गढ़वाली फीचर फिल्म “रैबासी” का शुभ मुहूर्त:
सांस्कृतिक अस्मिता, लोकजीवन और उत्तराखंड के सिनेमा सफ़र का नया अध्याय
गढ़वाली संस्कृति और लोकजीवन को बड़े पर्दे पर जीवंत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम बढ़ने जा रहा है। पहाड़ी फिल्म बैनर तले बनने वाली गढ़वाली फीचर फिल्म “रैबासी” का शुभ मुहूर्त 2 सितम्बर 2025 को Tehri Garhwal के गजा तहसील के खडवालगांव में होगा। विशेष बात यह है कि इस शुभ मुहूर्त का प्रथम शॉट स्थानीय आस्था और संस्कृति के प्रतीक घंटाकर्ण मंदिर में फिल्माया जाएगा।
निर्माता विक्रम सिंह नेगी, निर्देशक राजेंद्र सिंह नेगी (राजू) और कहानीकार बृज मोहन वेदवाल के मार्गदर्शन में बनने जा रही यह फिल्म उत्तराखंड के ग्रामीण समाज, रिश्तों और सांस्कृतिक पहचान को केंद्र में रखकर बनाई जा रही है।
✨ सांस्कृतिक दृष्टि से ‘रैबासी’ का महत्व
गढ़वाली शब्द “रैबासी” का अर्थ है – परदेसी, प्रवासी या घर से दूर रहने वाला इंसान। यह शब्द पहाड़ के हर उस परिवार से जुड़ा है, जिसने रोज़गार, शिक्षा या बेहतर अवसरों की तलाश में अपने बेटे-बेटियों को दूर भेजा है। उत्तराखंड की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में प्रवास एक बड़ी चुनौती और हकीकत रही है।
“रैबासी” फिल्म का विषय केवल कहानी नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सामूहिक पीड़ा और आशा का दर्पण है। फिल्म यह दिखाने का प्रयास करेगी कि भले ही लोग रोज़ी-रोटी के लिए बाहर जाएं, लेकिन उनकी जड़ें संस्कृति, रीति-रिवाज और पहाड़ की मिट्टी से हमेशा जुड़ी रहती हैं।
🎥 शुभ मुहूर्त और जनप्रतिनिधियों की सहभागिता
फिल्म का शुभ मुहूर्त 2 सितम्बर, जो कि उत्तराखंड आंदोलन शहीदी दिवस भी है, अपने आप में एक गहरा प्रतीकात्मक महत्व रखता है। जिस दिन उत्तराखंड की अस्मिता के लिए शहादत को याद किया जाता है, उसी दिन से इस फिल्म की शुरुआत होना इसे सांस्कृतिक आंदोलन का रूप देता है।
इस अवसर पर कई जनप्रतिनिधि और सामाजिक हस्तियां शामिल होंगी:
- सुश्री इशिता सजवाण – जिला पंचायत अध्यक्ष
- श्रीमती सुमन सजवाण – ब्लॉक प्रमुख
- संजय मैठाणी – जेष्ठ उप प्रमुख
- श्रीमती सरोज मखलोगा – कनिष्ठ उप प्रमुख
- कुंवर सिंह चौहान – नगर पंचायत गजा अध्यक्ष
- श्रीमती मीना खाती – पूर्व अध्यक्ष
- ताजबीर सिंह खाती – जिला पंचायत सदस्य
- दिनेश प्रसाद उनियाल – वरिष्ठ पत्रकार, समाजसेवी एवं शिक्षक
स्थानीय ग्राम पंचायतों, व्यापार सभा गजा और ग्रामीण समुदाय का भी इस कार्यक्रम में सक्रिय सहयोग रहेगा।
🎬 निर्माता विक्रम सिंह नेगी की पृष्ठभूमि
फिल्म निर्माता विक्रम सिंह नेगी मूल रूप से खडवालगांव (बिमाणगांव) के निवासी हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा जूनियर हाई स्कूल नैचोली से हुई और बाद में वे दिल्ली जाकर सक्रिय रूप से फिल्म और कला जगत से जुड़े।
उनकी एक विशेष पहचान यह भी है कि उन्होंने इससे पहले शहीद श्रीदेव सुमन पर गढ़वाली फीचर फिल्म बनाई थी, जिसे दर्शकों और समीक्षकों दोनों से सराहना मिली। विक्रम सिंह नेगी ने गढ़वाली फिल्मों में गंभीर और प्रामाणिक विषयों को प्रस्तुत करने की परंपरा को आगे बढ़ाया है।
