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धनतेरस की धमक के साथ दीपोत्सव हेतु सजने लगे बाजार
नकोट, टिहरी गढ़वाल। कोविड-19 के कारण यूं तो उत्सवों का माहौल सहमा हुआ है, लेकिन प्रकाश पर्व दीपावली को लेकर लोगों में थोड़ा उत्सुकता दिखाई दे रही है। शहरों की अपेक्षा ग्रामीण कस्बों में भी लोग अपने भवनों व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों सुसज्जित कर रहे हैं।
ग्रामीण कस्बा नकोट में भी व्यापारिक प्रतिष्ठानों व आवासीय भवनों को भवन स्वामी व व्यवसायी धनतेरस की पूर्व संध्या से ही सजाने में जुटे हैं। व्यापारियों द्वारा पटाखों की दुकानें सजायी गई हैं। बर्तन वालों ने बर्तनों की दुकानों को सुसज्जित कर रखा है। नकोट ग्रामीण कस्बे में लॉकडाउन के दौरान से ही व्यावसायिक गतिविधियां शून्यशः हो गई थीं। अधिकांश व्यवसायी अभी तक उससे उभर नहीं पाये हैं। हालांकि इस दौर में कस्बे में व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की संख्या में इजाफा हुआ है। कई नए व्यवसायी व उद्यमी बाजार से जुड़े हैं।

मुर्गी पालन व्यवसाय में सर्वाधिक इजाफा
इस कस्बे में सर्वाधिक इजाफा यदि हुआ है तो वह हुआ मुर्गी पालन व्यवसाय का। कस्बा व इसके आस-पास के गांवों में करीबन आधा दर्जन से अधिक मुर्गा फार्म इस दौर में खुले है। इसके अलावा ग्रामीण कस्बा नकोट में नूडल्स बनाने का कारखाना, सब्जी व्यवसाय एलईडी बल्ब यूनिट, मसाला उद्योग, मीट की दुकानें, रेस्टोरेंट अचार उद्योग आदि खूब खुले। बाजार ने इस कोरोना काल में पूर्व की अपेक्षा अच्छी उन्नति की है, जो ग्रामीण कस्बा नकोट की प्रगति के लिए अच्छा संदेश है।

फिर पलायन को तैयार हैं प्रवासी युवा
देश व विदेशों में रोजगाररत् कई युवक अपने गांव की ओर लौटे, मगर कुछ फिर पलायन को तैयार हैं, साथ ही कुछ पलायन कर भी चुके हैं। स्वरोजगार को लेकर सरकार के कार्यक्रम जटिल होने के कारण लोग पलायन से मुंह नहीं मोड़ पाये हैं।
सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार लेकिन लाभान्वित के आंकड़े कमतर
मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली स्वरोजगार योजना आदि सभी सरकारी योजनाओं का खूब प्रचार-प्रसार हुआ, लेकिन लाभान्वित के आंकड़े कमतर हैं। बैंकों द्वारा लोगों को अनावश्यक तर्क देकर गुमराह किया जाता है। जिस कारण लोग पुनः पलायन को विवश होते हैं। मानक तो दिए जाते हैं मगर उन पर अमल सही ढंग से नहीं करवाया जाता है। सुलभ और सरल प्रक्रिया यदि मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत दी गई होती तो पलायन को रोका जा सकता था, किन्तु आवेदन की लम्बी प्रक्रिया। बैंकों की अपनी कहानी। इससे रिवर्स पलायन को तैयार लोग खूब खिजे और पुनः पलायन को मजबूर भी हो रहे हैं।
दस फ़ीसदी भी नहीं हो पाया रिवर्स पलायन
सरकारी आंकड़े कुछ भी कहें पर उत्तराखण्ड में 10 प्रतिशत भी रिवर्स पलायन भी नहीं हो पाया। यह डंके की चोट पर कहा जा सकता है। इससे पूर्व सरकारों ने रूफ टॉप सोलर पावर प्लांटों पर 90 फीसदी अनुदान दिया, तो अधिकांश लोगों ने अपनी छतों पर प्लांट स्थापित किए, जिसका लाभ उन्हें आज भी मिल रहा है, मगर आज स्थिति भिन्न है। पूंजीपति लोग ही आज इस तरह के प्लांट स्थापित कर सकते हैं। यदि सरकार की मंशा लोगों को स्वरोजगार से जोड़ने की होती तो पूर्व की भांति लोगों को 90 फीसदी अनुदान पर सोलर पावर प्लांट लगाने को प्रोत्साहित करती, किन्तु ऐसा न होकर आज रूफ टॉप सोलर अथवा अन्य प्लांट लगाने के इच्छुक लोग हतोत्साहित हैं।
प्रवासी युवकों ने स्वयं के बलबूते पर अपनाया स्वरोजगार
देश-विेदेश से घर लौटे प्रवासी युवकों ने यदि इस दौरान स्वरोजगार अपनाया भी तो अधिकांशतः स्वयं के बलबूते पर। सरकारी योजनाओं की मदद से कमतर प्रवासियों द्वारा ही स्वरोजगार अपनाया गया है, क्योंकि सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए युवकों को काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी। यदि यहां पर यह कहा जाय कि सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन की प्रक्रिया यदि सरलीकृत होती तो उसका लाभ लाभार्थी आसानी से उठा पाते, मगर ऐसा हो नहीं पाया। इन परिस्थितियों में अधिकांश युवकों को पुनः पलायन के लिए विवश होना पड़ रहा है।
