तुम शहर वाले क्या जानो साहब… गांवों में एंबुलेंस भी दो घंटे में पहुंचती है!
दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की एक दर्दनाक कहानी, सवाल यह कि आखिर कब मिलेगा गांवों को समय पर इलाज का अधिकार?
नई टिहरी/चंबा।
“तुम शहर वाले क्या जानो साहब… यहां एंबुलेंस भी दो घंटे में पहुंचती है।” यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि उत्तराखंड के दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले हजारों लोगों की उस पीड़ा की आवाज है, जिसे अक्सर विकास और स्वास्थ्य सुविधाओं के बड़े-बड़े दावों के बीच अनसुना कर दिया जाता है। पहाड़ के गांवों में आज भी किसी गंभीर बीमारी या आकस्मिक स्वास्थ्य संकट की स्थिति में अस्पताल तक पहुंचना अपने आप में एक संघर्ष बन जाता है। कई बार इलाज से पहले ही रास्ता जिंदगी और मौत के बीच फैसला कर देता है।
विकासखंड चंबा के ग्राम नैचोली की लगभग दो वर्ष पुरानी एक घटना इस व्यवस्था की जमीनी हकीकत को सामने रखती है। गांव के एक परिवार के युवा मुखिया को रात में अचानक पेट में तेज दर्द हुआ। परिजन घबरा गए और तत्काल एंबुलेंस को फोन किया गया। परिवार को उम्मीद थी कि समय पर चिकित्सा सहायता मिल जाएगी, लेकिन एंबुलेंस करीब डेढ़ घंटे बाद पहुंची। विडंबना यह रही कि एंबुलेंस घटनास्थल से लगभग एक किलोमीटर पहले ही खराब हो गई।
परिजनों के सामने अब कोई विकल्प नहीं था। आनन-फानन में निजी वाहन की व्यवस्था की गई और मरीज को उसकी पत्नी तथा भाई के साथ भासौं, क्यारी, जीरो ब्रिज और बीपुरम होते हुए जिला अस्पताल बौराड़ी ले जाया गया।
लेकिन अस्पताल पहुंचते ही चिकित्सकों ने मरीज को मृत घोषित कर दिया।
परिजनों को बताया गया कि उसकी मौत रास्ते में ही हो चुकी थी।
इलाज नहीं मिला, शव के लिए भी करना पड़ा इंतजार
दुख से टूट चुके परिवार के सामने अब एक और कठिन परिस्थिति खड़ी थी। मृतक की पत्नी और भाई ने अस्पताल प्रशासन से गुहार लगाई कि उन्हें शव सौंप दिया जाए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मरीज को घर से ही पेट में दर्द था और उन्हें किसी पर कोई संदेह नहीं है।
लेकिन अस्पताल प्रशासन ने पोस्टमार्टम के बिना शव देने से इनकार कर दिया।
परिजनों को पोस्टमार्टम के लिए अपराह्न तक इंतजार करना पड़ा। लगभग तीन बजे शव मिलने के बाद शाम पांच बजे कोटेश्वर घाट पर अंतिम संस्कार किया जा सका।
एक परिवार ने उसी दिन अपना युवा मुखिया खो दिया था, लेकिन उनकी परेशानियां यहीं खत्म नहीं हुईं।
मौत के बाद शुरू हुआ प्रमाण पत्र का संघर्ष
मृतक के पीछे पत्नी और चार छोटे-छोटे बच्चे रह गए। परिवार को आगे की सरकारी और कानूनी प्रक्रियाओं के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र की आवश्यकता थी।
मृतक की पत्नी ने बौराड़ी अस्पताल में मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए संपर्क किया तो उन्हें बताया गया कि मरीज की मृत्यु अस्पताल में नहीं हुई है, बल्कि रास्ते में हुई है, इसलिए अस्पताल से मृत्यु प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जा सकता।
इसके बाद परिवार ने थाना नई टिहरी के चक्कर लगाए, लेकिन वहां से भी समस्या का समाधान नहीं हो सका।
जब ग्राम पंचायत विकास अधिकारी से संपर्क किया गया तो वहां भी यह कहकर असमर्थता जताई गई कि यदि मृत्यु घर पर अथवा ग्राम पंचायत की सीमा में हुई होती तो प्रमाण पत्र जारी किया जा सकता था।
अब सवाल था—आखिर रास्ते में हुई मौत का मृत्यु प्रमाण पत्र कौन जारी करेगा?
