धारअकरिया, मखलोगी और क्वीली पट्टियों के गांवों को वर्षों से नहीं मिली मूलभूत सुविधाएँ, बरसात व गर्मी में शोकाकुल परिवारों को सहनी पड़ती मजबूरी
✍ डी.पी. उनियाल, गजा | सरहद का साक्षी डिजिटल मीडिया
कोटेश्वर बांध परियोजना ने बदले गांवों के भूगोल और परंपराएँ
टिहरी जनपद में कोटेश्वर बांध निर्माण ने भागीरथी घाटी के आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक पहलुओं को कई मायनों में बदल दिया। बांध बनने के बाद धार अकरिया, मखलोगी और क्वीली जैसे तीन प्रमुख पट्टियों के कई प्राचीन घाट, धार्मिक स्थल और गांवों के अंतिम संस्कार स्थल झील के नीचे समा गए।
यह वह घाट थे, जहाँ पीढ़ियों से ग्रामीण अपने दिवंगत परिजनों का अंतिम संस्कार करते आए थे। इन घाटों का गांव के सामाजिक इतिहास से भी गहरा संबंध था। हर परिवार का अपना परंपरागत स्थान था, चिता-दाह की प्रक्रिया से लेकर रस्मों की परंपरा तक सब कुछ सुव्यवस्थित था। मगर बांध निर्माण के बाद यह पूरा ढांचा घट कर केवल यादों तक ही सीमित रह गया।
अंतिम संस्कार जैसी संवेदनशील परंपरा, पर स्थायी समाधान अब तक नहीं
अंतिम संस्कार किसी भी समाज की सांस्कृतिक परंपरा का अत्यंत संवेदनशील हिस्सा है। दुख की घड़ी में परिवार को कम से कम सुविधा और सहयोग मिलना चाहिए। लेकिन तीन पट्टियों के दर्जनों गांवों के लिए आज तक कोई पक्का शव-दाह स्थल विकसित नहीं किया गया है।
ग्रामीणों के अनुसार, बांध निर्माण से विकास तो हुआ, लेकिन घाटों के डूबने के बाद अंतिम संस्कार की सुविधाओं के लिए न तो कोई विस्तृत सर्वे हुआ, न ही गंभीरता से दीर्घकालिक योजना विकसित की गई।
वर्षों से यह समस्या ग्रामीणों की दिनचर्या, सामाजिक मान्यताओं और संवेदनशील परिस्थितियों को प्रभावित कर रही है।
बरसात में बढ़ जाती है दिक्कत, लोग भीगते हुए चिता-दाह के लिए मजबूर
वर्षा ऋतु में शव-दाह की सबसे गंभीर समस्या सामने आती है। नदी किनारे या अस्थायी स्थानों पर अंतिम संस्कार के दौरान शवयात्रा में शामिल लोगों को लगातार बारिश में भीगना पड़ता है।
ग्रामीण बताते हैं कि बारिश में:
- चिता सजाने में कठिनाई
- लकड़ी सुलगाने में दिक्कत
- अंतिम संस्कार की परंपराएँ बाधित
- बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों की सुरक्षा प्रभावित
यह सब कुछ ऐसे समय में होता है, जब परिवार पहले से ही दुख में डूबा होता है।
गर्मी में छाया तक नहीं, झाड़ियों में बैठते हैं ग्रामीण
गर्मी के मौसम में समस्या बिल्कुल उलट है — छाया का नामोनिशान नहीं। शव-दाह स्थल के पास न कोई बैठने की व्यवस्था है, न शरण लेने के लिए कोई शेड। ग्रामीण अक्सर झाड़ियों या पेड़ों के पीछे बैठने को मजबूर हो जाते हैं।
अंतिम संस्कार जैसा अवसर न केवल मानसिक रूप से संवेदनशील होता है, बल्कि घंटों तक शव-दाह प्रक्रिया चलती रहती है। ऐसे में उपस्थित लोगों का गर्मी में झुलसना, धूप में खड़े रहना, बच्चों और बुजुर्गों की स्थिति बिगड़ना, यह सब बार-बार दोहराई जाने वाली वास्तविक समस्याएँ हैं।
यदि एक ही दिन दो शव आ जाएँ तो स्थिति और गंभीर हो जाती है