🎭 निर्देशक और कलाकार
फिल्म का निर्देशन राजेंद्र सिंह नेगी (राजू) कर रहे हैं। उनकी पहचान संवेदनशील और यथार्थवादी निर्देशन शैली के लिए है। फिल्म की कहानी बृज मोहन वेदवाल ने लिखी है, जिनकी लेखनी ग्रामीण समाज की गहराइयों और मानवीय रिश्तों की जटिलताओं को सामने लाती है।
फिल्म में स्थानीय कलाकारों के साथ-साथ कुछ अनुभवी कलाकार भी शामिल किए जा रहे हैं, ताकि प्रस्तुति में प्रामाणिकता और प्रभावशीलता दोनों बने रहें।
🌄 गढ़वाली सिनेमा की विरासत और चुनौतियाँ
गढ़वाली फिल्म उद्योग अभी भी सीमित संसाधनों और चुनौतियों से जूझ रहा है। बड़े बजट और मार्केटिंग की कमी के बावजूद कुछ समर्पित निर्माता-निर्देशक अपनी मातृभाषा और संस्कृति को जीवित रखने के लिए लगातार प्रयासरत हैं।
इससे पहले बनीं गढ़वाली फिल्मों जैसे “जगरगाती”, “सोबन”, “मेरी गंगा होछि तुवे पाणी”, “गंगा की सौगंध”, और हाल की “जागर”, “तुलसी” ने यह साबित किया है कि गढ़वाली सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोकजीवन का दस्तावेज है।
“रैबासी” इसी कड़ी में एक और महत्वपूर्ण जोड़ होगा।
🙌 स्थानीय समाज की भागीदारी
नगर पंचायत अध्यक्ष कुंवर सिंह चौहान ने कहा –
“यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि गजा क्षेत्र में गढ़वाली फीचर फिल्म का पहला शॉट खडवालगांव के पावन मंदिर से हो रहा है। यह क्षेत्र की पहचान और गौरव का क्षण है।”
सदस्य क्षेत्र पंचायत श्रीमती ममता खडवाल ने भी निर्माता का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस फिल्म से गांव-समाज और स्थानीय संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी।
🪔 सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रयास
फिल्म “रैबासी” केवल सिनेमा नहीं, बल्कि गढ़वाली समाज की सांस्कृतिक पुनर्स्थापना का प्रयास है। पहाड़ की लोककथाएं, त्योहार, बोलियाँ, गीत-संगीत और लोकविश्वास इस फिल्म के जरिये नए रूप में जीवित होंगे।
आज जब युवाओं का झुकाव शहरी जीवन और वैश्विक संस्कृति की ओर बढ़ रहा है, तब ऐसी फिल्में उन्हें उनकी जड़ों और सांस्कृतिक गौरव से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
🌐 डिजिटल युग और क्षेत्रीय सिनेमा
ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म और सोशल मीडिया ने आज क्षेत्रीय सिनेमा के लिए नए द्वार खोल दिए हैं। “रैबासी” जैसी फिल्में यदि सही मार्केटिंग और डिजिटल वितरण से जुड़ें, तो न केवल गढ़वाली समाज बल्कि देश-विदेश में बसे प्रवासी उत्तराखंडी भी इससे जुड़ सकेंगे।
यह फिल्म केवल एक मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि गढ़वाली भाषा-संस्कृति के पुनर्जीवन का अभियान बन सकती है।
गढ़वाली फीचर फिल्म “रैबासी” का शुभ मुहूर्त खडवालगांव में केवल एक फिल्म का आरंभ नहीं है, बल्कि गढ़वाली संस्कृति, प्रवास की पीड़ा और सामूहिक पहचान की गूंज है।
इस फिल्म से उम्मीद है कि यह न केवल सिनेमा प्रेमियों के लिए मनोरंजन का साधन बनेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए गढ़वाली जीवन और संस्कृति का दस्तावेज भी सिद्ध होगी।

