उत्तरायण की इस पावन संक्रांति पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। 🌞🙏
ज्ञान के क्षेत्र में भारत विश्वगुरु रहा है और रहेगा। हमारे ऋषि-मुनियों ने अंतरिक्ष, ग्रह-नक्षत्रों और कालगणना का सूक्ष्मतम ज्ञान प्राप्त कर उसे विश्व को प्रदान किया। सूर्य स्थिर है और पृथ्वी गतिमान—आज का विज्ञान भी इस सत्य को स्वीकार करता है, जिसे भारतीय मनीषियों ने युगों पहले प्रतिपादित किया।
दुर्भाग्यवश, आज हम बिना गहराई में गए, बिना समझे, अपनी-अपनी बात रखने की होड़ में पड़ जाते हैं। पर्व हो या परंपरा—विचार के स्थान पर वाद-विवाद हावी हो जाता है। फिर भी लिखना आवश्यक है, ताकि सत्य और विवेक का दीप बुझने न पाए।
इतिहास साक्षी है—
12 जनवरी 1863 को जन्मे स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन मकर संक्रांति का ही दिन था।
भीष्म पितामह ने शरशय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा कर मकर संक्रांति को देह त्याग किया—तब ईसवी सन् की गणना प्रचलित नहीं थी।
भारतीय मनीषियों की कालगणना में सौर मास और चान्द्र मास का विशेष स्थान है।
सौर वर्ष: 365 दिन 6 घंटे 9 मिनट 10.8 सेकेंड—जहाँ 6 घंटे को लीप वर्ष से समायोजित किया गया, पर शेष सूक्ष्म अंशों के कारण संक्रमण काल में तिथियों का अंतर स्वाभाविक है।
इसी कारण यह आवश्यक नहीं कि हर वर्ष मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही पड़े। पिछले चार दशकों में कई बार 15 जनवरी को भी संक्रांति आई है।
भविष्य में, दीर्घकालीन गणना के अनुसार, यह 16 जनवरी को भी आ सकती है—क्योंकि सूर्य की गति अपरिवर्तनीय है।
चान्द्र मास (लगभग 29 दिन 31 घटी 50 पल 7½ विपल) हर तीसरे वर्ष अधिक मास से संतुलन बनाता है—यह हमारी परंपरा की वैज्ञानिक सुदृढ़ता का प्रमाण है। यह गणना सूक्ष्मतम और शुद्धतम है; अतः हमारा कर्तव्य है कि आने वाली पीढ़ी को इसका सही ज्ञान दें, न कि बिना जानकारी के भ्रम फैलाएँ। पश्चिमी सभ्यता की अंधी नकल किसी भी विषय में उचित नहीं।
आज जब ईमानदारी पर प्रश्नचिह्न लगते दिखते हैं, तब आवश्यकता है देशभक्त, विवेकशील और सत्यनिष्ठ पीढ़ी गढ़ने की—यही भारतीय मनीषियों की परंपरा है।
अस्तु,
मकर संक्रांति एवं षट्तिला एकादशी के पावन अवसर पर ‘सरहद का साक्षी’ परिवार की ओर से आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ।
उत्तरायण के सूर्य का अभिनंदन एवं स्वागत। ☀️🌾
प्रस्तुति: आचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा
