1979 में खुरेत–पुजाल्डी के जंगलों के कटान के विरुद्ध आंदोलन की प्रत्यक्ष स्मृतियाँ — सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’ की कलम से
📍 स्थान: चंबा, टिहरी गढ़वाल, 📅 अवसर: अंतर्राष्ट्रीय मृदा दिवस, ✍️ सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’
अंतर्राष्ट्रीय मृदा दिवस के अवसर पर जब पूरी दुनिया मिट्टी के संरक्षण, जल–जंगल–ज़मीन की सुरक्षा और सतत विकास की बात कर रही है, तब उत्तराखंड की धरती से जुड़ी एक ऐतिहासिक स्मृति स्वतः मन में उभर आती है — प्रख्यात पर्यावरणविद स्वर्गीय सुंदरलाल बहुगुणा जी का संघर्ष, दर्शन और जीवन-योग।
यह वही दौर था, जब 23 दिसंबर 1979 से 29 दिसंबर 1979 के बीच, टिहरी गढ़वाल के चंबा प्रखंड के खुरेत–पुजाल्डी क्षेत्र में वनों का अंधाधुंध कटान हो रहा था। इस अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने स्वयं सुंदरलाल बहुगुणा जी हमारी क्रांति भूमि सकलाना पहुंचे।
उस समय मैं राजकीय इंटर कॉलेज पुजार गांव में अध्ययनरत था और विद्यालय का जनरल मॉनिटर भी था। उसी दौरान मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ कि मैं —
- ✅ वृक्ष मानव स्वर्गीय विशेश्वर दत्त सकलानी,
- ✅ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चतर सिंह नकोटी,
- ✅ तथा अन्य साथियों के साथ
पैदल यात्रा करते हुए खुरेत–पुजाल्डी के जंगलों के कटान को रोकने के आंदोलन में बहुगुणा जी के साथ जुड़ा।
🌳 बहुगुणा जी के विचार: मिट्टी, जंगल और नदियों का जीवन–दर्शन
इस आंदोलन का सबसे बड़ा लाभ यह रहा कि मुझे सुंदरलाल बहुगुणा को केवल एक आंदोलनकारी नहीं, बल्कि एक विचारक के रूप में समझने का अवसर मिला। उनके शब्द आज भी भीतर संबल बनकर गूंजते हैं:
“हिमालय के पहाड़ केवल पत्थर की चट्टानें नहीं हैं, इनमें मिट्टी भी है। जहां थोड़ी मिट्टी है, वहां पेड़ उग गए। पेड़ों ने अपनी जड़ों से चट्टानों को तोड़कर अपने लिए स्थान बनाया। अपने जीवन के संघर्ष में उन्होंने मिट्टी बनाई और नमी का संरक्षण किया।”
वे कहते थे —
“पहाड़ी ढलानों के जंगल नदियों की मां और मिट्टी बनाने के कारखाने हैं।”
यही कारण है कि यदि हिमालय को नंगा किया गया, तो —
- कहीं सूखा आएगा
- तो कहीं विनाशकारी बाढ़
🕉️ हिमालय: केवल पर्वत नहीं, तपोभूमि है
बहुगुणा जी का मानना था कि —
“भागीरथ ने भारत को भोग नहीं, सादगी और संयम का मार्ग दिया।”
वे कहते थे कि —
- मध्य हिमालय तपोभूमि है,
- जहां ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने प्रकृति को बचाने का संस्कार दिया,
- और जहां से भारतीय संस्कृति का प्रकृति–संरक्षण का दर्शन जन्मा।
उनके अनुसार —
“वन हमारी आध्यात्मिक प्रेरणा और भौतिक समृद्धि — दोनों के स्रोत हैं।”
📝 लोककवि जीवानंद श्रीयाल की चेतावनी
बहुगुणा जी अकसर लोककवि जीवानंद श्रीयाल की पंक्तियों का उल्लेख करते थे:
“खंणी-खंणी छणी-छणी बगदो छ माटो,
उद्यार जांच को अब छै ह्वेगि बाटो।
पहाड़ु कु ल्वै-मासु माटो बगीगे,
खांण सेंण कू अब घाटो पड़ीगे।”
यह कविता आज भी पहाड़ के कटते जंगलों की व्यथा को जीवंत कर देती है।
⚠️ विकास बनाम विनाश — बहुगुणा जी का सूत्र
बहुगुणा जी का प्रसिद्ध सूत्र था:
“धार ऐंच पाणी, ढाल पर डाला,
बिजली बणावा, खाला-खाला।”
यानी — सोचिए, समझिए, फिर उपयोग कीजिए।
🌍 अंतर्राष्ट्रीय मृदा दिवस का वास्तविक अर्थ
अंतर्राष्ट्रीय मृदा दिवस हमें यह याद दिलाता है कि —
- ✅ मिट्टी केवल ज़मीन नहीं, जीवन का आधार है
- ✅ जल–जंगल–ज़मीन एक-दूसरे से अविभाज्य हैं
- ✅ इनके बिना विकास, सभ्यता और मानव अस्तित्व असंभव है
जैसा कि कुंवर प्रसून का अमर नारा है —
“मिट्टी, पानी और वयार — जिंदा रहने के आधार।”
🙏 महान पर्यावरण योद्धाओं को नमन
अंतर्राष्ट्रीय मृदा दिवस पर हमारा यह दायित्व बनता है कि —
- ✅ हम स्वर्गीय सुंदरलाल बहुगुणा,
- ✅ विशेश्वर दत्त सकलानी,
- ✅ और उन सभी ज्ञात–अज्ञात पर्यावरण योद्धाओं को नमन करें,
जिन्होंने जल, जंगल, ज़मीन और मिट्टी के संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
