ग्रेट निकोबार: विकास और विरासत के बीच खड़े राहुल गांधी
क्या भारत आर्थिक प्रगति के साथ अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहरों को भी सुरक्षित रख पाएगा?
टिहरी गढ़वाल, 05 जून 2026।
जिला कांग्रेस कमेटी टिहरी गढ़वाल के पूर्व अध्यक्ष राकेश राणा ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का हालिया अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह दौरा केवल एक राजनीतिक यात्रा नहीं था, बल्कि देश की उन प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों की ओर राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करने का प्रयास था, जो वर्तमान में बड़े विकास परियोजनाओं के दबाव का सामना कर रही हैं।
राकेश राणा ने कहा कि 26 से 28 अप्रैल 2026 तक अंडमान एवं निकोबार के दौरे के दौरान राहुल गांधी ने विशेष रूप से ग्रेट निकोबार द्वीप में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, हवाई अड्डा, टाउनशिप एवं अन्य आधारभूत संरचना परियोजनाओं के संभावित पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को लेकर चिंता व्यक्त की। उनका मानना था कि भारत की सामरिक आवश्यकताएं और आर्थिक विकास महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके साथ-साथ प्रकृति, जैव विविधता एवं स्थानीय समुदायों के अधिकारों का संरक्षण भी समान रूप से आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यपूर्ण रूप से इस महत्वपूर्ण विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर वह गंभीर विमर्श नहीं हो पाया जिसकी अपेक्षा थी। पर्यावरणीय तथ्यों, वैज्ञानिक अध्ययनों और स्थानीय समुदायों की चिंताओं पर चर्चा होने के बजाय बहस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह गई। परिणामस्वरूप मूल प्रश्न पीछे छूट गया कि क्या हम विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित कर पा रहे हैं।
राकेश राणा के अनुसार ग्रेट निकोबार केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि विश्व की दुर्लभ जैव-विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां विस्तृत कोरल रीफ (प्रवाल भित्तियां), घने उष्णकटिबंधीय वर्षावन तथा अनेक दुर्लभ एवं विलुप्तप्राय प्रजातियां पाई जाती हैं। यही कारण है कि यह क्षेत्र पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों एवं प्रकृति प्रेमियों के लिए विशेष महत्व रखता है।
उन्होंने कहा कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यहां निवास करने वाला शोंपेन समुदाय है, जिसे भारत सरकार ने “विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूह” (PVTG) की श्रेणी में शामिल किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उनके प्राकृतिक आवास, पारंपरिक जीवनशैली और सामाजिक संरचना पर अत्यधिक दबाव पड़ा तो उनकी सांस्कृतिक पहचान एवं अस्तित्व दोनों गंभीर संकट में पड़ सकते हैं।
राणा ने कहा कि लोकतंत्र में विकास परियोजनाओं पर सवाल उठाना राष्ट्रविरोध नहीं, बल्कि जनहित और उत्तरदायित्व का एक आवश्यक हिस्सा है। यदि कोई जनप्रतिनिधि स्वयं स्थल का दौरा कर परिस्थितियों का अध्ययन करता है, स्थानीय लोगों से संवाद स्थापित करता है और संभावित जोखिमों की ओर ध्यान आकर्षित करता है, तो उसके विचारों पर राजनीतिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर तथ्यों एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर विचार किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि ग्रेट निकोबार का प्रश्न केवल एक द्वीप का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस भारत की परिकल्पना से जुड़ा विषय है जो आर्थिक रूप से सशक्त होने के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत का संवेदनशील संरक्षक भी बना रहे। विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के हितों के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़े।
राकेश राणा ने कहा कि आने वाली पीढ़ियां हमसे यह अवश्य पूछेंगी कि विकास की दौड़ में हमने अपनी अमूल्य धरोहरों को बचाने के लिए क्या प्रयास किए। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि ग्रेट निकोबार जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के भविष्य पर राजनीतिक शोर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों, पर्यावरणीय चिंताओं और मानवीय दृष्टिकोण के आधार पर गंभीर राष्ट्रीय संवाद हो।
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