टिहरी लेक फेस्टिवल 2026: ‘छुंईं बात’ में जागीं पुरानी टिहरी की यादें, इतिहास और संघर्ष की कहानियों ने छुए भावनाओं के तार
पहली बार लेक फेस्टिवल में टिहरी के अतीत पर हुआ भावनात्मक विमर्श, इतिहासकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने साझा की स्मृतियां
टिहरी गढ़वाल | 07 मार्च 2026।
टिहरी लेक फेस्टिवल–2026 के दौरान पहली बार आयोजित “टिहरी की छुंईं बात” कार्यक्रम ने लोगों की भावनाओं को गहराई से छू लिया। ऐतिहासिक नगरी टिहरी की स्मृतियों, संघर्षों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी इस अनूठी चर्चा में पुरानी टिहरी के कई अनसुने किस्से और यादें साझा की गईं, जिन्होंने उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया।
कार्यक्रम में टिहरी विधायक किशोर उपाध्याय और जिलाधिकारी नितिका खंडेलवाल सहित इतिहासकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों ने भाग लिया। इस अवसर पर टिहरी के इतिहास, सामाजिक आंदोलनों और सांस्कृतिक परंपराओं पर विस्तार से चर्चा की गई।
सड़क नहीं थी, फिर भी टिहरी में दौड़ी कार
वरिष्ठ पत्रकार और इतिहासकार महीपाल नेगी ने एक रोचक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि उस दौर में टिहरी तक सड़क नहीं थी, लेकिन महाराजा कीर्ति शाह एक बार दूसरे शहर में कार देखकर आए और उन्होंने कार चलाने की इच्छा जताई। इसके बाद कार के अलग-अलग हिस्सों को टिहरी लाया गया और वहीं असेंबल किया गया। इस तरह बिना सड़क के भी टिहरी में महाराजा की कार चलने लगी। इस प्रसंग पर हिमांशु असवाल ने भी अपने विचार साझा किए।
बहुगुणा जी के शब्दों ने भरा संघर्ष का जोश
टिहरी बांध निर्माण के विरोध में चल रहे आंदोलन का जिक्र करते हुए शैलेंद्र नौटियाल ने बताया कि एक समय आंदोलन कमजोर पड़ने लगा था और लोगों का मनोबल टूट रहा था। ऐसे समय में स्वर्गीय सुंदरलाल बहुगुणा ने आंदोलनकारियों से कहा था—“श्रीदेव सुमन की ओर दृष्टि करो।” इस प्रेरक संदेश ने आंदोलनकारियों में नया जोश भर दिया।
प्रतापनगर बसने की ऐतिहासिक कहानी
प्रीति पोखरियाल ने बताया कि उस समय मसूरी अंग्रेजों के नियंत्रण में था और महाराजा प्रताप शाह के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इससे महाराजा के स्वाभिमान को ठेस पहुंची और उन्होंने प्रतापनगर बसाने का निर्णय लिया।
नई टिहरी के उदय की कहानी
दिनेश डोभाल ने नई टिहरी के विकास से जुड़ी स्मृतियों को साझा करते हुए बताया कि 25 जुलाई 1989 को नई टिहरी को नगर के रूप में मान्यता मिली थी। वहीं लक्ष्मी नौडियाल सेमवाल ने वनों की नीलामी के विरोध में चले आंदोलन का भी उल्लेख किया।
टिहरी की रामलीला की परंपरा
कार्यक्रम में अमित पंत और सामाजिक कार्यकर्ता अभिनव थापर ने टिहरी की रामलीला परंपरा को याद किया। बताया गया कि टिहरी में 1952 से रामलीला का मंचन शुरू हुआ था। टिहरी के जलमग्न होने के बाद भी इसकी स्मृतियां जीवित रहीं और अब अभिनव थापर के प्रयासों से देहरादून में हर वर्ष रामलीला का मंचन किया जा रहा है।
झील किनारे लिया गया संकल्प
कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों ने संकल्प लिया कि “छुंईं बात” जैसे कार्यक्रमों को भविष्य में टिहरी लेक फेस्टिवल में और व्यापक स्तर पर आयोजित किया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी को टिहरी के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा जा सके।
इस कार्यक्रम के आयोजन में महीपाल नेगी, अमित पंत, प्रमोद रावत और देवेंद्र नौटियाल की विशेष भूमिका रही। उन्होंने कहा कि यह पहल टिहरी के इतिहास और स्मृतियों को जीवित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

