🌿 पुण्यासिनी धाम से हरित क्रांति की ओर एक आध्यात्मिक यात्रा
श्रावण की पावन वेला और हरियाली की पुकार
दिनांक: 2 अगस्त, 2025 | स्थान: टिहरी गढ़वाल
श्रावण मास — भारतीय पंचांग का वह पुण्यकारी समय जब आस्था अपने चरम पर होती है और भक्तगण जलाभिषेक, उपवास, पूजा-पाठ व रुद्राभिषेक में संलग्न रहते हैं। यह महीना न केवल शिवभक्ति की अभिव्यक्ति है, अपितु पर्यावरण के प्रति हमारी पारंपरिक जिम्मेदारियों की पुनः स्मृति भी है। जैसे-जैसे कांवड़ यात्रा अपने चरम की ओर अग्रसर होती है, वैसे-वैसे प्रकृति भी वर्षा की बूँदों से हरीतिमा ओढ़ लेती है। ऐसे में यदि शिव के प्रिय रुद्राक्ष और चंदन के पौधे धरा पर रोपित हों, तो यह आस्था और प्रकृति के मिलन का अनुपम प्रतीक बन जाता है।
रुद्राक्षारोपण: महादेव को समर्पित हरियाली का संकल्प
भगवान शिव को रुद्राक्ष अति प्रिय हैं। कहते हैं, सृष्टि के कल्याण हेतु शिव के अश्रुओं से रुद्राक्ष का जन्म हुआ। इसी विश्वास और आध्यात्मिक भाव से ओत-प्रोत होकर जब किसी तीर्थ-स्थल या मार्ग पर रुद्राक्ष के पौधे लगाए जाते हैं, तो वह मार्ग केवल भौतिक नहीं, अपितु आत्मिक यात्रा का भी माध्यम बन जाता है। ऐसा ही एक संकल्प टिहरी जनपद की पुण्यासिनी घाटी में लिया गया, जहां “फक्वा पानी से भमोरिया धार तक” सड़क के किनारे 20 रुद्राक्ष और 10 चंदन के वृक्षों का रोपण कर प्रकृति और परमात्मा के प्रति कृतज्ञता प्रकट की गई।
पुण्यासिनी मंदिर और “छोटी काशी” की हरियाली यात्रा
“छोटी काशी” के नाम से प्रसिद्ध इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता किसी से छुपी नहीं है। मां पुण्यासिनी का मंदिर इस क्षेत्र की आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है। जब इस पुण्यभूमि की ओर जाने वाला रास्ता हरे-भरे वृक्षों से आच्छादित हो जाएगा, तो वह दृश्य न केवल नेत्रों को शीतलता देगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश भी देगा।
हर रुद्राक्ष का पौधा एक जीवंत स्तुति है। हर चंदन की शाखा में शिव का सौम्य रूप प्रतिबिंबित होता है। ऐसे में जब भक्त पुण्यासिनी मंदिर की ओर बढ़ते हुए इस हरे-भरे मार्ग से गुजरेंगे, तो यह न केवल उनके कदमों का मार्ग प्रशस्त करेगा, बल्कि उनके अंतःकरण में भी हरियाली का संचार करेगा।
पर्यावरण और अध्यात्म: सहअस्तित्व की अवधारणा
भारतीय दर्शन में प्रकृति और परमात्मा के बीच द्वैत नहीं, अपितु अद्वैत का भाव है। हमारे शास्त्रों में वृक्षों को देवता समान पूज्य माना गया है। पीपल को विष्णु, बरगद को ब्रह्मा, और बेल पत्र को शिव का प्रतीक बताया गया है। इसी कड़ी में रुद्राक्ष का पौधा भी एक सजीव मंदिर है — जिसमें शिव की चेतना रची-बसी है।
आज जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्रदूषण जैसे संकट हमारी धरती को जकड़े हुए हैं, तब इस प्रकार के वृक्षारोपण अभियान केवल प्रकृति को पुनर्जीवित करने का प्रयास नहीं, बल्कि हमारी आत्मा को भी जागृत करने का माध्यम हैं।
वृक्षारोपण एक ‘कर्मयोग’: संकल्प से सिद्धि तक की यात्रा
जब कोई ग्रामीण, कोई भक्त, कोई पर्यावरण प्रेमी, अपने श्रम से एक छोटा-सा पौधा रोपित करता है, तो वह केवल मिट्टी नहीं खोद रहा होता — वह भविष्य की नींव रख रहा होता है। इस कर्म में कोई दिखावा नहीं होता, केवल समर्पण होता है। रुद्राक्ष के पौधों को रोपित करना मानो शिवलिंग की स्थापना करना है — हर पौधा एक यज्ञ है, जिसमें हमारी इच्छाएं नहीं, हमारी संवेदनाएं आहुति बनती हैं।
