छोटा पर असरदार: पंचायत राजनीति का बड़ा प्रभाव
केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’
सरहद का साक्षी (डिजिटल मीडिया)
टिहरी: 12 अगस्त 2025
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव अक्सर स्थानीय राजनीति के सूक्ष्म, जटिल और निर्णायक रहस्यों का प्रदर्शन करते हैं। इनमें बड़े दलों की रणनीतियाँ, स्थानीय नेतृत्व की पकड़, व्यक्तिगत गठजोड़ और कभी-कभी अप्रत्याशित मोड़ — सब कुछ सामने आता है। टिहरी गढ़वाल के हालिया घटनाक्रम में यही सब दिखाई दिया: पहली बार भाजपा ने आधिकारिक तौर पर एक प्रत्याशी घोषित किया, फिर अचानक उसी समीकरण को पलट दिया — और दूसरी ओर वही पार्टी-समर्थित विधायक/सदस्य (इशिता सजवाण) कहानी को एक नए मोड़ पर ले आईं, अंततः जिले के जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर निर्विरोध या निर्णायकता से उभर आईं। यह पूरा परिदृश्य न केवल स्थानीय सत्ता के समीकरण दिखाता है, बल्कि बड़े दलों की रणनीति, अंदरूनी मतभेद, और ग्रामीण राजनीति में बदलती प्राथमिकताओं का संकेत भी देता है। (Amar Ujala, india today)
घटनाक्रम का संक्षिप्त विवरण (फैक्ट-चेक)
- भाजपा ने प्रारम्भिक रूप से सोना सजवाण को अपना अधिकृत प्रत्याशी घोषित किया था। बाद में पार्टी ने प्रत्याशी परिवर्तन किया और इशिता सजवाण की ओर रुख या उनकी स्थिति ने नई हलचल पैदा की। कुछ रिपोर्टों में बताया गया कि इशिता पहले भाजपा के बैनर तले कोट वार्ड से जिला पंचायत सदस्य के रूप में निर्वाचित भी रही हैं। (Instagram, sarhadkasakshi.com)
- नामांकन प्रक्रिया के दौरान दोनों ही नाम सक्रिय रूप से चर्चित रहे — एक ओर भाजपा समर्थित सोना सजवाण, दूसरी ओर इशिता सजवाण जिनके पीछे संगठन और स्थानीय जनबल दोनों हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स ने बताया कि टिहरी में दोनों के बीच प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा बन रही थी। (Amar Ujala, india today)
- एक ही समय में प्रदेश के कई जिलों में भाजपा समर्थित कई जिला पंचायत अध्यक्ष निर्विरोध चुने गए — इससे एक व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य बनता है कि स्थानीय स्तर पर भाजपा का प्रभाव किस तरह विकसित हो रहा है। (Live Hindustan, Amar Ujala)
(ऊपर के तथ्य स्थानीय समाचार रिपोर्टों पर आधारित हैं; अधिक संदर्भ अंत लेख में दिए गए हैं)। (Amar Ujala, sarhadkasakshi.com)
टिहरी की पंचायत राजनीति: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और बुनियादी घटनाक्रम
टिहरी गढ़वाल — भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण, सामाजिक रूप से मिश्रित और राजनीतिक रूप से सक्रिय — लंबे समय से उत्तराखंड की उन जिलों में रहा है जहाँ ग्रामीण नेतृत्व का अपना जनाधार मजबूत रहा है। जिला पंचायत अध्यक्ष का पद सिर्फ एक प्रतिनिधि पद नहीं; यह विकास निधियों के बंटवारे, स्थानीय पॉलिसी प्राथमिकताओं और ब्लॉक-वार संतुलन को तय करने वाला केंद्र है। पिछले कुछ चुनावों में इस पद ने स्थानीय नेताओं को निरंतर संगठनात्मक और चुनावी शक्ति दी है।
