अपनी जन्मभूमि में विमोचित हुई डॉ. अम्बरीष चंद्र चमोली की गढ़वाली काव्य-कृति ‘बौडिक ऐजा’
‘लौट के आ जाओ’—पहाड़ की मिट्टी, संस्कृति और अपनी जड़ों से जुड़ने की भावपूर्ण पुकार
पलाम, टिहरी गढ़वाल। उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य, सामाजिक परिवेश और पलायन की पीड़ा को गढ़वाली भाषा में अभिव्यक्त करने वाली साहित्यकार डॉ. अम्बरीष चंद्र चमोली की नवीन काव्य-कृति ‘बौड़िक ऐजा’ (लौट के आ जाओ) का विमोचन उनकी जन्मभूमि ग्राम पलाम में श्रीमद्भागवत कथा के अवसर पर कथा-मंडप में किया गया। डॉ. चमोली ने अपनी इस कृति को अपनी मां और मातृभूमि को समर्पित किया है।
अपनी जन्मभूमि में कृति का विमोचन अपने आप में भावनात्मक महत्व रखता है। पुस्तक का शीर्षक ही अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश देता है। धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण में आयोजित इस समारोह में साहित्य, संस्कृति, लोकजीवन और मातृभूमि के प्रति आत्मीयता का संगम देखने को मिला।
शैक्षणिक उत्कृष्टता से साहित्यिक साधना तक का सफर
डॉ. अम्बरीष चंद्र चमोली हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी के विद्वान, साहित्यकार एवं शोधकर्ता हैं। वे वर्तमान में राजकीय इंटर कॉलेज, खंडकरी, टिहरी गढ़वाल में अंग्रेजी प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हैं।
उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों में गढ़वाल विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान के साथ प्राप्त करना उल्लेखनीय है। उन्होंने संस्कृत में परास्नातक परीक्षा में भी विश्वविद्यालय में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए। इसके अतिरिक्त, वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) उत्तीर्ण कर चुके हैं।
हिंदी और संस्कृत में उच्च शैक्षणिक उपलब्धियों के साथ अंग्रेजी विषय में अध्यापन तथा गढ़वाली भाषा में साहित्य-सृजन उनकी बहुआयामी साहित्यिक और अकादमिक रुचि को दर्शाता है। उनका लेखन रचनात्मक साहित्य, शोध और क्षेत्रीय भाषा-साहित्य के अध्ययन तक विस्तृत है।
हिंदी साहित्य में भी महत्वपूर्ण योगदान
डॉ. चमोली की पूर्व प्रकाशित कृतियों में प्रबंध काव्य ‘जय रघुनायक’, हिंदी काव्य-संग्रह ‘ऋतुजा’ एवं ‘रूपाभा’ तथा हिंदी महाकाव्य ‘लोक आलोक बुद्ध’ प्रमुख हैं। इन रचनाओं के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी पहचान बनाई है।
उनकी नवीन कृति ‘बौडिक ऐजा’ उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण पक्ष प्रस्तुत करती है। इस संग्रह में गढ़वाली भाषा के माध्यम से मातृभूमि, पहाड़ और अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति अनुराग को अभिव्यक्ति मिली है।
गढ़वाली साहित्य पर शोधपरक कार्य
डॉ. अम्बरीष चंद्र चमोली ने गढ़वाली भाषा एवं साहित्य के अध्ययन में भी योगदान दिया है। उन्होंने प्रतिष्ठित गढ़वाली साहित्यकार अबोध बंधु बहुगुणा के साहित्य पर ‘अबोध बंधु बहुगुणा का साहित्य: अंतर्वस्तु एवं संरचना’ शीर्षक से शोधपरक अध्ययन किया है।
इसके अतिरिक्त, उन्होंने गढ़वाली के सिद्धहस्त कवि तोता कृष्ण गैरोला की प्रसिद्ध रचना ‘प्रेमी पथिक’ का विस्तृत साहित्यिक विवेचन प्रस्तुत किया है। उनका यह कार्य गढ़वाली साहित्य की परंपरा और उसकी रचनात्मक विशेषताओं को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
डॉ. चमोली की रचनाएं समय-समय पर आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी प्रसारित होती रही हैं, जिससे उनकी साहित्यिक सक्रियता का परिचय मिलता है।
