[su_button background=”#881c0a” color=”#fffffe” size=”2″ radius=”5″ text_shadow=”0px 0px 0px #000000″]सरहद का साक्षी @समीक्षक: कवि सोमवारी लाल सकलानी, निशांत।[/su_button]
“बारहनाजा की पुन:र्स्थापना, बीज बचाओ आंदोलन के अपने 35 साल से भी अधिक लोक प्रयास की एक बड़ी उपलब्धि है। आज जब दुनिया में भुखमरी व जलवायु का संकट गहराता जा रहा है, बारहनाजा हमें पोषण भरे रोग मुक्त जीवन व भविष्य की उम्मीद प्रदान करता है।”- बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता: विजय जड़धारी
प्रख्यात समाजसेवी, पर्यावरणविद व बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता, श्री विजय जडधारी ने सुमन दिवस के अवसर पर अपनी पुस्तक “बारहनाजा” (अर्थात् 12 किस्म के अनाज, 12 varieties of cereals) की प्रति भेंट की। यूं तो उनकी यह पुस्तक 2007 में प्रकाशित हो चुकी थी लेकिन पाठकों की मांग के अनुरूप यह पुस्तक का तीसरा संस्करण प्रकाशित किया गया।
पूर्व प्रकाशित पुस्तक और नवीन संस्करण में विस्तार के अंतर है। देश काल और परिस्थितियों के अनुसार नए शोध लेखक द्वारा सम्मिलित किए गए हैं लेकिन पुस्तक की आत्मा अजर अमर है ।
आकर्षक कलेवर में संजोयी यह पुस्तक पारंपरिक मिश्रित खेती के सिद्धांत तथा वैज्ञानिक रूप में प्रस्तुत की गई है। इसके अलावा समृद्धशाली पारंपरिक कृषि विज्ञान के वांछित प्रकरण परिवर्धित करके समावेशित हैं। पुस्तक मूर्धन्य पत्रकार स्वर्गीय पर प्रसून को समर्पित है। पुस्तक की प्रस्तावना ही सब कुछ बयां कर देती है और पुस्तक का सम्यक अध्ययन करने के लिए विवश कर देती है।
जब पृष्ठ दर पृष्ठ पुस्तक का अध्ययन करने लगा तो लगा कि जैसे अपनी मां के मुंह से यह सब सुन रहा हूं। खेती के लिए मशहूर मेरा ननिहाल टिपली (कुजणी), बाल्यकाल की स्मृतियों से आज तक मेरे मानस पटल पर अंकित है। पैदल कुजणी से बमुंड होते हुए सकलाना आते -जाते वक्त मां फसलों, वनस्पतियों, खेती के तरीकों, जल स्रोतों आदि के बारे में रू-ब-रू करवाती रही है।
हेंवल घाटी अपनी पारंपरिक खेती-बाडी,सम्पन्नता, जैव विविधता तथा प्राकृतिक सुषमा के लिए जानी जाती है और इन सब बातों को वैज्ञानिक, समसामयिक आयाम देने में योगदान रहा है -स्थानीय क्षेत्रीय विचारकों का। चाहे स्व कुंवर प्रसून जी रहे हों या श्री धूम सिंह नेगी जी या स्व प्रताप शिखर जी ,स्व गोपेश्वर कोठियाल जी, आलोक प्रभाकर जी, दयाल भाई जी या युवा समाज से वी रघुभाई जडधारी। इन सब के मध्य योगदान रहा है- बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता तथा इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार प्राप्त लेखक श्री विजय जडधारीर जी का।
लेखक ने “उत्तराखंड में खानपान की संस्कृति”, “बारहनाजा” “खेती अनमोल धरोहर”, “बीज एवं लोक ज्ञान” आदि दर्जनों पुस्तकें स्वतंत्र व सहभागिता से लिखी हैं। अधिकांश पुस्तकें प्रकाशित हैं लेकिन बारहनाजा और उत्तराखंड में खानपान की संस्कृति उनके विस्तृत शोध पर आधारित हैं। यह पुस्तकें कल्पना और परिकल्पना पर आधारित न होकर विशुद्ध विज्ञान तथा व्यापारिक पारंपरिक कृषि विज्ञान हैं।
बारहनाजा अन्न -दलहन- तिलहन का मौलिक नाम है जो कि लेखक का नवाचार है और पारंपरिक मुख्य पहाड़ी फसलों का समन्वित नाम शीर्षक है।
लेखक ने पुस्तक में अपने शोध ज्ञान और अनुभव के आधार पर बारहनाजा, उसकी उपयोगिता, महत्व ,पोषण और पोषक तत्वों का विस्तार से विवरण प्रस्तुत किया है। बारहनाजा के अंतर्गत आने वाले खाद्यान्न, तिलहन और दलहन का पूर्ववर्ती परिवर्धित संस्करण सम्यक रूप से प्रस्तुत किया गया है। मिश्रित खेती, जैविक खेती, पारंपरिक खेती, पशुधन, आर्थिकी आदि पहलुओं के साथ अपने अनुभवों को भी साझा किया गया है।
पुस्तक में बीज बचाओ आंदोलन की पृष्ठभूमि, महत्व, योगदान और उसका असर पर भी प्रकाश डाला गया है। आंदोलन की जन- जागरूकता के लिए समय-समय पर गढ़े गए नारों, साहित्य को भी स्थान दिया गया है। पुस्तक के मध्य स्थान -स्थान पर सुंदर खेती और कृषि संबंधी चित्रों का समावेश है। बारहनाजा परिवार के सदस्य अन्न, दालों और तिलहन तथा फसल चक्र को भी चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
जैविक खेती के आधार पशुधन, जंगली जानवरों, रासायनिक उर्वरकों तथा सरकार की गलत नीतियों के कारण उत्पन्न संकट आदि के बारे में भी लेखक ने बे-बाक टिप्पणियां की हैं। इसके साथ ही अच्छा कार्य करने वाले लोगों चाहे सरकार में हों या समाज में, उनका भी उत्साह वर्धन किया है।
समग्र रूप से “बारहनाजा” पुस्तक छात्रोपयोगी समाजोपयोगी तथा कृषिपयोगी है। यह वास्तव में पारंपरिक खेती का विज्ञान है। इस पुस्तक को माध्यमिक स्तर के पाठ्यक्रमों में यदि सम्मिलित कर दिया जाए तो आने वाली पीढ़ी के लिए बहुत अधिक लाभकारी सिद्ध होगी। मैं लेखक श्री विजय जडधारी जी के इस महान कार्य के लिए नमन करता हूं तथा पुस्तक के नवीन संस्करण की सफलता की कामना करता हूं ।