इतिहास से स्पष्ट है कि टिहरी में:
- स्थानीय मुद्दे (सड़क, स्वास्थ्य केन्द्र, शिक्षा, सिंचाई) चुनावी बहस के केंद्र रहे हैं।
- महिला प्रतिनिधित्व की वजह से स्थानीय महिला नेताओं का प्रभाव प्रमुख रहा है।
- दलगत राजनीति के साथ-साथ व्यक्तिगत और पारिवारिक नेटवर्क का असर भी निर्णायक है।
ऐतिहासिक संदर्भ समझने से यह स्पष्ट होता है कि क्यों किसी दल के भीतर प्रत्याशी परिवर्तन से भी स्थानीय समीकरण बड़े असर के साथ बदल जाते हैं: एक प्रत्याशी का अपना जनाधार और स्थानीय समर्थक वर्ग होता है, जो अक्सर दल की आधिकारिक लाइन से भी अधिक प्रभावी हो सकता है। इसीलिए भाजपा जैसे बड़े दल भी स्थानीय समीकरणों के अनुरूप अपने कदम बदलते हैं — पर यह कदम अक्सर आंतरिक विवाद और रणनीतिक निगाहों का परिणाम भी होते हैं।
सोना सजवाण बनाम इशिता सजवाण — दो नेताओं का तुलनात्मक चित्र
यह मुकाबला केवल दो अलग-अलग व्यक्तियों के बीच का नहीं है; यह दो विचार-प्रणालियों, दो नेतृत्व-शैलियों और दो जनसमर्थन मॉडल का टकराव है। नीचे उनकी प्रमुख विशेषताओं का तुलनात्मक विश्लेषण है:
सोना सजवाण — अनुभव और प्रशासनिक पकड़
- दो बार जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकीं — इसका अर्थ: प्रशासनिक अनुभव, योजनाओं के क्रियान्वयन में महारत, और अधिकारियों से काम करवाने का तरीका।
- पारंपरिक जनसंपर्क: ग्राम-स्तर पर व्यक्तिगत उपस्थिति, बुजुर्ग मतदाताओं और स्थानीय हितग्राहियों के साथ लंबे समय के रिश्ते।
- भाजपा द्वारा समर्थित प्रत्याशी के रूप में उनका नामांकन पार्टी की स्थानीय प्राथमिकताओं व संगठनात्मक संतुलन को दर्शाता है। (Amar Ujala, Facebook)
इशिता सजवाण — युवा, धन-जनबल और रणनीतिक फुर्ती
- कोट वार्ड से भाजपा समर्थित जिला पंचायत सदस्य — इसका अर्थ है कि उनके पास पार्टी संगठन का अनुभव भी है और स्थानीय मतदाता आधार भी। (sarhadkasakshi.com, Instagram)
- उन्होंने भाजपा के टिकट की दावेदारी की; टिकट न मिलने पर रणनीति बदली — कांग्रेस के समर्थन के साथ अपना नामांकन कराया (या निर्दलीय के रूप में मैदान में रहीं)। यह पलटाव राजनीतिक साहस और परिश्रम दोनों का संकेत है। (Facebook, india today)
- जन और धन बल में वे कम नहीं — यानी पैठ, संसाधन और कार्यकर्ता उपलब्ध हैं जो निर्णायक हो सकते हैं।
इन दोनों की तुलना यह दिखाती है कि अनुभव और परंपरा बनाम युवा ऊर्जा और राजनीतिक फुर्ती — दोनों के बीच निर्णायक टकराव करंट चुनावी परिदृश्य तय कर सकते हैं।
भाजपा ने प्रत्याशी बदला — क्यों? संभावित कारणों का विश्लेषण
भाजपा द्वारा किसी प्रत्याशी को पहले अधिकृत करना और फिर समीकरण बदलना, स्थानीय राजनीति में कई तरह के संकेत दे सकता है। नीचे उन संभावित कारणों को तार्किक-सूक्ष्म विश्लेषण के रूप में रखा गया है:
संगठनात्मक तालमेल और फीडबैक
