गुरुवार, 22 सितम्बर 2022 की खुशहाल भोर, ईश्वरानुकम्पा के चलते अकाल कलवित होने से बचा परिवार
शायद आज इन पंक्तियों को लिखने का अवसर न मिलता। यदि गुरुवार 22 सितम्बर 2022 की खुशहाल भोर हमें परिवार सहित अकाल कलवित होने से न बचाती। लाख-लाख शुक्र है उस भोर का। प्रातः की लगभग सवा 6 बजे का समय होगा। मैं अपने घर की छत पर यूं ही प्रकृति का नजारा निहार रहा था, घर की उपरी मंजिल के तीनों कमरों में उत्तर दिशा की ओर से पहले कमरे पर मेरी वृद्ध माता, दूसरे कमरे पर मेरे अनुज का परिवार, तीसरे कमरे पर मेरी धर्मपत्नी बैठे थे, कि बन्दरों का हुजूम गांव की ओर लपका और उन्हें भगाने के लिए हो-हल्ला होने लगा। मैं छत पर खड़ा अपने घर की उत्तर दिशा में एक पीपल के पेड़ की सबसे ऊंची टहनी पर बैठे बन्दरों की हरकतों को देख रहा था। पीपल के पेड़ की टहनियों पर वे अटखेलियां कर रहे थे और बहुत सारे बन्दर गांव की ओर जाकर उत्पात मचा रहे थे।
पीपल के पेड़ की ही दिशा में मेरे घर के पास (गांव के ही श्रीमती छेणी देवी धर्मपत्नी स्व. जबरसिंह उर्फ जट्टूसिंह गरख्वाल पुत्र स्व. हरि सिंह का) एक खड़ीक का भीमकाय दरख्त खड़ा था, जिसका व्यास करीबन तीन मीटर और ऊंचाई 70 फिट के लगभग रही होगी। पेड़ की ऊंचाई का जायजा कमरों की लम्बाई (अर्थात् 12 फिट चौड़ाई के 6 कमरे) से लिया जा सकता था।
पलक झपकते ही मेरी दृष्टि पीपल के पेड़ से उस भीमकाय दरख्त की ओर जाती है तो देखता हूं कि वह शनैः शनैः मेरे घर की ओर गिर रहा है। मैं सन्न रह गया और कुछ कह व करने की स्थिति में न रहा कि वह दरख्त हमारे आवासीय मकान के ऊपर गिर पड़ा। दरख्त के गिरने का भीषण धमाका होता है, गांव के लोग मेरे घर पर एकत्र हो जाते हैं और मैं खड़ा-खड़ा कुछ कह नहीं पाता। लोग घर के कमरों में झांककर देखते हैं तो सब कुशल। इस बीच घर के भीतर बैठे हमारे परिजन भी बाहर निकल जाते हैं।
लोगों को देख होश आता है तो देखता हूं कि वह दरख्त मकान के छः कमरों की छत तक बिखरा पड़ा है और उसकी विशालकाय टहनियां पठाल अर्थात् स्लेट वाली छतों समेत दोरों पक्की छतों पर टिकी हुई हैं। उसका भीमकाय मकान की दीवारों व छतों को क्षत-विक्षत कर गया। भगवान का शुक्र है कि घर के भीतर सभी जन सुरक्षित रहे। आंगन चौक में पालतू मवेशियों पर भी कोई आंच नहीं आयी, केवल मेरे माथे पर किसी टहनी का टुकड़ा उछलने से हल्की चोट आयी।
आनन फानन में प्रशासन को सूचना भेजी। राजस्व पटवारी, तहसीलदार, उप जिलाधिकारी, ब्लॉक के इंजीनियर्स, क्षेत्रीय विधायक द्वारा मौकाये निरीक्षण किया गया। वन विभाग की टीम मौके पर आयी। भारी भरकम दरख्त को मकान की छत से हटाने में वन निगम के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने व्यापक सहयोग किया।
आरा मशीन आदि से छोटे-छोटे टुकड़ों में दरख्त को काटकर बमुश्किल मकान की छत से हटवाया गया और मेरे घर के पीछे एक सज्जन के बंजर मकान के आंगन में डाला गया। तो उस भल मानुस को हमारी सलामती रास न आयी तो वह दिल्ली से घर आकर पंचायत करने पर उतर आया। तब जाकर दरख्त के मालिकों ने उसके आंगन से दरख्त के टुकड़ों को हटवाया। यहां पर भल मानुसों के कृत्यों का विस्तार से जिक्र करना लाजिमी नहीं समझता। भगवान हमेशा ऐसे लोगों पर अपनी कृपादृष्टि बनाये रखे। यही कामना कर सकता हूं।
क्योंकि, हम उन पदचिन्हों पर चलने में विश्वास रखते हैं, जिसमें महाकवि कबीरदास जी ने कहा हैः-
जो तोकू कांटा बुवै वोकू बोय तु फूल।
तोकू फूल के फूल हैं, वोकू है त्रिशूल।।
हटाये गए दरख्त के टुकड़ों को बाद में वन निगम उठाकर ले गया। जिस पर दरख्त मालिकों ने बाद में एतराज उठाने की भी कोशिश की। यहां पर यह जिक्र अवश्य करूंगा कि जिनका यह खड़ीक का दरख्त था, उनका एक बेटा वन विभाग में ही कार्यरत है। विभाग में तैनात रहने के बाबजूद भी उनके द्वारा इस भीमकाय दरख्त से हुए नुकसान की भरपाई हेतु एक शब्द भी नहीं कहा गया। यहां तक कि इतने भारी नुकसान के बाबजूद उन्होंने सांत्वाना के निमित एक शब्द भी कहने की जुर्रत महसूस नहीं की।
