फूलदेई संक्रांति 2026: चैत्र मास का शुभारम्भ, उत्तराखंड की लोक परंपरा में देहरी पूजन और बसंतोत्सव का महत्व
सूर्य के मीन राशि में प्रवेश के साथ शुरू हुआ चैत्र मास, देवभूमि उत्तराखंड में फूलों से देहरी पूजन की अनूठी परंपरा
विशेष लेख | प्रस्तुति: आचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा
आज 15 मार्च 2026 से चैत्र मास का शुभारम्भ माना जा रहा है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार 14 मार्च की रात्रि लगभग 12:15 बजे भगवान भास्कर (सूर्य) मीन राशि में प्रवेश कर चुके हैं, जिसके साथ ही संक्रांति का पुण्यकाल आज मध्याह्न तक माना गया है। इसी दिन पापमोचनी एकादशी का भी पावन योग है।
सूर्य के इस संक्रमण काल के साथ ही सौर गणना के अनुसार चैत्र मास का प्रारम्भ होता है, जबकि चन्द्र मास के अनुसार इस वर्ष चैत्र मास का आरम्भ 4 मार्च से माना गया है। प्राचीन मनीषियों ने ऋतु परिवर्तन और समय गणना के लिए सौर मास को अधिक महत्व दिया है, इसलिए ऋतु चक्र में होने वाले परिवर्तन भी सूर्य के संक्रमण से ही माने जाते हैं।
इसी के साथ आज से बसंतोत्सव का भी शुभारम्भ माना जाता है।
उत्तराखंड में फूलदेई संक्रांति: लोक आस्था और प्रकृति प्रेम का उत्सव
देवभूमि उत्तराखंड में चैत्र मास का आगमन फूलदेई संक्रांति के पर्व के रूप में अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व प्रकृति, संस्कृति और लोक आस्था का अद्भुत संगम है।
इस महीने में छोटे-छोटे बालक-बालिकाओं के समूह जंगलों और खेतों से फ्यूली, बुरांश, शिलपाड़ा और अन्य रंग-बिरंगे फूल चुनकर गांव के प्रत्येक घर की देहरी (दहलीज) पर चढ़ाते हैं।
देहरी पूजन करते समय बच्चे घर-परिवार की समृद्धि, सुख-समृद्धि और भंडार की पूर्णता की कामना करते हुए पारंपरिक लोकगीत गाते हैं। इसके बदले घर के लोग बच्चों को तिल, गुड़, पापड़ी और धनराशि उपहार स्वरूप देते हैं।
यह पर्व उत्तराखंड में कहीं पूरे महीने, कहीं पन्द्रह दिन तो कहीं एक सप्ताह तक मनाया जाता है। कई स्थानों पर केवल बालिकाएं, तो कहीं बालक-बालिकाएं मिलकर यह परंपरा निभाते हैं।
वसंत ऋतु और कामदेव से जुड़ी सांस्कृतिक मान्यताएं
वसंत ऋतु में फूलों का विशेष महत्व माना जाता है। भारतीय परंपरा में कामदेव और रति देवी को समृद्धि और सौंदर्य का प्रतीक माना गया है।
मान्यता है कि कामदेव के पंच शर (अरविन्द, अशोक, आम, मल्लिका और इन्दीवर) प्रकृति में प्रेम और सौंदर्य का संचार करते हैं। वहीं उनके पांच बाण – सम्मोहन, उन्मादन, शोषण, तापन और मुमुर्षुमाण मानव जीवन में भावनाओं और आकर्षण की ऊर्जा का प्रतीक माने जाते हैं।
देहरी पूजन के दौरान पुष्प अर्पित कर इन दिव्य शक्तियों की कृपा की कामना की जाती है।
पर्व और परंपराएं जीवन को आनंदमय बनाने का माध्यम
हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन को संतुलित और आनंदमय बनाने के लिए विभिन्न पर्वों और उत्सवों की परंपरा स्थापित की है। भारत में ऐसा कोई महीना नहीं जिसमें कोई उत्सव या त्योहार न हो।
ये पर्व केवल उत्सव नहीं बल्कि समाज को संस्कार, विनम्रता और सामूहिकता का संदेश देने वाले शिक्षण संस्थान भी हैं।
प्राचीन समय में घरों के दरवाजे अपेक्षाकृत कम ऊंचाई के बनाए जाते थे ताकि प्रवेश करते समय व्यक्ति स्वतः झुककर विनम्रता का अभ्यास कर सके। यह प्रतीकात्मक व्यवस्था हमें नम्रता और अनुशासन का पाठ पढ़ाती थी।
बदलते समय में कमजोर पड़ती लोक परंपराएं
आज के आधुनिक समय में परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। पहले चैत्र मास में बच्चों के समूह पूरे गांव में देहरी पूजन करते दिखाई देते थे, लेकिन अब यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
कई स्थानों पर अब बच्चों और विशेष रूप से बालिकाओं की भागीदारी पहले की तुलना में कम हो गई है। सामाजिक परिस्थितियों और बदलती जीवनशैली के कारण यह लोक परंपरा कमजोर पड़ती नजर आ रही है।
समाज को अपनी परंपराओं के संरक्षण की जरूरत
यह समय हमारे लिए आत्ममंथन का भी है कि हम अपनी संस्कृति, परंपराओं और लोक उत्सवों को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं।
यदि समाज का एक छोटा हिस्सा भी इन परंपराओं पर पुनः विचार कर उन्हें अपनाने का प्रयास करे तो हमारी सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकती है।
फूलदेई संक्रांति की शुभकामनाएं!
चैत्र मास के इस पावन अवसर पर फूलदेई (फुलिवारी) संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं।
मधुमास की यह मधुर प्रभात आप सभी के जीवन को सुमनों की सुगंध, सुख और समृद्धि से भर दे — यही मां पुण्यासिणी से प्रार्थना है।
