[su_highlight background=”#0d1fa3″ color=”#fffcfe”]सरहद का साक्षी @कवि : सोमवारी लाल सकलानी,निशांत,[/su_highlight]
प्रकृति ने हमें अनुपम सौंदर्य का खजाना प्रदान किया है। देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में देवताओं के वास है। आदि काल से वर्तमान तक यहां की धर्म, संस्कृति, प्रकृति तथा लोक प्रवृति का बड़ा सामंजस्य रहा है। आदिकाल में यह मनीषियों की भूमि रही है। स्वर्ग भूमि, स्वर्ण भूमि, उत्तर पथ, देवभूमि ,केदारखंड / मानस खंड आदि अनेक नामों से यह प्रख्यात रही है।

मध्यकाल में गढ नरेशों के द्वारा यहां की धर्म और संस्कृति को जिंदा रखने का भरसक प्रयास किया गया। यहां तक की गढ़वाल नरेश स्वयं “बोलांदा बद्री” या “बद्रीश” माना जाता था। राजतंत्र में यह दैवीय सिद्धांत की व्यवस्था थी और राजा को देवतुल्य मानने के कारण जन -जन के अंदर एक विश्वास था। श्रद्धा थी। अनुशासन था। दुष्कर्म से मनुष्य डरता था। उस युग में प्रकृति भी मनुष्य का साथ देती थी और जीवन यापन वन, कृषि, पशुपालन, कुटीर उद्योग के साथ-साथ धार्मिक व्यवस्था के अनुरूप चलता था। संपूर्ण उत्तराखंड में एक सनातन संस्कृति थी और लोग उसका अनुपालन करते थे।
व्यवस्था बनाने के लिए “पाप ” शब्द का भी इस्तेमाल किया गया। किसी भी बुरे कार्य को हम पाप मानते थे। कालांतर में देश काल और परिस्थितियां बदली भौतिकवाद की अंधी होड़ में लोगों ने देवभूमि के अस्तित्व को कमतर कर दिया और अनेक प्रकार के आपराधिक कृत्य, दुष्कर्म, बुराइयों में जनमानस लिप्त हुआ जिसका खामियाजा प्राकृतिक और मानवीय त्रासदी के रूप में लोगों को भुगतना पड़ा। प्राकृतिक न्याय भी हुआ और अनेक प्रकार की आपदा क्षेत्र में आई। समय-समय पर फलती- फूलती संस्कृति भी नष्ट हो गई क्योंकि जब जंगल में आग लगती है, तो सूखे के साथ हरे भी जल जाते हैं।
अंधकार का एक दिन अंत होता है और कोई भी व्यवस्था चिर काल तक स्थाई नहीं रहती है ।परिवर्तन समय की मांग है। इसलिए हमारे जो देवस्थान और तीर्थ स्थल थे वह आज भले ही पर्यटक स्थलों के रूप में बढ़ रहे हो लेकिन कहीं ना कहीं धार्मिक भाव और अपने पौराणिक देवी देवताओं के प्रति हमारे मन में आज भी श्रद्धा भाव बरकरार है। यहां तक कि समय-समय पर देवात्मायें पश्वा के रूप में अवतरित होती हैं और मानव जाति के कल्याण के लिए प्रयास करती रहती हैं।
नागाधिराज हिमालय की उतुंग चोटियों पर देवी -देवताओं का निवास माना जाता है। इसी क्रम में मैं आज उल्लेख कर रहा हूं टिहरी जनपद में स्थित ” रैसाड़ देवता” के मंदिर का। टिहरी जनपद में चंबा शहर से मात्र 05 किलोमीटर की दूरी पर तथा नई टिहरी शहर से भी 06 किलोमीटर की दूरी पर, मध्य भाग में एक उच्चस्थ स्थल पर रैंसाड देवता का मंदिर अवस्थित है।
बांज के घने जंगल के बीच रैसाड़ देवता जो कि शिव का रूप है, एक क्षेत्रपाल देवता के रूप में लोगों की मनोकामना और मनोरथ पूर्ण करते हैं। चंबा से नई टिहरी की ओर जाने पर या नई दिल्ली से चंबा की ओर आने पर भोनाबागी से मात्र एक – डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर रैंसाड देवता का मंदिर बना है।
