“असत्य पर सत्य की जीत” — कांग्रेस ने कहा लोकतंत्र और न्यायपालिका की ऐतिहासिक विजय
सीता देवी का नामांकन सुप्रीम कोर्ट से भी मान्य, चुनाव चिन्ह ‘कप-प्लेट’ के साथ मैदान में उतरेंगी
स्थान: टिहरी गढ़वाल | तिथि: 2 जुलाई 2025 भुत्सी जिला पंचायत सीट से प्रत्याशी श्रीमती सीता देवी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें उनका नामांकन अवैध तरीके से रद्द करने को गलत ठहराया गया था। इससे भाजपा को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है, वहीं कांग्रेस और सीता देवी समर्थकों में उत्साह की लहर है।
नामांकन खारिज करने का पूरा मामला
10 जुलाई 2025 को रिटर्निंग अधिकारी ने सीता देवी का नामांकन रद्द कर दिया था। भाजपा की अधिकृत प्रत्याशी ने यह आरोप लगाया था कि उनका अदेयता प्रमाण पत्र फर्जी है। जबकि संबंधित साधन सहकारी समिति ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रमाण पत्र असली है और एक नया प्रमाण पत्र भी दिया गया, जिसे रिटर्निंग अधिकारी ने अस्वीकार कर दिया। परिणामस्वरूप, सीता देवी का नामांकन रद्द कर भाजपा प्रत्याशी को विजेता घोषित कर दिया गया था।
उच्च न्यायालय से सुप्रीम कोर्ट तक की कानूनी लड़ाई
सीता देवी ने इस फैसले को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिसने रिटर्निंग अधिकारी की कार्यशैली पर टिप्पणी करते हुए सीता देवी के पक्ष में आदेश पारित किया। लेकिन भाजपा प्रत्याशी ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सीता देवी के अधिवक्ताओं — अभिजय नेगी, शिग्धा तिवारी और आयुष पोखरियाल — ने सुप्रीम कोर्ट में दमदार पैरवी की और कोर्ट ने उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए भाजपा की याचिका खारिज कर दी।
सीता देवी की भावुक प्रतिक्रिया
सीता देवी ने कहा,
“मुझे जनता ने प्रत्याशी बनाया, लेकिन मुझसे चुनाव लड़ने का अधिकार भी छीनने की कोशिश हुई। मां सुरकंडा देवी ने मुझे शक्ति दी और मैंने संकल्प लिया कि मैं न्याय की लड़ाई लड़ूंगी। आज सुप्रीम कोर्ट का निर्णय मेरे लिए नहीं, बल्कि हर उस बेटी के लिए है जिसे चुप करवाने की कोशिश होती है।”
उन्होंने जनता से अपील की कि “24 जुलाई को ‘कप-प्लेट’ चुनाव चिन्ह पर मोहर लगाकर साजिशों को जवाब दें।”
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: कांग्रेस का भाजपा पर हमला
- प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता शांति प्रसाद भट्ट ने फैसले को “सत्य की जीत” बताते हुए कहा कि भाजपा ने सत्ता का दुरुपयोग किया और अब उसे माफी मांगनी चाहिए।
- जिलाध्यक्ष राकेश राणा और विधायक विक्रम सिंह नेगी ने कहा कि “रिटर्निंग अधिकारी ने सत्ता के दबाव में काम किया।”
- पूर्व जिला पंचायत सदस्य अखिलेश उनियाल और आमेन्द्र बिष्ट ने कहा कि “यदि न्यायपालिका नहीं होती, तो लोकतंत्र दम तोड़ देता।”
कानूनी पहलू और संवैधानिक पक्ष
कांग्रेस नेताओं ने यह भी कहा कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का कार्यकाल 8 माह पूर्व ही समाप्त हो चुका था, लेकिन भाजपा सरकार ने जानबूझकर चुनाव नहीं कराए। अब जब चारधाम यात्रा, कांवड़ यात्रा और भारी बारिश के बीच चुनाव कराए जा रहे हैं, तो यह जनता की जान जोखिम में डालना है।
कांग्रेस ने 73वें संविधान संशोधन और अनुच्छेद 324 से 329 तक का हवाला देते हुए कहा कि
“निर्वाचन से पहले सरकार का कर्तव्य होता है परिसीमन, आरक्षण और मतदाता सूची को अंतिम रूप देना।”
“जबकि चुनाव आयोग का काम होता है अधिसूचना, नामांकन, स्क्रूटनी, चुनाव चिन्ह, मतदान, मतगणना और परिणाम घोषित करना।”