इस दरख्त के ढहने से हमारे दो मंजिले तीन कमरे पूर्णतया क्षतिग्रस्त हुए हैं जिनमें से एक दो आवासीय कमरा आज भी क्षतिग्रस्त अवस्था में है। उस पर हमारी वृद्ध माता निवास करती थी और भूतल पर पालतू पशु रहते थे, उसके क्षतिग्रस्त होने से वृद्ध माता के आवास व पालतू मवेशियों के रख-रखाव की असुविधा से आज भी जूझना पड़ रहा है।
शासन-प्रशासन के नुमाइंदों एवं क्षेत्रीय जन-प्रतिनिधियों के संज्ञान एवं बार-बार स्थलीय निरीक्षण के बाबजूद भी सकारात्मक उचित कार्यवाही का लाभ न मिल पाना। इस बात की टीस आज भी मन में है। इस मीमकाय खड़ीक दरख्त के अवसान की बरसी पर हम आज भी भगवान का शुक्र अदा करते हैं और याद करते हैं गुरुवार 22 सितम्बर 2022 की भोर को, जिसके हमारे परिवार को अकाल कलवित होने से बचाया।
* केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’
सुप्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, लेखक एवं स्वतंत्र विचारक श्री सोमवारी लाल सकलानी ‘निशान्त’ जी ने तत्समय अपनी पोस्ट में जो वर्णन किया था, वह इस प्रकार हैः-
पत्रकार के पुश्तैनी मकान के ऊपर गिरा विशालकाय खड़क का पेड़
संपूर्ण परिवार रहता है इस पुश्तैनी मकान में। मकान को हुआ काफी नुकसान
शासन- प्रशासन से गुजारिश है कि कलम के सिपाही की आर्थिक मदद की जाए ताकि कर सकें अपने पुश्तैनी मकान का पुनर्निर्माण
रिपोर्ट: कवि सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’
विकासखंड चंबा के छाती महादेव (मखलोगी) टिहरी गढवाल में पत्रकार केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’ के मकान के ऊपर विशालकाय खड़क का पेड़ गिर जाने से जहां एक और उनका पुश्तैनी मकान ध्वस्त हुआ है, ईश्वर का लाख-लाख शुक्रिया की जान माल की हानि नहीं हुई है। मकान की भारी क्षति हुई है।
यूं तो खड़क का पेड़ जल्दी जड़ से उखड़ता नहीं है लेकिन बरसों बाद पुराना हो जाने से जड़ से गिर जाए तो काफी नुकसान पहुंचाता है। पुराने समय लोग खड़क का पेड़ मकान के समीप नहीं रखते थे क्योंकि इससे वज्रपात का भय बना हुआ रहता था। मवेशियों के लिए पौष्टिक चारा उपलब्ध कराने में खड़क के पेड़ों का बड़ा योगदान रहा है। इन पेड़ों को अधिकांशत: खेतों की मेड़ों, घास के क्षेत्रों, नाले- खालों के पास ज्यादा रोपण किया जाता था। खड़क के पेड़ों का इस्तेमाल सूखे हुए घास के पूरेल्डों के लगाने के काम भी आता है। यद्यपि कुछ इलाकों में इसकी लकड़ी का इस्तेमाल इमारती लकड़ी के रूप में नहीं किया जाता है क्योंकि ऐसा मिथक है कि यह आकाशीय बिजली को अपनी ओर आकर्षित करता है।
प्रतिष्ठित हिंदी अनेेक समाचार पत्रों (राष्ट्रीय सहारा, जागरण आदि) के पूर्व संवाददाता/सम्पादक केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’ लंबे समय तक चंबा, नई टिहरी में रहकर पत्रकारिता करते रहे। आर्थिक स्थिति कमजोर रहने के कारण, बाद के वर्षों में उन्होंने अपने गांव के नजदीक नकोट बाजार से ही स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अपना कार्य करना आरंभ किया। उनका प्रतिष्ठित न्यूज़ पोर्टल “सरहद का साक्षी”है जो पत्रकारिता के उच्च मानदंडों पर खरा उतरता है और समसामयिक मुद्दों, स्थानीय खबरों, न्यूज़ और व्यूज़ के रूप में उत्कृष्ट न्यूज़ पोर्टल है। जिस तरह उनका परिवार दरख़्त के चपेट में आया, बहुत बड़ी जनहानि हो सकती थी लेकिन छाती महादेव की कृपा से वे सुरक्षित हैं।
श्री केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’ स्वतंत्र पत्रकार हैं। पूरा जीवन पत्रकारिता में समर्पित किया है और स्वस्थ पत्रकारिता के कारण हमेशा ही आर्थिक अभाव में रहे हैं। शासन -प्रशासन से अनुरोध है कि कलम के सिपाही श्री केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’ की आर्थिक मदद की जानी चाहिए, जिससे कि वह अपने पुश्तैनी मकान का जीर्णोद्धार कर सके और उसे पुनः रहने लायक बना सकें।