बड़े दल अक्सर स्थानीय स्तर के फीडबैक के आधार पर निर्णय बदलते हैं। यदि किसी स्थानिक मतदान या दल के कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया में किसी प्रत्याशी के समर्थन में दिक्कत दिखाई दे, तो पार्टी प्रबंधन जल्दी कदम बदल सकता है। यह चुनावी गणित, वर्ड-ऑन-द-ग्राउंड (ground realities) और बूथ-स्तरीय ताकत का परिणाम है।
आंतरिक दवाब/फैक्टर्स (फैक्शनल दबाव)
कभी-कभी स्थानीय हितग्रुप्स, प्रभावशाली परिवार या सामुदायिक नेतृत्व पार्टी प्रबंधन पर दबाव डालते हैं। यदि कोई वर्चस्वशाली समूह किसी अलग प्रत्याशी की मांग करता है, तो भी दल उम्मीदवार बदल सकता है, ताकि स्थानीय संतुलन बना रहे।
जातीय/क्षेत्रीय समीकरण और वोट-बैंक सुरक्षा
किसी एक प्रत्याशी की वजह से वोट बैंक विभाजित हो रहा हो या खतरे में हो, तो पार्टी दूसरे विकल्प की तरफ जा सकती है। खासकर जब दो संभावित प्रत्याशियों का उपनाम/सामाजिक पृष्ठभूमि समान हो तो वोट बंटवारा खतरनाक हो सकता है — ऐसे में पार्टी रणनीतिक बदलाव कर सकती है।
रणनीतिक टक्कर-खेल (Political Hedging)
कभी-कभी दल ‘हैजर्ड’ लेते हैं — यानी दोनों तरफ़ के नेताओं को सहज रखकर, बाद में जो बेहतर साबित होगा उसी के साथ जाएँ। यह अंदरूनी तौर पर दोहरे दांव जैसा होता है: आधिकारिक तौर पर एक उम्मीदवार, पर जमीन पर किसी और के साथ सौदेबाज़ी। ऐसी स्थिति में अलग-अलग समर्थनों के साथ गठजोड़ बनकर अंतिम नतीजे तय करते हैं।
उम्मीदवार की व्यक्तिगत चुनावी ताकत/दुर्भावना संबंधी समस्याएँ
कभी-कभी भ्रष्टाचार के आरोप, अखंडता या व्यक्तिगत छवि से जुड़ी चिंताएँ भी बदलाव का कारण बनती हैं। यदि कोई स्थानीय लीडर पार्टी के लिए ‘रिस्क’ बनता दिखे, तो पार्टी अपना विकल्प बदल सकती है।
इनमें से कौन सा कारण निर्णायक था — यह स्थानीय सूत्रों और अंदरूनी बैठकों पर निर्भर करता है; मीडिया रिपोर्ट्स ने बदलाव के तथ्य को रिपोर्ट किया है पर पूरी आंतरिक रणनीति सार्वजनिक नहीं हुई। इसलिए निष्कर्ष निकालते समय सावधानी बरती जानी चाहिए। (Amar Ujala, india today)
Backdoor से इशिता के ताऊ वीरेंद्र सिंह सजवाण (पप्पू भाई) का अतुलनीय योगदान
इशिता सजवाण की जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर ऐतिहासिक जीत के पीछे उनके ताऊ, उद्योगपति वीरेंद्र सिंह सजवाण, जिन्हें क्षेत्र में पप्पू भाई के नाम से जाना जाता है, का बड़ा योगदान रहा है। पप्पू भाई अपनी मिलनसार, सरल और सहज छवि के लिए दूर-दूर तक पहचाने जाते हैं। सामाजिक कार्यों और जरूरतमंदों की मदद में उनका हमेशा अग्रणी रहना, उन्हें आम जनता के बीच खास स्थान दिलाता है। क्षेत्र में यह माना जाता है कि जो भी उनकी मदद के लिए गया, वह कभी खाली हाथ नहीं लौटा। इसी भरोसे और सम्मान का असर रहा कि जब उनकी भतीजी इशिता सजवाण चुनाव मैदान में उतरीं, तो जनता ने उन्हें पूरे दिल से समर्थन दिया। नतीजा, कम उम्र में ही इशिता ने टिहरी गढ़वाल जिला पंचायत अध्यक्ष का पद हासिल कर एक नया इतिहास रच दिया।
इशिता की ‘बागियों की जीत’ या निर्विरोध होना — क्या अर्थ है?
