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जब सामूहिकता, प्रेम और संस्कार ही विवाह की मूल आत्मा थे
रिपोर्ट: ज्योतिषाचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा
आज की शादियों में साज-सज्जा, डीजे, लाइटिंग, डिज़ाइनर वेशभूषा, बैंक्वेट, होटल बुकिंग और दिखावटी रस्मों ने पारंपरिक विवाह समारोहों को कहीं पीछे छोड़ दिया है। परंतु 1970-80 के दशक में उत्तराखंड के गाँवों में शादियाँ केवल सांस्कृतिक विधि-विधान नहीं थीं, बल्कि पूरे गाँव की आत्मा, प्रेम, सहयोग, संवेदना और सामूहिक श्रम का अनोखा उत्सव थीं।
आप यह कथा पढ़ेंगे, तो शायद एक बार फिर उसी पुरानी भीनी खुशबू से जुड़ जाएंगे।
पुरानी शादी — चिंता नहीं, संस्कार थे
छोटी बहन अठारह वर्ष की हो चली थी। पिताजी और गाँव वालों को उसकी शादी की चिंता होने लगी। कुलपुरोहित के माध्यम से रिश्ता तय हुआ। होने वाले ससुरजी आए, रात के भोजन के बाद बात हुई।
लड़का दिल्ली में सरकारी नौकरी में है — यह बताया गया, पर किस पद पर है, कितनी तनख्वाह है — यह किसी ने नहीं पूछा।
हाँ, चूंकि मंगसीर का महीना था, पिताजी ने केवल अनाज के बारे में पूछा।
उन्होंने बताया —
- मंदुवा — द्वि दूण
- झंगोरा — चार दूण
- धान — पाँच दूण
- नौरंगी दाल — पूरे साल के लिए पर्याप्त
बस… और क्या चाहिए? रिश्ता मंजूर।
फाल्गुन में शादी की तारीख बनी।
तब “लड़का-लड़की दिखाई” मात्र औपचारिकता थी।
तीन महीने का सामूहिक इंतज़ाम
पिताजी ने तीन महीने में सारा सामान जुटा लिया।
लकड़ी फाड़ने से ही शादी का माहौल शुरू।
- सारे गाँव के लोग जंगल जाकर लकड़ी फाड़ लाते
- महिलाएँ लकड़ी लाकर एक जगह जमा करतीं
- गुड़ का हलवा बांटा जाता
- यह सामूहिकता ही विवाह की पहली रस्म थी
रिश्तेदारों में नियौता देने गाँव के 2-3 आदमी अलग से जाते।
दुकान से शादी का सामान लाने भी गाँव के लोग ही जाते, न कोई शाला, न साढ़ू, क्योंकि बाहरी दखल गाँवों में चलती ही नहीं थी।
दर्जी, लोहार, औजी — सबकी सामाजिक जिम्मेदारी
सामान आ जाने के बाद:
- दर्जी सादी सिलता
- लोहार औज़ार दुरुस्त करता
- औजी (पारंपरिक संगीतकार) तय होते
- गाँव के विश्वासपात्र गुंदरू काका पूरा स्टोर संभालते
गाँव में यह व्यक्ति एक संस्था जैसा माना जाता था।
शादी के दिन — पूजा, संगीत, भोज, सामूहिक श्रम
सुबह पंडित जी पंहुचते।
उसके बाद झाबा दादा, सुंदर बढ़ई बजाकर बैठ जाता।
महिलाएँ तिमले के पत्ते ले आतीं।
गाय के गोबर से चौक लीपा जाता, गणेश पूजा, बंध शुरू।
मांगलों की मधुर सुरीली भौंण — इससे बढ़कर संगीत कहीं नहीं।
बांद देने वाली हर महिला की आँखों में अपनी बेटी के याद के आँसू।
सरूली (दुल्हन) की आँखों से झरझर आँसू, और मांगल की धुन — मानो दोनों एक साथ बह रही हों।
शाम — बारात का स्वागत, सम्मान और आतिथ्य
दूर ढोल की आवाज सुनते ही गाँव के युवक मशालें लेकर बारात के स्वागत को निकल जाते।
गैस पंचलैट फिट करना, वेदी बनाना, ताड़ की रोशनी, सब कुछ सामूहिक।
स्वागत का पारंपरिक मंत्र:
“स्वागत श्रीवर, स्वागत गुरुवर!
वर-वधू की जोड़ी अमर रहे!”
