प्रकृति के चितेरे कवि चंद्र कुंवर वर्त्वाल की 107वीं जयंती पर श्रद्धापूर्वक स्मरण
साहित्यकार सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’ ने कहा—लंबा जीवन मिलता तो विश्व साहित्य में वर्त्वाल की पहचान और भी विराट होती
चंबा, टिहरी गढ़वाल, 20 अगस्त 2026। प्रकृति, पहाड़ और मानवीय संवेदनाओं को अपनी कविताओं में अद्भुत गहराई के साथ अभिव्यक्त करने वाले अमर कवि स्व. चंद्र कुंवर वर्त्वाल की 107वीं जयंती चंबा स्थित विज़न इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट में श्रद्धापूर्वक मनाई गई। कार्यक्रम में साहित्यप्रेमियों और प्रशिक्षणार्थी विद्यार्थियों ने महान कवि के साहित्यिक योगदान को याद करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
संस्थान की ओर से आयोजित कार्यक्रम में साहित्यकार सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’ मुख्य वक्ता रहे। उन्होंने चंद्र कुंवर वर्त्वाल के व्यक्तित्व, कृतित्व और साहित्यिक चेतना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्त्वाल हिंदी साहित्य के ऐसे विलक्षण कवि थे, जिन्होंने अल्पायु में ही अपनी रचनात्मक प्रतिभा की अमिट छाप छोड़ी।
‘लंबा जीवन मिलता तो विश्व साहित्य में और ऊंचा स्थान बनाते’
साहित्यकार सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’ ने कहा कि यदि चंद्र कुंवर वर्त्वाल को लंबा जीवन जीने का अवसर मिलता तो वे विश्व के महान प्रकृति-कवि विलियम वर्ड्सवर्थ और हिंदी के प्रकृतिवादी कवि सुमित्रानंदन पंत से भी आगे निकल चुके होते।
उन्होंने कहा कि वर्त्वाल केवल प्रकृति का वर्णन करने वाले कवि नहीं थे, बल्कि सुंदर मन और संवेदनशील आत्मा के कवि थे। उनके काव्य में प्रकृति के साथ भारतीय चिंतन, मानवीय संवेदना और भविष्य को देखने वाली दृष्टि का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
‘निशांत’ ने कहा कि चंद्र कुंवर वर्त्वाल छायावादोत्तर चेतना और भारतीय चिंतन की धारा के मूर्धन्य कवि थे। उनका कवित्व झरने के प्रवाह की तरह सहज, निर्मल और निरंतर बहने वाला था।
निराशा में भी दिखाई देती थी आशा की किरण
वक्ताओं ने कहा कि चंद्र कुंवर वर्त्वाल के जीवन और साहित्य की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उनकी आशावादी दृष्टि थी। जीवन की कठिन परिस्थितियों और निराशा के बीच भी उनके भीतर आशा और जीवन के प्रति विश्वास बना रहा।
साहित्यकार ‘निशांत’ ने कहा कि उनके व्यक्तित्व में ऋषि-मुनियों जैसी सौम्यता दिखाई देती थी। महाकवि कालिदास और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जैसे साहित्यकारों की छाप उनके चिंतन और काव्य-संसार पर दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि अत्यंत सरल और सरस व्यक्तित्व के धनी चंद्र कुंवर वर्त्वाल हिंदी साहित्य को अपनी अमूल्य रचनात्मक धरोहर देकर चले गए।
20 अगस्त 1919 को मालकोटी में हुआ था जन्म
कार्यक्रम में चंद्र कुंवर वर्त्वाल के जीवन परिचय पर भी प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने बताया कि उनका जन्म 20 अगस्त 1919 को रुद्रप्रयाग जनपद के मालकोटी गांव में भोपाल सिंह वर्त्वाल के घर हुआ था।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा नागनाथ पोखरी और पौड़ी में प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने देहरादून के डीएवी इंटर कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की तथा आगे इलाहाबाद और लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्ययन किया।
कम उम्र में ही साहित्य के प्रति उनकी गहरी रुचि विकसित हो गई थी और उनकी रचनाएं तत्कालीन प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं।