मीडिया रिपोर्ट्स और स्थानीय विवरण बताते हैं कि इशिता सजवाण ने कोट वार्ड से भाजपा के बैनर तले जिला पंचायत सदस्य के रूप में जीत हासिल की थी, और बाद में उनके नामांकन/निर्विरोध की स्थिति ने राजनीतिक परिदृश्य बदल दिया। यदि कोई नेता निर्विरोध चुन लिया जाता है, तो उसके निम्नलिखित राजनीतिक संकेत होते हैं:
स्थानीय ताकत का प्रत्यक्ष प्रमाण
निर्विरोध का अर्थ है कि या तो प्रतिद्वंद्वी नहीं था, या प्रतिद्वंद्वी दब गया, या व्यवस्थागत समीकरण इतने स्पष्ट थे कि किसी ने चुनौती नहीं दी। यह स्थानीय प्रभाव, घनिष्ठ नीतिगत गठजोड़ और चुनावी समझौते दर्शाता है। (Live Hindustan, Amar Ujala)
पार्टी-स्तरीय रणनीति का संकेत
यदि निर्विरोध भाजपा समर्थक ने जीता है, तो इसका मतलब पार्टी का संगठन प्रभावी था; पर यदि वही व्यक्ति बाद में किसी अन्य दल के समर्थन से खड़ा होता है, तो संकेत मिलता है कि स्थानीय स्तर पर दलों के बीच तालमेल और समझौते हुए हैं।
संभावित बाद की राजनीति के लिए ‘सॉलिडिटी’
निर्विरोध का आनंद लेने वाला नेता अक्सर आगे के राजनीतिक सौदों में मजबूत स्थिति रखता है — चाहे वह संसाधन मांग हो, या विकास परियोजनाओं में प्राथमिकता।
पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि निर्विरोध चुनाव हमेशा जनाधार की निशानी नहीं होते — कई बार वे ‘बाहर के समझौतों’ और ‘गुजारिशों’ का परिणाम भी होते हैं (जैसे कि किसी प्रभुत्वशाली समूह ने विरोधी को चुनौती नहीं देने के लिए मनाया)। इसलिए निर्विरोध का विश्लेषण सतही न होकर गहन रूप से होना चाहिए।
स्थानीय गठबन्धन, क्रॉस-वोटिंग और ‘सदस्य-निर्भर’ चुनावी गणित
जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव सीधे जनता के हाथ में नहीं होता; यह चुने गए जिला पंचायत सदस्यों के मत से तय होता है। ऐसे चुनावों में अक्सर यह देखा गया है कि:
- प्रत्याशी सदस्यों के व्यक्तिगत रिश्तों, वादों और भविष्य के सौदों पर निर्भर रहते हैं।
- बड़ी संख्या में क्रॉस-वोटिंग होती है — जहाँ पार्टी लाइन से हटकर सदस्य व्यक्तिगत लाभ, दबाव या रिश्ता देखकर वोट करते हैं।
टिहरी की स्थिति में, जहां दोनों ही प्रत्याशी—सोना और इशिता—के पास अपने-अपने समर्थक सदस्य हैं, यही सदस्य अंततः अध्यक्ष का चुनाव तय करते। यदि किसी दल ने सदस्यों के बीच प्रभावी लबिंग और समझौते कर लिए, तो परिणाम उसी अनुरूप होंगे।
यह बात इस चुनाव को केवल ‘जनमत’ से नहीं बल्कि ‘राजनीतिक सौदेबाजी’ के खेल में बदल देती है — और वहाँ उम्मीदवारों की रणनीति, धन/जनबल, और व्यक्तिगत समझौता योग्यता निर्णायक होती है।
पार्टी-धार्मिक/सामुदायिक-आश्रित समीकरण का प्रभाव
टिहरी जैसे पहाड़ी जिलों में समाजिक-धार्मिक और पारिवारिक संबंध चुनावी समीकरण में निर्णायक हो सकते हैं। उप-जातीय और सामुदायिक गठजोड़ कई बार दलगत समर्थनों से ज्यादा ताकतवर साबित होते हैं। यदि दोनों उम्मीदवारों का सांस्कृतिक/सामाजिक पृष्ठभूमि समान हो (जैसे एक ही कुल/समुदाय से आना), तो वोट विभाजन का जोखिम बढ़ जाता है — और दल ऐसे समय में किसी ऐसे फैसले की ओर आगे बढ़ सकते हैं जो ‘वोट बंटवारे’ को रोके। यह भी भाजपा द्वारा प्रत्याशी बदलने का एक संभावित तर्क हो सकता है: वोट बंटवारे के कारण किसी तीसरे उम्मीदवार को फायदा न हो। पर सटीक कारणों का पता तभी चलेगा जब स्थानीय वोटिंग पैटर्न और वार्ड-वार समीकरण मिले।
