त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में लोकतंत्र की नींव हिलाती चालें – जब शराब, प्रवासी वोट, और पैसों के सहारे बिकने लगती है गांव की सत्ता।
✍️केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’
सम्पादक, सरहद का साक्षी, डिजिटल मीडिया
भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जिसकी आत्मा गाँवों में बसती है। यहीं से निकलती है वह आवाज़ जो लोकतंत्र को ज़मीनी मजबूती देती है। लेकिन जब उसी जमीनी स्तर के चुनावों—त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली—को शराब, धनबल और बाहरी वोटरों के सहारे प्रदूषित किया जाता है, तब न केवल लोकतंत्र की भावना आहत होती है, बल्कि गांवों के विकास की गति भी अवरुद्ध होती है। यह केवल एक चुनावी समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक, नैतिक और संवैधानिक संकट है, जिसे दूर करना अनिवार्य है।
लोकतंत्र का गांव और पंचायत चुनावों का महत्व
भारत में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था—ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत—लोकतंत्र का आधारस्तम्भ मानी जाती है। यहाँ से नेतृत्व की असली परख होती है और यही लोकतांत्रिक प्रशिक्षण की पाठशाला है। लेकिन जब यह व्यवस्था दूषित होती है तो लोकतंत्र की जड़ें हिल जाती हैं। पंचायत चुनाव में स्थानीय लोगों का मत निर्णायक भूमिका निभाता है, पर जब बाहरी तत्वों का प्रभाव बढ़ जाता है, तब चुनाव की आत्मा समाप्त हो जाती है।
दोहरी वोटर पहचान – कानून की अनदेखी
बहुत से लोग शहरी निकायों में भी वोटर होते हैं और अपने गांव की पंचायत में भी। इस दोहरी भूमिका का फायदा वे तब उठाते हैं, जब चुनाव आते हैं। गांव की राजनीति में उनकी भागीदारी केवल सत्ता प्राप्ति हेतु होती है, न कि विकास की भावना से। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने बार-बार इस पर टिप्पणी की है, परंतु चुनाव आयोग की निष्क्रियता एवं राजनीतिक दबाव इसे और जटिल बनाता है।
यह आवश्यक है कि:
- एक नागरिक का नाम केवल एक ही स्थान की मतदाता सूची में हो।
- वोटर आईडी आधार से अनिवार्य रूप से लिंक हो।
- प्रवासी वोटरों को स्थानीय निर्वाचन में अयोग्य घोषित किया जाए।
बाहरी वोटर और गांव का बिगड़ता राजनीतिक संतुलन
जब किसी गांव में रह रहे स्थानीय मतदाता का मत प्रवासी वोटर के निर्णय के आगे दब जाता है, तब वास्तविक लोकतंत्र खतरे में आ जाता है। अक्सर ऐसे प्रवासी वोटर, जिन्हें गांव की समस्याओं की जानकारी नहीं होती, केवल जातिगत, रिश्तेदारी या पार्टी के नाम पर मतदान कर देते हैं। इससे गांव के जमीनी कार्यकर्ता और समाजसेवी, जो निरंतर जनसेवा में लगे रहते हैं, हार जाते हैं।
चुनाव में शराब – लोकतंत्र पर नशे का असर
पंचायत चुनावों में शराब का प्रचलन कोई नई बात नहीं है, परंतु इसकी भयावहता अब चिंताजनक हो चुकी है।
- शराब के वितरण से चुनावों की पवित्रता नष्ट होती है।
- अनेक परिवारों में आपसी झगड़े, घरेलू हिंसा और सामाजिक अव्यवस्था उत्पन्न होती है।
- प्रत्याशी सत्ता पाने के लिए नैतिक मूल्यों को तिलांजलि दे देते हैं।
सरकारी नियमों के बावजूद कई उम्मीदवार चुनाव पूर्व रातों में शराब का वितरण करते हैं। यह “वोट फॉर व्हिस्की” का खेल बन चुका है, जो लोकतंत्र की आत्मा के साथ मजाक है।
धनबल का प्रदर्शन – लोकतंत्र की खरीद-फरोख्त
पंचायत चुनाव अब जनसेवा से अधिक “पैसे का युद्ध” बनते जा रहे हैं। सम्पन्न प्रत्याशी लाखों रुपये खर्च कर घर-घर जाकर लोगों को उपहार, भोज, नकद वादा और सुविधाएं देकर खरीद लेते हैं।