प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं रचनाएं
चंद्र कुंवर वर्त्वाल की कविताएं उस समय की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। इनमें ‘सरस्वती’, ‘विशाल भारत’, ‘चांद’, ‘प्रतीक’ और ‘क्षत्रिय वीर’ जैसी पत्रिकाओं का उल्लेख किया गया।
उनकी रचनाओं में हिमालय, प्रकृति, जीवन, सौंदर्य, संवेदना और मानवीय चेतना का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। यही कारण है कि उनकी कविताएं आज भी साहित्य प्रेमियों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करती हैं।
अल्पायु में निधन ने साहित्य जगत को पहुंचाई अपूरणीय क्षति
चंद्र कुंवर वर्त्वाल का निधन 14 सितंबर 1947 को हुआ। उनका जीवन बेहद अल्प रहा, लेकिन इसी छोटी-सी जीवन यात्रा में उन्होंने हिंदी साहित्य में ऐसा योगदान दिया, जिसने उन्हें अमर कर दिया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि इतनी कम उम्र में इतनी परिपक्व और गहन साहित्यिक दृष्टि विकसित करना अपने आप में असाधारण उपलब्धि थी। यदि उन्हें अधिक समय मिलता तो हिंदी साहित्य को उनकी ओर से और भी समृद्ध रचनाएं प्राप्त होतीं।
‘निशांत’ ने सुनाईं वर्त्वाल की कविताएं
कार्यक्रम के दौरान साहित्यकार सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’ ने चंद्र कुंवर वर्त्वाल की अनेक कविताओं का पाठ किया। उनकी कविताओं के माध्यम से विद्यार्थियों को वर्त्वाल के प्रकृति प्रेम, संवेदनशीलता और काव्यात्मक दृष्टि से परिचित कराया गया।
कविता पाठ के दौरान संस्थान में साहित्यिक वातावरण बन गया और विद्यार्थियों ने रुचि के साथ उनकी रचनाओं को सुना।
‘ऐसे कवि कई युगों बाद पैदा होते हैं’
संस्थान के प्रधानाचार्य आर.सी. बहुगुणा ने चंद्र कुंवर वर्त्वाल को स्मरण करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि ऐसे विलक्षण कवि कई युगों के बाद जन्म लेते हैं।
उन्होंने कहा कि वर्त्वाल की रचनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए साहित्यिक प्रेरणा का स्रोत हैं और विद्यार्थियों को ऐसे साहित्यकारों के जीवन एवं कृतित्व से परिचित कराना आवश्यक है।
‘पहाड़ के अमर कवि’ के रूप में किया स्मरण
संस्थान के निदेशक प्रदीप कोठारी ने चंद्र कुंवर वर्त्वाल की कविताओं और उनकी साहित्यिक भावनाओं का उल्लेख करते हुए उन्हें ‘पहाड़ का अमर कवि’ बताया।
उन्होंने कहा कि वर्त्वाल ने पहाड़ की प्रकृति और जीवन को जिस संवेदनशीलता से देखा और महसूस किया, वह उनकी कविताओं को विशिष्ट बनाता है।
कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को यह संदेश भी मिला कि अपनी भाषा, साहित्य, संस्कृति और पहाड़ की लोक-स्मृतियों को समझना और उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाना सभी की जिम्मेदारी है। इस अवसर पर वैष्णवी, दिया, सोनाली सहित संस्थान के प्रशिक्षणार्थी छात्र उपस्थित रहे।
संपादकीय टिप्पणी
चंद्र कुंवर वर्त्वाल का साहित्य केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि आज के समय में प्रकृति और मनुष्य के संबंध को समझने का माध्यम भी है। जिस हिमालयी प्रकृति को उन्होंने अपनी कविताओं में आत्मीयता के साथ महसूस किया, आज वही प्रकृति पर्यावरणीय संकट, अनियोजित विकास और पलायन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है।
ऐसे समय में वर्त्वाल को पढ़ना केवल साहित्यिक गतिविधि नहीं, बल्कि अपने पहाड़, प्रकृति और सांस्कृतिक जड़ों को समझने का प्रयास भी है। उनकी 107वीं जयंती पर उन्हें स्मरण करना तभी सार्थक होगा, जब उनकी कविताओं को केवल समारोहों तक सीमित न रखकर नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
