एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय में भारतीय भाषाओं में पुस्तक लेखन पर दो दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला शुरू
25 से अधिक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के शिक्षाविदों ने किया प्रतिभाग, 22 भारतीय भाषाओं में डिजिटल शैक्षणिक पुस्तकें विकसित करने पर जोर
श्रीनगर गढ़वाल, 15 अक्टूबर 2026। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (एचएनबीजीयू), श्रीनगर गढ़वाल में भारतीय भाषाओं में पुस्तक लेखन के लिए शिक्षकों की क्षमता संवर्धन विषय पर दो दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। विश्वविद्यालय के चौरास परिसर स्थित अकादमिक गतिविधि केंद्र में आयोजित इस कार्यशाला का आयोजन शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की भारतीय भाषा समिति के सहयोग से किया जा रहा है।
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में उत्तराखंड के 25 से अधिक विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के संकाय सदस्यों, अकादमिक विशेषज्ञों और शोधार्थियों ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक सामग्री विकसित करने, बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने और विद्यार्थियों तक ज्ञान की पहुंच आसान बनाने के लिए शिक्षकों की क्षमता का विकास करना है।
कुलपति प्रो. प्रकाश सिंह ने किया उद्घाटन
उद्घाटन समारोह में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. प्रकाश सिंह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। बिड़ला परिसर के निदेशक प्रो. हरभजन सिंह चौहान विशिष्ट अतिथि और शिक्षा मंत्रालय की भारतीय भाषा समिति के अकादमिक समन्वयक डॉ. चंदन श्रीवास्तव विषय विशेषज्ञ के रूप में शामिल हुए।
कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. आलोक सागर गौतम ने अतिथियों का स्वागत किया। इस अवसर पर पूर्णकालिक राज्य समन्वयक, उत्तराखंड प्रो. नारायण दत्त, राज्य समन्वयक भारतीय भाषा समिति डॉ. अलका सूरी, अकादमिक समन्वयक डॉ. रचना विश्वकर्मा और डॉ. सुधांशु भूषण सहित अन्य समन्वयकों ने कार्यशाला के आयोजन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
22 भारतीय भाषाओं में विकसित होंगी डिजिटल पुस्तकें
कार्यशाला की केंद्रीय विषयवस्तु के तहत विद्यालयी और उच्च शिक्षा के लिए 22 भारतीय भाषाओं में संवादात्मक डिजिटल पुस्तकों के रूप में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षण सामग्री विकसित करने पर जोर दिया गया। इस पहल का उद्देश्य बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहित करना, विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराना और देशभर में ज्ञान को अधिक सुलभ बनाना है।
अपने संबोधन में कुलपति प्रो. प्रकाश सिंह ने भारत की समृद्ध बौद्धिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन में इस पहल के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “पुस्तकें लिखकर व्यक्ति अमृत पिए बिना भी अमर हो सकता है।”
पुस्तकों को अमूल्य धरोहर बताते हुए उन्होंने भारतीय भाषाओं में शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराने की भारत सरकार की पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस प्रयास से शिक्षा का विस्तार होगा और समाज के व्यापक वर्ग तक ज्ञान की पहुंच सुनिश्चित की जा सकेगी।
भारतीय ज्ञान परंपरा के ग्रंथों के अनुवाद पर जोर
कुलपति ने भारतीय ज्ञान परंपराओं की विविधता, उनके ऐतिहासिक विकास और देश की समृद्ध बौद्धिक विरासत का उल्लेख किया। कौटिल्य के अर्थशास्त्र का संदर्भ देते हुए उन्होंने बताया कि इसके पंद्रहवें अध्याय में अनुसंधान पद्धति पर चर्चा की गई है। उन्होंने ऐसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने और उन्हें व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने अपने संबोधन में कहा, “पुस्तक लेखन राष्ट्र निर्माण है।” उनके अनुसार, ज्ञान का सृजन, संरक्षण और प्रसार राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के महत्वपूर्ण आधार हैं।
तकनीक और अनुवाद से बढ़ेगी भारतीय भाषाओं की पहुंच
विषय विशेषज्ञ डॉ. चंदन श्रीवास्तव ने भारतीय भाषाओं के संवर्धन में प्रौद्योगिकी की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रौद्योगिकी आधारित बहुभाषी सामग्री के विकास के माध्यम से एक व्यापक उद्योग विकसित करने की संभावनाओं पर भी चर्चा की।
उन्होंने कहा कि पुस्तकों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद केवल शब्दों के रूपांतरण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि मूल रचना की अवधारणाओं, अर्थ और भाव को भी सुरक्षित रखा जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि इस पहल की घोषणा केंद्रीय बजट 2025 में की गई थी, जिसके अंतर्गत 2.5 लाख पुस्तकों के विकास का प्रस्ताव है।
उत्तराखंड में पुस्तक लेखन और प्रकाशन की संभावनाओं पर चर्चा
कार्यशाला के समन्वयक डॉ. आलोक सागर गौतम ने उत्तराखंड में पुस्तक लेखन, प्रकाशन और विभिन्न शिक्षाविदों के सामूहिक सहयोग से शैक्षणिक पुस्तकों के विकास की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने इस दिशा में आपसी समन्वय और सहयोग को महत्वपूर्ण बताया।
कार्यक्रम में कुल 75 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इनमें 65 संकाय सदस्य एवं अकादमिक पेशेवर, आठ शोधार्थी और दो विद्यार्थी शामिल थे। सभी प्रतिभागी उत्तराखंड के 25 से अधिक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से पहुंचे थे।
समावेशी और सुलभ शिक्षा की दिशा में पहल
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में संवादात्मक डिजिटल पुस्तकों के विकास, भारतीय भाषाओं के साथ प्रौद्योगिकी के एकीकरण और भारत की ज्ञान परंपराओं के व्यापक प्रसार पर चर्चा हुई। आयोजकों के अनुसार, यह पहल गुणवत्तापूर्ण एवं सुलभ शैक्षणिक संसाधनों के निर्माण और शिक्षा व्यवस्था में भारतीय भाषाओं की भूमिका को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. कविता भट्ट ने किया। इस अवसर पर प्रो. आर.एस. नेगी, प्रो. सीमा धवन, प्रो. डी.एस. नेगी, प्रो. एम.एस. नेगी, प्रो. सुरेंद्र सिंह बिष्ट, प्रो. बी.पी. नैथानी सहित अनेक संकाय सदस्य और शिक्षाविद् उपस्थित रहे।
