कुम्भ महापर्व: 2025
सूर्य के मकर राशि पर प्रवेश करने पर होता है अति दुर्लभ कुम्भ योग
वृषराशि पर गुरु के होने पर, सूर्य के मकर राशि पर प्रवेश करने पर अति दुर्लभ कुम्भ योग होता है और माघ माह की अमावस्या को सूर्य व चंद्रमा मकर राशि पर हों व गुरु वृष राशि पर हों तो तब प्रयाग राज में कुम्भ योग होता है उस दिन त्रिवेणी स्नान का महत्व और भी बढ़ जाता है।*
प्रयागे माघमासे तु त्र्यहं स्नानस्य यद्भवेत् ।
नाश्वमेधसहस्त्रेण तत्फलं लभते भुवि ।।
प्रयाग राज में प्रात:, मध्याह्न व सायंकाल में स्नान करने से जो फल प्राप्त होता है वह हजार अश्वमेध यज्ञ करने से भी नहीं मिलता है।
समुद्र मन्थन से चौदह रत्न निकले, शंख निकलने के बाद धन्वंतरि अमृत कुम्भ को लेकर प्रकट हुए, देवताओं के संकेत समझकर इन्द्र पुत्र जयन्त अमृत कुम्भ को लेकर भागे, शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्य अमृत कुम्भ छीनने जयन्त के पीछे दौड़े, आकाश मार्ग में दैत्यों ने जयन्त को घेर लिया इसी समय देवता भी जयन्त की रक्षा हेतु वहां आ गए, देवों व दैत्यों में बारह दिनों तक युद्ध चला।
इस संघर्ष में अमृत कलश से पृथ्वी के चार स्थानों में अमृत की बूंदें गिरी , वे चार स्थल हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन तथा नासिक थे। देवताओं के बारह दिन मानवों के लिए बारह वर्षों के बराबर होते हैं अतः कुम्भ पर्व एक स्थान में बारह वर्ष बाद आता है, यह पर्व लगभग ढाई महीने तक चलता है।
हरिद्वार में कुम्भ पर्व मेष राशि के सूर्य व कुम्भ राशि के बृहस्पति पर होता है। उज्जैन में जब मेष राशि का सूर्य व सिंह राशि का बृहस्पति हो तब होता है। व नासिक का कुम्भ सिंह राशि के सूर्य व वृश्चिक राशि के गुरु पर होता है। कुम्भ स्नान का महत्व अभूतपूर्व है, हजार अश्वमेध यज्ञ व लाख बार पृथ्वी की परिक्रमा करने से जो फल प्राप्त होता है वहीं फल कुम्भ स्नान करने से मिलता है। कुम्भ महापर्व में जाति, धर्म, भाषा, सम्प्रदाय, संस्कृति, साहित्य, राज्य, दर्शन, वेशभूषा का संगम दृष्टि गत होता है जो भारत की अनेकता में एकता को परिलक्षित करता है।
यह सर्व विदित है कि महाराज हर्षवर्धन अपने मन्त्री, तथा अपने अधीनस्थ राजाओं के साथ तीर्थ राज प्रयाग में जाते थे व अपना सर्वस्व दान करते थे।
कुम्भ पर्व एक महत्वपूर्ण और सार्वभौम महापर्व माना जाता है, जिसमें बहुत बड़े मेले का आयोजन होता है, यह पर्व भारतवर्ष का सबसे बड़ा मेला है शायद विश्व में भी इतना बड़ा आयोजन कहीं पर भी नहीं होता है। शाब्दिक रूप से कुम्भ का अर्थ घड़े से है, कुम्भ का अभिप्राय विश्व ब्रह्माण्ड से भी है अर्थात विश्व भर के लोग जहां एकत्रित हों वहां कुम्भ मेला आयोजित होता है।
हम भारतीय धन्य हैं कि हमारे देश में ऐसा होता है जिसे देखने आत्मसात करने, कुछ सीखने, कुछ समझने विश्वभर के लोग आते हैं और हमारी संस्कृति को अपनाने का प्रयास करते हैं। भारत में हरिद्वार व प्रयागराज में अर्ध कुम्भ भी मनाया जाता है।
मकर संक्रांति से महा शिवरात्रि तक सामान्य रूप से कुम्भ महापर्व चलेगा किन्तु उसके बाद भी निरन्तर मां गंगा का आंचल भारतीय जन मानस का पाप, कलुषितता को साफ करता रहेगा, शायद इस महापर्व पर पौष का समापन सौर व चान्द्र दोनों तरह से 13 जनवरी को होने से कुम्भ महापर्व का एक स्नान बढ़ गया और श्रद्धालुओं को पुण्य का लाभ अधिक मिला, आकलन में कुछ त्रुटि भी हो सकती है।
परन्तु हर उन्नीस वर्ष बाद ऐसा योग बनता है किन्तु कुम्भ पर्व बारह वर्ष बाद आता है ऐसे में 190 वर्ष बाद यह सुयोग मिलेगा किन्तु कुम्भ महापर्व 192 वर्ष बाद आएगा, ग्रहों की गति के कारण व संकेत से 156 वर्षों की गणना की जा सकती है। परन्तु जो भी हो, यह महापर्व अद्वितीय है, अलौकिक है, दैवीय है। इस कुम्भ महापर्व पर आप सबको सरहद का साक्षी परिवार की तरफ से बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।
प्रस्तुति: आचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा
