहुंचना प्रारंभ हो गया था। नगरपालिका अध्यक्ष शोभनी धनोला, अनेक सभासदों, व्यापार संघ, टैक्सी यूनियन, नगर पालिका परिषद, तथा सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों ने सुमन जी के बलिदान, नैतिक साहस और जन-जागरण की भावना को श्रद्धा से नमन किया।
वृक्षारोपण के माध्यम से दी पर्यावरणीय श्रद्धांजलि
इस अवसर पर टिहरी डैम वन प्रभाग की सुरकंडा रेंज द्वारा वृक्षारोपण किया गया। यह कार्य सुमन जी के विचारों से प्रेरित होकर उनके प्रकृति और सामाजिक न्याय के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
पर्यावरणविद और साहित्यकारों का स्मरण-समर्पण
बीज बचाओ आंदोलन के संस्थापक विजय जड़धारी ने सुमन जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए उन्हें “विश्व का अद्वितीय स्वतंत्रता सेनानी” बताया। उन्होंने कहा कि श्रीदेव सुमन का बलिदान केवल टिहरी नहीं, बल्कि पूरे भारत के युवाओं के लिए प्रेरणा है।
वहीं, साहित्यकार सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’ ने सुमन जी पर आधारित काव्य का भावपूर्ण वाचन कर जनमानस को भाव-विभोर कर दिया। उनकी कविता –
“उठो सुमन तुम आंखें खोलो, देखो! कौन जगाने आए हैं
हे त्रिहरि के महा बलिदानी, टिहरी से जन जननायक आए हैं।”
ने सभी की आंखें नम कर दीं।
सामाजिक सहभागिता और ग्राम जौल की ओर प्रस्थान
कार्यक्रम में संजय सेमवाल, इंद्र सिंह नेगी, उम्मेद सिंह सज्वाण, मारकंडे बडोनी, हरीश बडोनी, मकान सिंह बिष्ट, हरिप्रसाद ममगाईं, जयेंद्र खंडूरी, शिव प्रसाद बहुगुणा, सतीश डबराल सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के पश्चात श्रद्धांजलि यात्रा श्रीदेव सुमन जी के जन्मस्थल ग्राम जौल की ओर प्रस्थान कर गई, जहाँ क्षेत्रीय विधायक किशोर उपाध्याय द्वारा सुमन जी को श्रद्धासुमन अर्पित कर कार्यक्रम में सहभागिता की गई।
निष्कर्ष:
श्रीदेव सुमन जी की पुण्यतिथि न केवल एक बलिदानी को याद करने का दिन है, बल्कि यह वर्तमान पीढ़ी को अपने अधिकारों के लिए सजग रहने, अन्याय के विरुद्ध सत्य की आवाज़ बनने और प्रकृति व जनसरोकारों से जुड़ने की प्रेरणा भी देती है। उनकी स्मृति को जीवंत रखना हमारी ऐतिहासिक और नैतिक जिम्मेदारी है।