ग्रामीण बताते हैं कि यदि एक ही दिन दो शव आ जाएं, तो चिता-दाह के लिए कोई अलग स्थान उपलब्ध ही नहीं है। यह स्थिति केवल असुविधाजनक नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से अत्यंत कष्टकारी है। परिजनों को:
- चिता लगाने के लिए स्थान खोजने में कठिनाई
- रस्मों का समय टकराना
- गोपनीयता और शांति का अभाव
- परिजनों की मनोदशा पर नकारात्मक प्रभाव
यह समस्या वर्षों से है, पर स्थायी समाधान आज तक नहीं निकल पाया।
2019 में ग्रामीण संगठनों ने सौंपा था 7 सूत्रीय मांग पत्र
इस विषय पर वर्ष 2019 में प्रगतिशील जन विकास संगठन गजा के अध्यक्ष दिनेश प्रसाद उनियाल और सिविल सोसाइटी नकोट-मखलोगी के अध्यक्ष बिक्रम सिंह रावत ने तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ. वी. शणमुगम को 7 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा।
ग्रामीण संगठनों ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यदि इस समस्या का समाधान न हुआ तो वे आंदोलन का रास्ता चुनेंगे। जिलाधिकारी डॉ. वी. शणमुगम ने मामले की गंभीरता समझते हुए अधिकारियों को तत्काल कार्यवाही करने के निर्देश दिए।
टीएचडीसी ने बनाया छोटा टिन-शेड — समाधान केवल औपचारिक
अधिकारियों के निर्देश के बाद टीएचडीसी ने भागीरथी नदी के जल स्तर से ऊपर एक छोटा-सा टिन शेड बनाकर समस्या का समाधान घोषित कर दिया। लेकिन यह शेड:
- आकार में अत्यंत छोटा
- ऊंचाई कम
- यदि इसके भीतर चिता रखकर शव-दाह किया जाए, तो टिन शेड जलने का खतरा
- राख प्रवाहित करने के लिए पानी तक पहुंच का मार्ग नहीं
- बारिश में शवयात्रा के लोगों के लिए बैठने की कोई व्यवस्था नहीं
ग्रामीणों के अनुसार यह समाधान केवल कागजी कार्यवाही साबित हुआ।
समस्या केवल शेड की नहीं — यह पूरा धार्मिक, सांस्कृतिक ढांचा प्रभावित है
ग्रामीणों का कहना है कि अंतिम संस्कार स्थल केवल एक ढांचा नहीं होता, बल्कि:
- चिता-दाह के लिए सुरक्षित स्थान
- परिवारों के बैठने और प्रतीक्षा की जगह
- मृतक की अस्थि और राख प्रवाहित करने की परंपरा
- वर्ण-विधि, भूमिपूजन, पिण्डदान आदि धार्मिक अनुष्ठान
- शांति और पवित्रता का वातावरण
इन सभी के लिए समुचित व्यवस्था आवश्यक होती है। एक टिन शेड से यह परंपरा संरक्षित नहीं रहती।
स्थानीय निकायों और प्रतिनिधियों ने फिर उठाई मांग
नगर पंचायत गजा के अध्यक्ष कुंवर सिंह चौहान, पूर्व अध्यक्ष श्रीमती मीना खाती, पूर्व जिला पंचायत सदस्य अनिल भंडारी, राजबीर सिंह चौहान, दिलबीर सिंह मखलोगा, एवं पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य ज्योति पंत ने कोटेश्वर बांध परियोजना के महाप्रबंधक को एक बार फिर आग्रह भेजा है।
उनकी मुख्य मांगें हैं—
1️⃣ शव-दाह स्थल को स्थायी, पक्का और बड़ा बनाया जाए
2️⃣ शवयात्रा में शामिल लोगों के लिए बैठने और छाया की व्यवस्था
3️⃣ नदी तक राख प्रवाहित करने हेतु सीढ़ियाँ और सुरक्षित मार्ग
4️⃣ बारिश, ठंड और गर्मी में स्थायी सुरक्षा शेड
5️⃣ यदि एक से अधिक शव हों तो वैकल्पिक स्थान
6️⃣ ध्यान, प्रार्थना और सामाजिक शांतिपूर्ण व्यवस्था हेतु पर्याप्त खुला स्थान
ग्रामीण कहते हैं — “हम विकास के विरोधी नहीं, सुविधा के हकदार हैं”