‘बौड़िक ऐजा’: पहाड़ की आत्मा से निकली पुकार
वर्ष 2026 में देहरादून स्थित बिनसर पब्लिकेशन से प्रकाशित यह गढ़वाली काव्य-कृति अपने शीर्षक में गहरा भावनात्मक संदेश समेटे हुए है। ‘बौडिक ऐजा’ अर्थात ‘लौट के आ जाओ’ केवल किसी व्यक्ति को वापस बुलाने की पुकार नहीं, बल्कि अपनी जन्मभूमि, मातृभाषा, गांव, परंपराओं और सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने का भावपूर्ण आह्वान भी है।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन के कारण अनेक गांवों की सामाजिक संरचना, पारंपरिक जीवन-पद्धति और सांस्कृतिक निरंतरता प्रभावित हुई है। ऐसे परिवेश में अपनी मिट्टी से जुड़े रहने का संदेश विशेष महत्व रखता है। यह कृति उन लोगों को अपने गांव, भाषा और सांस्कृतिक विरासत से संबंध बनाए रखने की भावनात्मक याद दिलाती है, जो शिक्षा, रोजगार या अन्य कारणों से अपने गांवों से दूर चले गए हैं।
प्रकृति, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों का संगम
पुस्तक की विषय-सूची में ‘देवभूमि’, ‘पित्र सराध’, ‘सुख्यां फूल’, ‘नयो ईस्वी वर्ष’, ‘जन्मदिन’, ‘धरती माता’, ‘विद्यार्थी’, ‘शहीद’, ‘हिमालै’, ‘गंगा’, ‘उत्तराखण्ड’, ‘मेरो गढ़वाल’, ‘पलायन’, ‘छोड़ि न जा’ और ‘मजदूर छौं’ जैसी रचनाएं शामिल हैं।
इन शीर्षकों से संग्रह के विविध विषयों का परिचय मिलता है। हिमालय और गंगा के प्रति अनुराग, उत्तराखंड की प्राकृतिक संपदा, गढ़वाल की सांस्कृतिक पहचान, शिक्षा, श्रम, राष्ट्रीय चेतना और पलायन जैसे विषय इस कृति को समकालीन सामाजिक जीवन से जोड़ते हैं।
गढ़वाली भाषा में इन विषयों की अभिव्यक्ति क्षेत्रीय संवेदना और लोकजीवन को साहित्यिक स्वर प्रदान करती है। यह संग्रह अपनी भाषा एवं संस्कृति के संरक्षण के साथ-साथ पहाड़ के सामाजिक यथार्थ और पलायन जैसे गंभीर मुद्दों पर विचार करने का अवसर भी देता है।
जन्मभूमि को समर्पण ने बनाया विमोचन को विशेष
ग्राम पलाम में श्रीमद्भागवत कथा के अवसर पर कृति का विमोचन और इसे मां एवं मातृभूमि को समर्पित करना आयोजन का विशेष पक्ष रहा। यह प्रसंग रचनाकार के अपनी जन्मभूमि और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े आत्मीय संबंध को रेखांकित करता है।
विमोचन समारोह में पूज्य आचार्य श्री भरतकिशोर जी, पुरुषोत्तम रणाकोटी, गणेश रतूड़ी, पीयूष भट्ट और आदित्य नौटियाल सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। इस अवसर पर कवि की धर्मपत्नी श्रीमती अशरूपी चमोली, उनके परिजन, दिनेश कोठियाल, संजय चमोली तथा बड़ी संख्या में मित्र-सम्बंधी, क्षेत्रीय नागरिक और विद्वतजन मौजूद रहे।
श्रीमद्भागवत कथा के पावन वातावरण में अपनी जन्मभूमि पर पुस्तक का विमोचन साहित्य, संस्कृति, पारिवारिक आत्मीयता और मातृभूमि के प्रति अनुराग का यादगार अवसर बना।
पुस्तक एवं लेखक का परिचय
- पुस्तक का नाम: बौड़िक ऐजा (लौट के आ जाओ)
- लेखक: डॉ. अम्बरीष चंद्र चमोली
- भाषा: गढ़वाली
- प्रकाशक: बिनसर पब्लिकेशन, देहरादून, उत्तराखंड
- प्रकाशन वर्ष: 2026
- वर्तमान पद: अंग्रेजी प्रवक्ता, राजकीय इंटर कॉलेज, खंडकरी, टिहरी गढ़वाल
- लेखक से संपर्क: 8126297920 / 8171262745
- प्रकाशक का मोबाइल: 9412325979
- प्रकाशक का ईमेल: winsar.nawani@gmail.com
‘बौड़िक ऐजा’ अपनी जन्मभूमि, मातृभाषा और सांस्कृतिक विरासत के प्रति आत्मीय लगाव का काव्यात्मक दस्तावेज है। इसका संदेश पहाड़ से दूर बसे लोगों को अपनी मिट्टी, अपने गांव और अपनी पहचान से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।
