पुस्तक समीक्षा: समसामयिक परिस्थितियों में खरी उतरती है अग्निवर्णा
डॉ0 नागेंद्र ध्यानी, अरुण के काव्य (अग्निवर्णा) की समीक्षा
मूर्धन्य साहित्यकार डॉ नागेंद्र ध्यानी अरुण की प्रबंध काव्य रचना (अग्निवर्णा) को जब मैंने पढ़ा, तो समीक्षा करने का भाव जागा। अत्यंत सुंदर कृति है। सामाजिक उन्नयन, नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना, धार्मिक भावनाओं के नव सृजन, स्वस्थ राजनीति एवं भारतीय सांस्कृतिक विरासत को नया स्वरूप प्रदान करने में पूर्णरूपेण सक्षम है।
साहित्य मर्मज्ञ डॉक्टर ध्यानी ने हिंदू धार्मिक ग्रंथों विशेष रूप से श्रीमद् देवी भागवत, दुर्गा सप्तशती आदि से स्रोत ग्रहण कर अग्निवर्णा को, जो स्वरूप प्रदान किया है, वह आधुनिक साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्पद है।
दुर्गा कथा पर आधारित या रचना न केवल, धर्म की अधर्म पर विजय बल्कि अपनी भाव तथा काव्य पक्षीय विशेषताओं के लिए भी उपयुक्त है। च प्रकृति चित्रण व स्वस्थ राष्ट्रीयता के भाव का मुद्रित करने के कारण भी आकृति अनूठी है।
कविवर डॉक्टर ध्यानी ने पौराणिक आख्यान ओ कथाओं तथा धार्मिक ग्रंथों से कथासार लेकर अग्नि वरणा की जिस ढंग से रचना की है वह हिंदी कविता तथा काव्य की सार्वभौमिकता, धार्मिक, राष्ट्रीय व नैतिक मूल्यों के ह्रास होने से प्राप्त छटपटाहट को दूर करती है।
आधुनिक काव्य में केवल आम आदमी को कविता का विषय बनाया जाता है। लेकिन पाश्चात्यकरण और भोग वाद भी काफी में झलकता है। प्रस्तुत काव्य कृति अपार क्षमता पांडित्य ज्ञान तथा साहित्य प्रेमियों का रसास्वादन के अलावा हिंदी भाषा के विकास में भी मील का पत्थर है।
कविवर डॉक्टर ध्यानी ने अपनी कृति के द्वारा बदलते हुए सामाजिक, राजनीतिक व धार्मिक मूल्यों पर कटाक्ष किया तथा हुड़दंग, हल्ला बोल, हाय हाय, जो प्रजातांत्रिक व्यवस्था का पर्याय बन चुका है, उस पर प्रहार किया। जैसे –
“हुई संसद भंग, बड़ा हुड़दंग हो गया है।
हुए देवता दंग, रंग में भंग हो गया।
देवलोक का वैभव सारा लुप्त हो गया।
सुरपुर का जन जीवन सारा सुप्त हो गया।”
मानव जीवन के अंतर संघर्षों, भौतिकवाद ,पाश्चात्य अंधानुकरण, मिथ्या चार, संदेह वाद आदि का दुष्चक्र अनावश्यक मानव के मस्तिष्क में चल रहा है ।उसे कई बार ध्यानी ने प्राचीन देवासुर संग्राम की संज्ञा प्रदान की है।
जैसे –
“खंडित हुई सभी मर्यादा/ राजनीति में कंटक ज्यादा /मानवता चिल्लाती/ दानव अपना बल दिखलाता /देवासुर संग्राम चल रहा /देवासुर संग्राम। पश्चिम में युग करके रवि /पूर्व में करें विराम /देवासुर संग्राम चल रहा/ देवासुर संग्राम।”
तथा – “लोकतंत्र की सीता को अपहृत कर यह रावण, क्यों जनता को भूल/ कुंभकरण निद्रा में सोते”।
कविवर डॉक्टर ध्यानी ने स्वाभिमान की रक्षा के लिए आत्मसम्मान की भावना पर बल दिया है तथा अज्ञानता को मानव का शत्रुमाना है।
“अभिमानी का एकमात्र स्वाभिमान होता है /स्वाभिमान की रक्षा में वह सब कुछ खोता है “।
एक अन्य प्रसंग में अहंकार से मधु कैटभ राक्षस सर्वशक्तिमान भगवान विष्णु तक नहीं समझ पाता है और कहते हैं, “मधु कैटभ बोले, हे विष्णु और डर कर मत भागो /हम दोनों तुम प्रसन्न है, तुम इच्छित वर मांगो”।
कवि आत्म सम्मान और स्वाभिमान की गौरव गाथा को प्रस्तुत करते हैं तथा अहंकार अज्ञानता को पद दलित करने का प्रयास करते हैं। स्वाभिमान एक महान गुण है यदि और देवताओं में हो तो आत्म सम्मान के रूप में देखा जाता है ,जबकि आसुरी प्रवृत्तियों में यह अहंकार में बदल जाता है।
देशकाल वातावरण व परिस्थितियों का मानव जीवन में बड़ा संबंध है। हिमालय की क्रोड में उत्पन्न होने के कारण, कविवर डॉक्टर ध्यानी को प्रकृति चित्रण में भी महारत है जिसमें कि उन्हें सुमित्रानंदन पंत जयशंकर प्रसाद आदि कवियों के समतुल्य रखा जा सकता है ।
“सूर्योदय होता है जब पर्वत के पीछे /शिखर- शिखर शीतल किरण छन कर आती हैं l
कुछ चांदी जैसी लगती हैं/ कुछ सोने जैसी/ पदमराग मणियों जैसी।
उषा हेम घट भर अपने सिर पर लाती है/ फिर उनको हिमगिरी शिखरों पर छनकाती है।
तन जाते हैं तब सतरंगी चाप सलोने /चढ़ जाते हैं उनके ऊपर बादल बौने।
ध्यानी जी ने अग्निवर्णा में लगभग समस्त रसों का प्रयोग किया है लेकिन ओज पूर्ण रचना होने के कारण वीर रस का बाहुल्य है। देवी के सौंदर्य में जहां श्रंगार रस है, वही चंडिका के रूप में रौद्र का समावेश है। चंड मुंड शिरोच्छेदन करने में करुण रस का अत्यंत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया है।
यथा – “कनक अटारी बैठी निशा चर नारी रोवे, हाय रे सुसारी, मेरा घर क्यों उजारी है। पहले पति मारा सब रण में , हाय मेरे दिल पर लगी आज कटारी है।”
संक्षेप में डॉ ध्यानी की कृति “अग्निवर्णा समसामयिक परिस्थितियों में खरी उतरती है और कला पक्ष दोनों की दृष्टि से सरस, ओजपूर्ण व छंदोबद्ध रचना है। अग्निवर्णा के द्वारा कवि संदेश देना चाहते हैं। उन्ही की कड़ियों में,
” शोषण उत्पीड़न समाप्त हो/ सब निर्भय हो मन में ।
ग्राम नगर जनपद प्रदेशन /निज राष्ट्र विश्व जीवन में।