- गरीब प्रत्याशी को शुरू में ही किनारे कर दिया जाता है।
- विकास के लिए नहीं, व्यक्तिगत हित के लिए चुनाव लड़ा जाता है।
- ग्रामसभाओं में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।
यह सब चुनाव आयोग की निष्क्रियता से और भी बढ़ जाता है। जब तक चुनाव खर्च पर सख्त निगरानी नहीं होगी, तब तक ईमानदार उम्मीदवार हाशिए पर ही रहेंगे।
न्यायपालिका और आयोग की निष्क्रियता पर प्रश्नचिन्ह
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट समय-समय पर दोहरी वोटर आईडी, चुनावों में धनबल और अपराधियों की भागीदारी पर चिंता जता चुके हैं। बावजूद इसके, चुनाव आयोग की निष्क्रियता यह दर्शाती है कि या तो वह राजनीतिक दबाव में है या फिर उसके पास इच्छाशक्ति की कमी है। आयोग के पास आधुनिक तकनीकी उपकरण हैं, फिर भी वह प्रवासी वोटरों की पहचान या शराब की निगरानी में विफल है।
आधार-लिंक्ड वोटिंग और डिजिटल समाधान
आज की डिजिटल दुनिया में हर वोटर की पहचान आधार से जोड़ना नितांत आवश्यक है। इससे:
- दोहरी वोटर आईडी रोकी जा सकती है।
- GPS आधारित लोकेशन वेरिफिकेशन से मतदान क्षेत्र नियंत्रित हो सकता है।
- प्रवासी वोटरों की पहचान स्वतः संभव हो जाएगी।
उत्तराखंड के विशेष संदर्भ में स्थिति
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में प्रवासी वोटिंग की समस्या और भी विकट है। बड़ी संख्या में लोग रोज़गार हेतु बाहर चले जाते हैं लेकिन पंचायत चुनावों में लौट कर केवल जातिगत, क्षेत्रीय या दबाव के आधार पर मतदान करते हैं। इससे गाँव के मौजूदा समस्याओं की अनदेखी होती है और विकास प्रभावित होता है।
मतदाता जागरूकता – जनक्रांति की ज़रूरत
जब तक आम मतदाता स्वयं जागरूक नहीं होगा, तब तक बाहरी ताकतें लोकतंत्र का शोषण करती रहेंगी। इसके लिए:
- ग्रामसभाओं में वोटिंग से पहले जागरूकता शिविर हों।
- सोशल मीडिया व स्थानीय समाचार माध्यम इस पर अभियान चलाएं।
- स्कूलों और कॉलेजों में चुनावी नैतिकता की शिक्षा दी जाए।
स्वतंत्र लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प
लोकतंत्र केवल एक प्रक्रिया नहीं, यह एक भावना है – आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और समान अवसर की भावना। यदि हम पंचायत चुनावों में शराब, धनबल और बाहरी हस्तक्षेप को न रोक पाए तो लोकतंत्र एक तमाशा बनकर रह जाएगा। यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम इस परिपाटी को समाप्त करें और एक निष्पक्ष, पारदर्शी, जागरूक एवं सशक्त लोकतंत्र की स्थापना करें – जहां गांव के भविष्य का निर्णय गांव के ही लोग लें, किसी बाहरी प्रभाव से नहीं।
🛡️ डिस्क्लेमर (Disclaimer):
यह सम्पादकीय लेख विचारात्मक एवं विश्लेषणात्मक प्रकृति का है, जो लेखक की निजी राय, अनुभवों और सामाजिक पर्यवेक्षण पर आधारित है। लेख में वर्णित मुद्दों का उद्देश्य पंचायत चुनावों में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, मतदाता जागरूकता और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की आवश्यकता को उजागर करना मात्र है। इसमें उल्लिखित व्यक्तित्व, संस्थाएं अथवा परिस्थितियाँ किसी विशेष व्यक्ति या समूह को लक्ष्य करके नहीं लिखी गई हैं।
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✍️ केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’
सम्पादक, सरहद का साक्षी, डिजिटल मीडिया
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