छोटी बग्वाल, नरक चतुर्दशी और रूप चतुर्दशी आज; हनुमज्जन्म महोत्सव की भी विशेष मान्यता
यमदीपदान, अभ्यंग स्नान और दीप प्रज्ज्वलन का है विशेष महत्व; हनुमानजी को तेल-सिंदूर अर्पित कर भक्त करते हैं मंगलकामना
विशेष धार्मिक आलेख | 7 नवंबर 2026
प्रस्तुति: ज्योतिषाचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा
कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को छोटी बग्वाल, नरक चतुर्दशी और रूप चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन धार्मिक परंपराओं में प्रातःकाल अरुणोदय से पूर्व स्नान, यमराज के निमित्त दीपदान, घर के कोने-कोने में दीप प्रज्ज्वलित करने तथा भगवान हनुमान की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि विधि-विधान से पूजा और दीपदान करने से पापों से मुक्ति, आरोग्य, सौंदर्य तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
नरक चतुर्दशी पर अभ्यंग स्नान और यम तर्पण का विधान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी कहा जाता है। इस दिन भगवान यमराज को प्रसन्न करने के लिए अरुणोदय से पूर्व तैलादि का लेपन कर स्नान करने का विधान है। सामान्यतः कार्तिक मास में तेल का लेपन वर्जित माना जाता है, लेकिन इस विशेष तिथि पर इसकी मनाही नहीं बताई गई है।
स्नान के समय अपामार्ग (चिचिड़ा) से निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए शरीर पर जल का प्रोक्षण करने की परंपरा भी बताई गई है—
मंत्र:
सितालोष्ठसमायुक्तं सकण्टकदलान्वितम्।
हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणः पुनः पुनः॥
स्नान के उपरांत यम तर्पण करने का विधान है। धार्मिक विश्वास है कि इससे वर्षभर के पापों का क्षय होता है। इस दिन घर के प्रत्येक कोने में दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा भी प्रचलित है।
यमदीपदान और राजा बलि की पौराणिक कथा
धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान यमराज के निमित्त त्रयोदशी से अमावस्या तक दीपक जलाने का विशेष महत्व है। इसके पीछे राजा बलि और भगवान वामन से जुड़ी पौराणिक कथा प्रचलित है।
कथा के अनुसार राजा बलि की दानशीलता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान वामन ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। तब बलि ने प्रार्थना की कि उनके राज्य में जो भी व्यक्ति इन तीन दिनों तक यमराज के निमित्त दीपदान करे, उसे यम यातना का भय न रहे। साथ ही इन दिनों दीपावली मनाने वाले परिवारों के घर से माता लक्ष्मी कभी विदा न हों।
भगवान श्रीविष्णु ने राजा बलि की प्रार्थना स्वीकार करते हुए उन्हें मनोवांछित वरदान दिया। इसी मान्यता के आधार पर नरक चतुर्दशी और दीपावली के अवसर पर दीपदान की परंपरा का विशेष महत्व माना जाता है।
हनुमज्जन्म महोत्सव की विशेष धार्मिक मान्यता
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमज्जन्म महोत्सव मनाने की भी एक धार्मिक परंपरा है। कतिपय विद्वानों के मतानुसार इसी तिथि को मंगलवार के दिन माता अंजना के उदर से हनुमानजी का जन्म हुआ था। इसलिए हनुमानजी के उपासक इस दिन प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा-अर्चना करते हैं तथा हनुमानजी की जन्मोत्सव परंपरा के अंतर्गत सुंदरकांड का पाठ करते हैं।
हालांकि, कुछ शास्त्रज्ञ हनुमानजी का जन्म चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को मानते हैं। इस विषय में विभिन्न धार्मिक मत प्रचलित हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम और माता सीता ने वानर सेना के सभी सदस्यों को सम्मानपूर्वक विदा किया था। इसी प्रसंग में माता सीता द्वारा हनुमानजी को मोतियों का हार भेंट करने की कथा आती है।
कथा के अनुसार हनुमानजी ने हार के प्रत्येक मोती में राम नाम खोजा, लेकिन जब उन्हें उसमें राम नाम नहीं मिला तो वे संतुष्ट नहीं हुए। तब माता सीता ने अपने ललाट का सिंदूर उन्हें देते हुए उसे धारण करने को कहा और उनके अजर-अमर रहने का आशीर्वाद दिया। इसी मान्यता से इस दिन हनुमानजी को तेल और सिंदूर अर्पित करने की परंपरा भी जोड़ी जाती है।
रूप चतुर्दशी: सौंदर्य और मंगलकामना का पर्व
इस तिथि को रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। धार्मिक परंपरा में इस दिन प्रातःकाल स्नान, स्वच्छता और श्रृंगार का विशेष महत्व है। महिलाएं अपने सौंदर्य और श्रृंगार के साथ घरों की सजावट भी करती हैं। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से स्नान और पूजा करने से रूप, सौभाग्य और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
छोटी बग्वाल का यह पर्व धार्मिक आस्था, दीपदान, स्वच्छता, सौंदर्य और भक्ति का सुंदर संगम है। यमराज के निमित्त दीप प्रज्ज्वलित करने से लेकर भगवान हनुमान की आराधना तक, इस दिन की परंपराएं जीवन में प्रकाश, सकारात्मकता और मंगलकामना का संदेश देती हैं।