मीडिया, सोशल मीडिया और स्थानीय जनभावना का रोल
हाल के चुनावों में सोशल मीडिया और स्थानीय डिजिटल न्यूज़ पोर्टलों की भूमिका बहुत बड़ी बन चुकी है। टिहरी में भी फेसबुक पोस्ट, व्हाट्सएप ग्रुप्स और क्षेत्रीय वेब पोर्टल्स ने खबरों को तेज़ी से फैलाया — और इसी त्वरित सूचना के कारण राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति बदलने की आवश्यकता महसूस हुई होगी।
- उदाहरण: स्थानीय मीडिया ने प्रत्याशी परिवर्तन की खबर तेज़ी से उठाई और समर्थन/विरोध की प्रतिक्रियाओं को रिपोर्ट किया। (Amar Ujala, sarhadkasakshi.com)
- सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर समर्थक-प्रतिक्रियाएं और स्थानीय नेताओं के पोस्ट्स ने परिस्थितियों को और उग्र भी कर दिया होगा, जिससे पार्टी हाईकमान को हस्तक्षेप करना पड़ा। (Facebook)
साथ ही, मीडिया कवरेज ने निर्विरोध और प्रतिस्पर्धी सीटों के प्रति जनधारणा को भी प्रभावित किया — लोग यह देखने लगे कि किसका संगठन मजबूत है और कौन पॉटेंशियल विनर है।
संभावित परिणाम — छोटे व बड़े स्तर पर निहितार्थ
यहाँ कुछ संभावित असर दिए जा रहे हैं, जिनमें स्थानीय, जिलास्तरीय और प्रदेशस्तरीय निहितार्थ शामिल हैं:
स्थानीय स्तर पर
- यदि इशिता निर्विरोध अध्यक्ष बन चुकी हैं, तो उनके पास तत्काल प्रशासनिक और विकास निधियों पर प्रभाव बढ़ेगा। इससे उनके समर्थक वार्ड/ब्लॉक्स को प्राथमिकता मिल सकती है।
- सोना के समर्थक और उनके पुराने गठजोड़ असंतुष्ट तल की राजनीति शुरू कर सकते हैं — पर यदि पार्टी संगठन ने संतुलन बनाया है तो असंतोष दबी रह सकती है।
जिला व ब्लॉक स्तर पर
- जिला पंचायत के निर्णयों में बदलाव देखने को मिल सकता है — नई परियोजनाएँ, शिफ्टिंग ऑफ प्रायोरिटीज़ आदि।
- ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत सदस्यों के साथ तालमेल नए समीकरणों के अनुसार घट-बढ़ सकता है।
प्रदेश स्तर पर
- यदि भाजपा ने कई जिलों में निर्विरोध जीत दर्ज की है, तो इसका मतलब संगठनात्मक मजबूती है — पर टिहरी जैसा केस दिखाता है कि स्थानीय स्तर पर दल के भीतर भी जटिलता हो सकती है। प्रदेश नेतृत्व इन घटनाओं से सीख लेकर कार्यनीति समायोजित करेगा। (Live Hindustan, Amar Ujala)
आलोचनात्मक दृष्टि — लोकतंत्र, जायज उत्तर और पारदर्शिता का सवाल
जब कोई बड़े दल प्रत्याशियों की सूची बदल देता है, और स्थानीय स्तर पर निर्विरोध जैसे नतीजे आते हैं, तब कुछ गंभीर प्रश्न उठते हैं:
- क्या स्थानीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रही?
- क्या दलों के भीतर पारदर्शिता और उचित परामर्श हुआ?
- जब नेता पार्टी बदलते हैं या विभिन्न दलों के समर्थन लेते हैं, तब जनता की प्राथमिकता और विश्वास कैसे प्रभावित होता है?
ये सवाल जरूरी हैं क्योंकि पंचायत लोकतंत्र का आधार सार्वजनिक विश्वास और पारदर्शिता है। यदि स्थानीय लोग यह अनुभव करें कि जीत-विजय के फैसले ‘बंद कमरों’ में तय होते हैं, तो लोकतंत्र की जड़ों को क्षति पहुँच सकती है। इसलिए राजनीतिक दलों, प्रशासन और मीडिया की जिम्मेदारी बनती है कि वे स्थानीय प्रक्रियाओं को जितना संभव हो पारदर्शी बनाएं।
क्या बदला, क्यों बदला, आगे क्या होगा?
क्या बदला?
भाजपा ने प्रारम्भिक अधिकृत प्रत्याशी (सोना सजवाण) और स्थानीय समीकरण बदलकर नई हलचल पैदा की—जिससे इशिता सजवाण का पोजिशन और उनकी राजनीतिक चाल अधिक चर्चित हुई। कुछ इलाकों में निर्विरोध का परिदृश्य भी नजर आया, जिससे यह संकेत मिलता है कि स्थानीय गठबंधन और पार्टी रणनीति निर्णायक रही। (Amar Ujala, sarhadkasakshi.com)
क्यों बदला?
यह कई कारणों का मिश्रण हो सकता है — स्थानीय संगठनात्मक फीडबैक, आंतरिक दबाव, वोट-बैंक संतुलन, और रणनीतिक हैजिंग। पार्टी हाईकमान और स्थानीय नेता दोनों ने अपनी-अपनी प्राथमिकताएँ और रणनीति के चलते यह कदम उठाया होगा। पर सटीक कारण तभी तय हो पाएगा जब अंदरूनी बैठकों और निर्णय-प्रक्रियाओं की जानकारी सार्वजनिक होगी।
आगे क्या होगा?
टिहरी की राजनीति अब एक नए अध्याय में प्रवेश कर चुकी है। अगले कुछ महीनों में:
- जिला पंचायत के निर्णयों के जरिए स्थानीय विकास और राजनीतिक प्रभाव की पटरी साफ़ होगी।
- यदि दोनों पक्षों ने सह-कार्य की नीति अपनाई, तो विकास पर काम आगे बढ़ेगा; नहीं तो स्थानीय टकराव और राजनीतिक प्रतिकूलता भी देखने को मिल सकती है।
- प्रदेश स्तर पर पार्टी संगठन इस अनुभव से समीक्षा करेगा और अगली रणनीति तय करेगा। (Live Hindustan, Amar Ujala)
संदेश और सिफारिशें (Policy / Governance oriented)
- पारदर्शिता बढ़ाएँ: पार्टियों को प्रत्याशी चयन में पारदर्शिता और प्राथमिकताओं का सार्वजनिकरण करना चाहिए, ताकि स्थानीय लोकतांत्रिक भरोसा बना रहे।
- स्थानीय जनभागीदारी: पंचायत स्तर पर निर्णयों में समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए—ताकि निर्विरोध जैसे मामले ‘निर्णायक समझौतों’ न बनें।
- मीडिया और रिपोर्टिंग: क्षेत्रीय मीडिया को निष्पक्ष रिपोर्टिंग जारी रखनी चाहिए और अंदरूनी विवादों की जांच-जाँच से खबरें प्रकाशित करनी चाहिए।
- पार्टी आकलन: पार्टी हाईकमान को स्थानीय फीडबैक प्रणाली मजबूत करनी चाहिए ताकि उम्मीदवारों का निर्णय जमीन पर मजबूत हो।
संदर्भ (चयनित समाचार स्रोत)
- “Tehri News: जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर सोना और इशिता के बीच होगा मुकाबला” — Amar Ujala. (Amar Ujala)
- “Uttarakhand: 12 जिलों में हुआ नामांकन, चार जिपं अध्यक्ष निर्विरोध” — Amar Ujala (Dehradun). (Amar Ujala)
- “जिला पंचायत अध्यक्ष-उपाध्यक्ष पदों के लिए नामांकन संपन्न, इशिता …” — Sarhad Ka Sakshi (आपकी साइट की रिपोर्ट). (sarhadkasakshi.com)
- “भाजपा के चार जिला पंचायत अध्यक्ष निर्विरोध जीते” — Live Hindustan / Hindustan. (Live Hindustan)
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*केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’
सरहद का साक्षी (डिजिटल मीडिया)