पुरानी मान्यता के अनुसार जब क्षेत्र में कहीं चोरी या पशुधन की चोरी या खेत खलियान में चोरी होती थी, जिसका मुख्य कारण तो उस समय रैंसाड देवता लोगों की फसलों की रक्षा करता था। अनेक प्राकृतिक आपदाओं जैसे अतिवृष्टि ,अनावृष्टि, ओलावृष्टि से क्षेत्रवासियों की रक्षा करता था ,ऐसी मान्यता है । अभी हाल में ही मैंने एक दिन रैंसाड देवता के मंदिर में दर्शन किए और वहां के पुजारी जो शिक्षा विभाग में लंबी सेवाओं के बाद अब धर्म के कार्यों में लगे हुए हैं। पूरा जीवन उनका आध्यात्मिकता में गुजरा । गाय, गंगा को बचाने में भी उनका बहुमूल्य योगदान रहा है । मंदिर के पुजारी के रूप में या मंदिर में देखभाल करने के रूप में वह उस निर्जन वन में अकेले रहते हैं। नाम है -श्री उमेद सिंह गुसाईं।
श्री उमेश सिंह गोसाई जी से अनेक तथ्यों पर बातचीत हुई । जिसमें कि उन्होंने रैंसाड देवता के महत्व, क्षेत्रीय लोगों की श्रद्धा और विश्वास तथा प्राकृतिक सुषमा के बीच में अवस्थित इस भव्य मंदिर का निर्माण आदि के बारे में विस्तृत चर्चा की । यूं तो मंदिर के बारे में थोड़ा बहुत जानकारी मुझे स्थानीय निवासी श्री चैन सिंह पंवार जी के द्वारा काफी समय पूर्व प्राप्त हो चुकी थी लेकिन सटीक जानकारी के अभाव में कुछ लिख नहीं सका।
रैंसाड़ देवता का मंदिर बांज के घने जंगल के बीच उच्च स्थल पर अवस्थित होने के साथ-साथ एक सुरम्य स्थान पर बना है। यहां से चारों तरफ का खूबसूरत नजारा देखने को मिलता है। बादशाहीथौल, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय परिसर, चंबा शहर ,सुरकंडा माता का मंदिर, दूरस्थ घाटियों में विस्तारित क्षेत्र, नई टिहरी क्षेत्र, सुरसिंगधार आदि यहां से दर्शनीय हैं। सड़क मार्ग से नजदीक होने के कारण यहां पर पर्यटक लोग भी आने लग गए हैं । जिससे रोजगार तथा स्व रोजगार के साधन भी विकसित होने जा रहे हैं।
अभी हाल में ही स्थानीय निवासियों के प्रयासों के द्वारा तथा सुरकंडा मंदिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष श्री जितेंद्र सिंह नेगी के प्रयासों के द्वारा, इस मंदिर का भव्य निर्माण करवाया गया। माता सुरकंडा के मंदिर की तर्ज पर ही इस मंदिर का निर्माण हुआ है जो कि वास्तुकला का भी बेजोड़ नमूना है। रैसाड़ देवता का मंदिर दूरस्थ क्षेत्रों से लोगों की धार्मिक आस्था का प्रतीक है। इसको क्षेत्रपाल देवता के रूप में मानते हैं। यहां पर एक बड़ा शिवलिंग स्थापित है। जिसकी मंदिर के पुजारी श्री उमेद सिंह गुसाईं पूजा अर्चना में निमग्न रहते हैं। गजा- नकोट और संपूर्ण मखलोगी पट्टी के लोग, चंबा और बमुंड पट्टी के लोग, थौलधार प्रखंड के लोग, यहां तक कि दूरस्थ जौनपुर प्रखंड के लोग भी यहां शीश नवाने आते हैं।
इस मंदिर के निर्माण के साथ ही साथ, आवश्यक मूलभूत सुविधाओं के हो जाने के कारण इस तीर्थ का अवश्य महत्व बढ़ेगा और स्थानीय लोगों के लिए यह सबसे बड़ा देवस्थल बन जाएगा, ऐसा मेरा मानना है। प्रकृति और संस्कृति के प्रतीक रैसाड़ देवता को मैं नत-मस्तक होकर शीश नवाता हूं । नमन करता हूं। वह क्षेत्रीय लोगों के साथ-साथ संपूर्ण मानव जाति का उद्धार करें। प्राणी जगत का उद्धार करें। कोरोना महामारी से लोगों को बचाएं और क्षेत्र में सुख समृद्धि लाएं।
*(कवि कुटीर) सचिव: उत्तराखंड शोध संस्थान (रजि) चंबा (टिहरी गढ़वाल) इकाई।