बांध परियोजना ने बिजली, विकास और संसाधन उपलब्ध कराए, लेकिन ग्रामीणों की सांस्कृतिक समस्याओं को अनदेखा किया गया। ग्रामीणों का कहना है:
“हम बांध के निर्माण के विरोधी नहीं थे। हमने विकास को स्वीकार किया। हमारे गांव विस्थापित हुए, खेत डूबे, परंपराएँ बदलीं। अब कम से कम अंतिम संस्कार जैसी संवेदनशील जरूरतों के लिए पक्की व्यवस्था मिलनी चाहिए।”
स्थानीय समाजशास्त्रियों का मत — परंपराएँ केवल धार्मिक नहीं, भावनात्मक होती हैं
अंतिम संस्कार स्थल गांव की सामूहिक पहचान भी होता है। वहां:
- विदाई की अंतिम रस्म
- परिवारों का एकत्र होना
- समाज का सांस्कृतिक सामंजस्य
- मृतक की आत्मा की शांति
ये सब बातें केवल सुविधा नहीं, बल्कि भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक जरूरतें भी हैं। इसलिए गांवों की मांग पूरी तरह उचित है।
प्रशासन और टीएचडीसी की जिम्मेदारी — समाधान में देरी क्यों?
कई वर्ष बीत गए, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। ग्रामीण सवाल करते हैं कि:
- क्या शव-दाह स्थल की व्यवस्था इतना बड़ा कार्य है कि वर्षों से टल रहा है?
- क्या टीएचडीसी और प्रशासनिक इकाइयाँ सामाजिक जिम्मेदारी को केवल कागजी निर्देशों तक सीमित रख सकती हैं?
- क्या अंतिम संस्कार जैसी परंपरा को सुविधाएं देना विकास का हिस्सा नहीं होना चाहिए?
यदि झील, सड़क, पुल और बिजली की लाइनें बन सकती हैं, तो एक व्यवस्थित घाट क्यों नहीं?
स्थायी समाधान कैसे हो?
दीर्घकालिक समाधान हेतु निम्न विकल्प सुझाए जाते हैं —
- नदी के किनारे व्यापक सर्वेक्षण
- इंजीनियरिंग मानकों के अनुसार पक्का घाट निर्माण
- चिता-दाह स्थल के लिए ईंट-पत्थर से स्थायी प्लेटफॉर्म
- आग से सुरक्षित टिन या RCC शेड, 50–100 लोगों के बैठने की व्यवस्था
- महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों के लिए अलग शेड
- राख प्रवाहित करने हेतु सीढ़ियाँ और रेलिंग
यह कोई असंभव परियोजना नहीं, बल्कि लगभग किसी भी ग्रामीण क्षेत्र में होने योग्य बुनियादी ढांचा है।
ग्रामीणों की आवाज — हमें सिर्फ सम्मानजनक विदाई चाहिए
ग्रामीणों का कहना है कि अंतिम संस्कार के समय सम्मान, शांति और व्यवस्था सबसे पहली आवश्यकता होती है। समाज को इसे किसी भी प्रकार की असुविधा से मुक्त कराना प्रशासन का दायित्व होना चाहिए।
निष्कर्ष: घाटों का व्यवस्थित निर्माण विकास नहीं, सामाजिक न्याय है
एक छोटे शेड से समस्या हल नहीं होती, यह केवल दस्तावेजी समाधान है। स्थायी, विस्तृत और संवेदनशील रूप से विकसित घाट ही ग्रामीणों की परंपरा को सम्मान देगा।
अंतिम संस्कार किसी भी व्यक्ति का अंतिम अधिकार है — और इसके लिए सुरक्षित, शांतिपूर्ण और व्यवस्थित स्थान उपलब्ध कराना विकास का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए।
Disclaimer:
इस समाचार में दिए गए तथ्य, बयान और स्थानीय दावे संबंधित स्रोतों एवं रिपोर्टर्स द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी पर आधारित हैं। सरहद का साक्षी, डिजिटल मीडिया किसी भी प्रशासनिक निर्णय, आरोप या मांग की पुष्टि करने या खंडन करने का दावा नहीं करता। समाचार का उद्देश्य केवल सार्वजनिक सूचना और स्थानीय मुद्दों को उजागर करना है।

