राज्य में बायोफ्यूल आधारित मॉडल को मिली बड़ी सफलता, 1 लाख किलो से अधिक इस्तेमाल किया गया तेल सुरक्षित रूप से एकत्र
देहरादून।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के दिशा-निर्देशों और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के मार्गदर्शन में उत्तराखंड में खाद्य तेल के पुनः उपयोग पर अंकुश लगाने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। स्वास्थ्य सचिव एवं आयुक्त FDA डॉ. आर. राजेश कुमार के नेतृत्व में RUCO (Repurpose Used Cooking Oil) मिशन उत्तराखंड में नई ऊंचाई पर पहुंच रहा है।
फूड डिलीवरी एप्स और रेडी-टू-ईट संस्कृति के बढ़ते चलन के बीच, एक बार इस्तेमाल किए जाने वाले खाद्य तेल को बार-बार गर्म करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। शोध बताते हैं कि दोबारा गर्म किया गया तेल शरीर में हानिकारक एल्डिहाइड्स, ट्रांस फैट और कैंसरकारी तत्व पैदा करता है, जो हार्ट डिजीज, कैंसर, हाई ब्लड प्रेशर और लिवर डैमेज का खतरा बढ़ाते हैं।
इसी गंभीर समस्या से निपटने के लिए FSSAI ने वर्ष 2018 में देशव्यापी RUCO मिशन की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य इस्तेमाल किए गए खाद्य तेल को दोबारा भोजन में उपयोग होने से रोकना और उसे बायोफ्यूल में परिवर्तित करना है।
RUCO मिशन का महत्व और उत्तराखंड की उल्लेखनीय प्रगति
अपर आयुक्त FDA ताजबर सिंह जग्गी बताते हैं कि बार-बार गर्म किए गए तेल में बनने वाले ज़हरीले रसायन कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे कैंसर सहित गंभीर बीमारियों की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
ORF की 2022 की रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया कि शहरी भारत में लगभग 60% खाना पकाने वाला तेल एक बार उपयोग होने के बाद भी किसी न किसी रूप में खाद्य श्रृंखला में वापस आ जाता है। यह एक बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है।
2018 की राष्ट्रीय बायोफ्यूल नीति भी इस्तेमाल किए गए खाद्य तेल को बायोडीज़ल में बदलने को प्रोत्साहित करती है। इसी नीति के अनुरूप RUCO ने एक प्रभावी आपूर्ति तंत्र तैयार किया, ताकि तेल पुनः भोजन में न जाए और सुरक्षित रूप से उद्योगों के माध्यम से पुनर्चक्रित हो सके।
डॉ. राजेश कुमार के नेतृत्व में उत्तराखंड ने इस मिशन को मिशन मोड में लागू करते हुए मॉडल राज्य का दर्जा प्राप्त किया है। राज्य में व्यापक जन-जागरूकता, प्रशिक्षण, निरीक्षण और तकनीकी निगरानी से इसे जनता की भागीदारी से जोड़ा गया।
5 वर्षों में रिकॉर्ड उपलब्धि: 1,06,414 किलो इस्तेमाल किया गया तेल सुरक्षित रूप से संग्रहीत
RUCO मॉडल की शुरुआत 2019 में हुई, जहां पहले चरण में केवल 600 लीटर तेल एकत्र हुआ था। लेकिन महज पांच वर्षों में, उत्तराखंड का यह आंकड़ा 1,06,414 किलो तक पहुंच गया — जो एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।
चारधाम यात्रा 2025 में यह मॉडल पहली बार बड़े पैमाने पर लागू
यात्रा मार्ग पर रेस्टोरेंट, ढाबों और खाद्य कारोबारियों को प्रशिक्षित किया गया।
इस दौरान 1,200 किलो इस्तेमाल किया गया तेल एकत्र कर बायोफ्यूल में बदला गया, जिससे:
यात्रियों को सुरक्षित भोजन उपलब्ध हुआ
पर्यावरणीय प्रदूषण में कमी आई
खाद्य सुरक्षा नियमों का पालन अधिक मजबूत हुआ
सफलता का श्रेय किसे?
यह उपलब्धि केवल सरकारी तंत्र की नहीं, बल्कि👇
खाद्य कारोबारियों
होटल एवं रेस्टोरेंट संचालकों
छात्रों और स्वयंसेवी संस्थाओं
FDA अधिकारियों और निरीक्षकों
की सक्रिय भागीदारी का परिणाम है।
Eat Right India – RUCO Initiative के नोडल अधिकारी गणेश कंडवाल की महत्वपूर्ण भूमिका
इस अभिनव मॉडल को आगे बढ़ाने में उप आयुक्त और नोडल अधिकारी गणेश कंडवाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
उनके नेतृत्व में यह पहल दून मॉडल के रूप में विकसित हुई, जिसकी FSSAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने भी प्रशंसा की है।
अब इसे गढ़वाल और कुमाऊं में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है, जिससे राज्य में:
खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता मानक, तकनीकी निगरानी, पुनर्चक्रण और बायोफ्यूल उत्पादन को और मज़बूत किया जाएगा।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी-
“जनता के स्वास्थ्य से किसी भी स्थिति में समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। इस्तेमाल किए गए तेल का दोबारा उपयोग रोकना केवल नियम लागू करना नहीं, बल्कि नागरिकों की सेहत का संरक्षण है। उत्तराखंड ने RUCO को सामाजिक जागरूकता की मुहिम बनाकर देश के सामने नया मानक स्थापित किया है। हमारा लक्ष्य स्वस्थ उत्तराखंड है और इसे और अधिक व्यापक रूप से आगे बढ़ाया जाएगा।”
स्वास्थ्य सचिव एवं आयुक्त FDA डॉ. आर. राजेश कुमार-
“RUCO अभियान उत्तराखंड में मिशन मोड में लागू किया जा रहा है। हमारा लक्ष्य स्पष्ट है — एक बार इस्तेमाल होने वाला खाद्य तेल किसी भी हालत में खाद्य श्रृंखला में वापस नहीं जाना चाहिए। राज्य में फूड बिजनेस ऑपरेटरों, होटलों, रेस्टोरेंट्स, ढाबों और सभी संबंधित कारोबारियों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। आगामी चरण में हम तकनीकी निगरानी, आधुनिक संग्रहण प्रणाली और बायोफ्यूल उत्पादन क्षमता को और मजबूत करेंगे। यह न केवल स्वास्थ्य सुरक्षा बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।”