बारातियों के लिए चाय, बीड़ी, सुर्ती — सम्मानपूर्वक।
न कोई कैटरिंग, न कोई नकली दिखावा।
सब श्रम से, प्रेम से।
गालियाँ — रस, हंसी और अपनापन
गढ़वाल की शादियों में “मीठी गालियों” का अद्भुत प्रचलन।
महिलाएँ ऐसा माहौल बनातीं कि बाराती भी मुस्कुरा उठें।
यह गौरीपधार का लोक आनंद था।
रात — शादी, गोत्राचार, सामाजिकता
रात को बाल मंगल दल बारात को भोजन करवाता।
साड़ी मोड़कर बेटियाँ पत्तल लगातीं।
आधी रात गोत्राचार, कुल से बेटी का दान, मामा का सत्कार —
यह सब केवल विधि नहीं था, गाँव की निष्ठा और संस्कार थे।
विदाई — आँसुओं का सागर
सुबह विदाई का वक्त आया।
डोला सजा।
मामा ने बेटी को गोद में उठाया, डोले में बिठाया।
सरूली जोर-जोर से रोने लगी —
उसके आँसू, नथुनी की सिहरन,
और समूचे गाँव की रुलाई —
यह दृश्य कोई भी पत्थर-सा हृदय पिघला देता।
मायके की सबसे कठिन घड़ी — विदाई।
माँ — खाली आंगन, खाली चौका, खाली मन
विदाई के बाद माँ —
फिर वही गाय-भैंस, घास-न्यार, खेत, रसोई।
परंतु अब हर काम में गुड़िया की याद।
भैंस भी कम दूध देती, क्योंकि गुड़िया ही उसकी हथ्या थी।
रात को जब चूल्हे पर रोटी पकती,
दीपू किताब पढ़ता,
पिताजी रेडियो सुनते —
अचानक आग भभड़ाने लगती,
माँ कह उठती — “अरे म्यारी गुड़िया होली याद कन्नी!”
आकाशवाणी से गीत:
“घुघुती घुराण लगी मेरा मैत की…”
और माँ के आँसू आटे में गिरते जाते।
दीपू भी रो उठता।
कैसा भावनात्मक परिवार…
ससुराल की चुनौतियाँ — सदियों की कहानी
गुड़िया ससुराल में।
सास बहू दोनों अपने साम्राज्य की स्वामिनी —
इसलिए तनाव स्वाभाविक।
गुड़िया सहनशील बहू,
फिर भी सास बिना आलोचना के चैन नहीं।
घास काटते समय पहाड़ देखकर
गुड़िया को मायका दिखाई देता।
अँसे का टुकड़ा खाने बैठती,
और रो उठती…
अड़सा गले में फँसने तक की दास्तान!
जब दीपू आया — पुनर्मिलन की अनोखी खुशी
जंगल में एक दिन दीपू दिखा।
दोनों ने एक-दूसरे को भेंट लिया।
आँसू — मिलन के, स्नेह के, याद के।
और फिर गुड़िया मायके आ गई।
वहाँ की आजादी, वात्सल्य, हँसी-गप्पें —
जैसे जीवन फिर से खिल गया।
समय बदला — मोबाइल आया, संस्कृति बदली
माँ और गुड़िया अब रोज बातें कर लेती हैं,
मोबाइल ने दूरी मिटाई, पर…
भावनाओं की गहराई, गप्पों की मिठास,
आँसुओं का स्पर्श — वह कहीं खो गया।
अब घरों में टीवी, मोबाइल, इंटरनेट ने
सांस्कृतिक आत्मीयता को धीरे-धीरे सोख लिया।
रिश्ते अभी भी हैं,
पर संचार क्रांति ने एक लक्ष्मण रेखा खींच दी।
निष्कर्ष
1970-80 के दशक की शादियाँ केवल विवाह नहीं थीं —
वे गाँव की सामूहिकता, प्रेम, कर्तव्य, श्रम, संवेदना, संस्कृति और आत्मा की जीवंत अभिव्यक्ति थीं।
आज विवाह एक फिल्म जैसा, एक प्रोडक्शन जैसा बन गया है।
परंतु पुरानी शादियाँ जीवन की वास्तविक कविता थीं।
Disclaimer:
यह लेख उत्तराखंड की पारंपरिक विवाह संस्कृति पर आधारित लोक-स्मृति, अनुभव और सामाजिक परंपराओं का साहित्यिक चित्रण है। इसका उद्देश्य सांस्कृतिक विरासत का दस्तावेजीकरण है, न कि किसी व्यक्ति, वर्ग या समुदाय की आलोचना।
