टिहरी की धरती पर भू-माफियाओं का बढ़ता कब्जा: आखिर प्रशासन की चुप्पी क्यों?
सस्ते दामों में ग्रामीणों की जमीन खरीदकर करोड़ों में बेच रहा बाहरी माफिया तंत्र, अवैध खुदान और निर्माण पर उठ रहे सवाल
सम्पादकीय | टिहरी गढ़वाल, 20 मई 2026 | SKS News।
टिहरी गढ़वाल की शांत वादियों और प्राकृतिक सौंदर्य पर इन दिनों बाहरी भू-माफियाओं की नजरें गड़ चुकी हैं। जनपद के कई ग्रामीण क्षेत्रों में गैर उत्तराखण्डी भू-माफिया सक्रिय होकर न केवल ग्रामीणों की भूमि खरीद रहे हैं, बल्कि भारी भरकम निर्माण कार्यों और अवैध भूमि समतलीकरण के जरिए पहाड़ की भौगोलिक संरचना से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। चिंताजनक बात यह है कि यह सब प्रशासन की जानकारी में होने के बावजूद भी प्रभावी रोकथाम नहीं हो पा रही है।
हाल ही में जिलाधिकारी टिहरी गढ़वाल नितिका खण्डेलवाल के निर्देशों पर भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग द्वारा तहसील प्रतापनगर अंतर्गत ग्राम पथियाणा क्षेत्र में बिना अनुमति भूमि समतलीकरण, संपर्क मार्ग निर्माण और खुदान के मामले में कार्रवाई की गई। जांच में सामने आया कि चमारखोली तोक में एक आश्रम का निर्माण कराया जा रहा था, जिसका कार्य दिल्ली निवासी मोहित यादव द्वारा कराया जा रहा था।
जांच के दौरान पाया गया कि संबंधित भूमि आवासीय प्रयोजन के नाम पर खरीदी गई थी, जबकि मौके पर जेसीबी मशीनों से बड़े स्तर पर खुदान और समतलीकरण किया गया। विभागीय जांच में लगभग 432 घनमीटर मिट्टी का अवैध खुदान सामने आया, जिस पर ₹1,03,680 का अर्थदण्ड अधिरोपित किया गया।
लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल एक लाख रुपये का जुर्माना इस प्रकार की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए पर्याप्त है? जब करोड़ों के भूमि कारोबार हो रहे हों, तब ऐसे मामूली दंड भू-माफियाओं के लिए शायद कोई मायने नहीं रखते।
गांवों की जमीन, बाहरी कारोबारियों के हाथ
दूसरी ओर मखलोगी प्रखण्ड के नकोट, खण्डकरी, सेमल्टा और आसपास के क्षेत्रों में बाहरी भू-माफिया पूरी तरह सक्रिय हो चुके हैं। ग्रामीणों से कम कीमतों में जमीन खरीदकर अब वही भूमि बाहरी पार्टियों को करोड़ों में बेची जा रही है।
सड़क किनारे की उपजाऊ और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जमीनों पर इन भू-माफियाओं की नजरें हैं। नकोट लग्गा काकड़ा, नकोट क्यारी मोटर मार्ग, नकोट रानीचैरी मोटर मार्ग और सेमल्टा जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जमीनों की खरीद-फरोख्त हो चुकी है।
ग्रामीणों को बहला-फुसलाकर उनकी पैतृक भूमि खरीद लेना और फिर उसी जमीन को व्यावसायिक परियोजनाओं में बदल देना पहाड़ के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
प्रशासन की जानकारी के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं?
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब भूमि की रजिस्ट्री प्रशासनिक स्तर पर होती है, तो क्या प्रशासन को इन खरीद-फरोख्त की जानकारी नहीं होती? यदि जानकारी है, तो फिर समय रहते निगरानी और नियंत्रण क्यों नहीं किया जाता?
लोक निर्माण विभाग की सड़कें भी इन अवैध निर्माणों और अतिक्रमणों के कारण संकरी होती जा रही हैं, जिससे भविष्य में दुर्घटनाओं और भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है। लेकिन संबंधित विभागों की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।
पहाड़ की अस्मिता बचाने की जरूरत
उत्तराखंड केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और प्राकृतिक धरोहर का प्रतीक है। यदि इसी तरह बाहरी माफिया तंत्र पहाड़ की भूमि और संसाधनों पर कब्जा करता रहा, तो आने वाले समय में स्थानीय लोग अपनी ही जमीन पर हाशिये पर पहुंच जाएंगे।
जरूरत इस बात की है कि जिला प्रशासन, राजस्व विभाग और भू-वैज्ञानिक विभाग मिलकर एक ठोस नीति तैयार करें, ताकि अवैध भूमि कारोबार, अनियंत्रित खुदान और बाहरी माफियाओं की गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।
सिर्फ कार्रवाई के समाचार जारी कर देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि जमीन स्तर पर सख्त निगरानी, पारदर्शी जांच और दीर्घकालिक नीति निर्माण की आवश्यकता है। वरना पहाड़ की पहचान धीरे-धीरे कंक्रीट के जंगलों में बदलती चली जाएगी।