पवित्रता, पावनता और पर्यावरणीय चेतना का अनूठा संगम
इस प्रयास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह “धार्मिक आस्था” को “पर्यावरणीय संकल्प” से जोड़ता है। आमतौर पर वृक्षारोपण को सरकारी औपचारिकता या पर्यावरण दिवस की रस्म के तौर पर देखा जाता है, लेकिन जब यह क्रिया किसी मंदिर मार्ग, किसी तीर्थभूमि, किसी श्रावण मास के दौरान होती है, तो उसकी आध्यात्मिक शक्ति कई गुणा बढ़ जाती है।
स्थानीय समाज और युवाओं की भागीदारी: हरियाली को जन आंदोलन बनाएं
इस प्रकार के वृक्षारोपण अभियान तभी सफल हो सकते हैं जब स्थानीय लोग — विशेषकर युवा वर्ग — इस प्रयास में भागीदार बनें। “मेरा वृक्ष, मेरी जिम्मेदारी” का मंत्र देकर हर ग्राम पंचायत में रुद्राक्ष, चंदन, आंवला, बेल आदि पौधों को रोपित किया जा सकता है। विद्यालयों और मंदिर समितियों को साथ लेकर ‘श्रावण वृक्ष महोत्सव’ जैसा अभियान चलाया जा सकता है।
वृक्ष भी प्रार्थना करते हैं: प्रकृति का मौन संवाद
हर पौधा, हर शाखा, हर पत्ता एक मौन प्रार्थना है। वे कहते नहीं, लेकिन उनका हर झुकाव, हर लहर, हर फूल — प्रभु की आराधना है। जो वृक्ष आज छोटे-छोटे पौधों के रूप में लगाए जा रहे हैं, वे आने वाले वर्षों में आस्थावानों के लिए छांव बनेंगे, पक्षियों के लिए घर बनेंगे और पर्यावरण के लिए आशा बनेंगे।
पुनीत अभियान, अपूर्व प्रेरणा: संकल्प का विस्तार करें
यह एक संकल्प है — पुण्यासिनी मंदिर की ओर बढ़ते रास्ते को हरा-भरा करना। यह अभियान केवल एक मार्ग तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे टिहरी जनपद, पूरे उत्तराखंड, और फिर देशभर के उन तीर्थस्थलों तक पहुंचे जहां श्रद्धालुओं का आवागमन होता है।
हर मंदिर का मार्ग, हर नदी का किनारा, हर देवस्थल का परिसर यदि हरे-भरे वृक्षों से सजाया जाए तो हमारी आस्था भी पुष्पित होगी और हमारी धरती भी।
वृक्षारोपण के साथ ध्यान और जप: शिवमय सृष्टि की ओर
श्रावण मास में शिव नाम का जप और रुद्राक्ष का वृक्ष — ये दोनों जब एक साथ किसी भूमि पर अंकुरित होते हैं, तो वह भूमि तपोभूमि बन जाती है। यदि रुद्राक्षारोपण के समय ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप किया जाए, तो यह केवल पर्यावरण ही नहीं, आत्मिक चेतना का भी संवर्धन करेगा।
निष्कर्ष: हर पौधा बने शिव का प्रतिनिधि
जब श्रावण मास में हर भक्त भगवान शिव के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करता है, तो आइए हम यह श्रद्धा केवल जलाभिषेक या व्रत तक सीमित न रखें, बल्कि उसे प्रकृति सेवा के रूप में विस्तारित करें। रुद्राक्ष, चंदन और अन्य धार्मिक पौधों का रोपण कर हम शिव को धरती पर आमंत्रित करें।
शिव स्वयं विराजेंगे वहां, जहां रुद्राक्ष की छाया होगी। पुण्यासिनी जैसी शक्तिपीठें और अधिक पावन हो जाएंगी जब उनका मार्ग हरियाली से आच्छादित होगा।
🪔 ॐ नमः शिवाय। हर वृक्ष शिव का प्रतिरूप है। चलिए, श्रावण में उन्हें धरती पर साकार करें।
लेखकीय सहयोगः वयोवृद्ध ज्योतिषाचार्य श्री हर्षमणी बहुगुणा जी,
सेवानिवृत प्रधानाचार्य
ग्राम साबली, रानीचौरी, टिहरी गढ़वाल।