मरीज नैचोली से निकला था और रास्ते में क्यारी, जीरो प्वाइंट तथा बीपुरम जैसे स्थान पड़ते हैं। मृत्यु घर में नहीं हुई, अस्पताल में नहीं हुई और रास्ते में हुई मौत के प्रमाण पत्र को लेकर परिवार सरकारी कार्यालयों के बीच भटकता रहा।
गांव वालों ने उठाई आवाज, तब जाकर निकला रास्ता
आखिरकार ग्रामीणों ने इस मामले में हस्तक्षेप किया। गांव के लोगों ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय का दरवाजा खटखटाया। ग्राम पंचायत की ओर से सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किए जाने का अनुरोध किया गया।
ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद मुख्य चिकित्सा अधिकारी के प्रति-हस्ताक्षर से मृत्यु प्रमाण पत्र जारी हो सका।
सोचिए, जिस परिवार ने एक रात में अपना कमाऊ युवा सदस्य खो दिया, जिस पत्नी के सामने चार छोटे बच्चों की जिम्मेदारी आ गई, उसे अपने पति की मृत्यु के प्रमाण पत्र के लिए भी कितने दरवाजों पर दस्तक देनी पड़ी।
यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह पहाड़ के ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच फंसे आम आदमी की कहानी है।
मेडिकल कॉलेज की मांग पर सियासत नहीं, संवेदना चाहिए
आज जब नई टिहरी में मेडिकल कॉलेज स्थापित किए जाने की मांग को लेकर बहस चल रही है, तब नैचोली की यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।
कुछ लोग तर्क देते हैं कि नरेंद्रनगर विधानसभा क्षेत्र से कुछ ही दूरी पर एम्स ऋषिकेश जैसी बड़ी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है। लेकिन क्या पहाड़ के हर गांव के लिए दूरी सिर्फ नक्शे पर तय होती है?
क्या कभी यह भी देखा गया है कि मखलोगी क्षेत्र के किसी गांव से गंभीर मरीज को अस्पताल पहुंचने में कितना समय लगता है?
क्या चाका, रणाकोट, पौड़ीखाल, रौडधार, धार-अकरिया पट्टी और चंबा के दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों को केवल इसलिए नजरअंदाज किया जा सकता है कि राज्य में कहीं और बड़े अस्पताल मौजूद हैं?
एम्स का होना अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन पहाड़ के दूरस्थ गांव से मरीज को समय पर वहां पहुंचा पाना उससे भी बड़ी चुनौती है।
गंभीर मरीज के लिए एक-एक मिनट की कीमत होती है। ऐसे में यदि एंबुलेंस पहुंचने में डेढ़-दो घंटे लग जाए और फिर रास्ते में खराब हो जाए, तो अत्याधुनिक अस्पताल भी मरीज के लिए समय पर उपलब्ध सुविधा नहीं बन पाता।
स्वास्थ्य सुविधा किसी क्षेत्र विशेष का विशेषाधिकार नहीं
राजनीति अपनी जगह है। क्षेत्रीय सीमाएं अपनी जगह हैं। विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र की राजनीतिक चर्चाएं भी अपनी जगह हैं। लेकिन स्वास्थ्य सुविधा किसी राजनीतिक क्षेत्र का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का अधिकार है।
यदि किसी नेता या जनप्रतिनिधि को स्वास्थ्य सुविधाओं पर सवाल उठाने, मेडिकल कॉलेज की मांग करने या किसी क्षेत्र के लिए बेहतर चिकित्सा व्यवस्था की बात करने पर राजनीति का आरोप लगाया जाता है, तो इससे पहले यह देखना चाहिए कि ग्रामीण जनता किन परिस्थितियों में जीवन जी रही है।
शहर में अस्पताल की दूरी किलोमीटर में मापी जाती है, पहाड़ में अस्पताल की दूरी समय और रास्ते की कठिनाई से मापी जाती है।
बारिश, भूस्खलन, खराब सड़कें, सीमित परिवहन सुविधा, एंबुलेंस की उपलब्धता और विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी—ये सभी ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक चुनौतियां हैं।
सवाल मेडिकल कॉलेज से आगे का भी है
नई टिहरी में मेडिकल कॉलेज की मांग केवल एक भवन या संस्थान की मांग नहीं होनी चाहिए। यह पूरे पर्वतीय क्षेत्र के लिए एक समग्र स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित करने की मांग होनी चाहिए।
इसके साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में—
- आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना,
- एंबुलेंस की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना,
- खराब एंबुलेंस के लिए वैकल्पिक व्यवस्था रखना,
- सामुदायिक एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को संसाधनयुक्त बनाना,
- विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना,
- टेलीमेडिसिन सेवाओं का विस्तार करना,
- दुर्गम क्षेत्रों में समयबद्ध रेफरल व्यवस्था बनाना,
- और रास्ते में होने वाली मृत्यु के प्रमाण पत्र जैसी प्रशासनिक समस्याओं के लिए स्पष्ट एवं सरल व्यवस्था बनाना
भी उतना ही जरूरी है।
क्योंकि पहाड़ के गांवों में रहने वाला नागरिक भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शहर में रहने वाला नागरिक।
मेडिकल कॉलेज बने या न बने, बहस चलती रहे या राजनीतिक बयानबाजी होती रहे—लेकिन नैचोली जैसे गांवों के परिवारों को यह भरोसा जरूर मिलना चाहिए कि आपात स्थिति में मदद समय पर पहुंचेगी और किसी परिवार को इलाज के साथ-साथ व्यवस्था के दरवाजों पर भी संघर्ष नहीं करना पड़ेगा।
आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि “मेडिकल कॉलेज कहां बने?”
सवाल यह भी है—
“पहाड़ के गांव में रहने वाले व्यक्ति को समय पर इलाज कब मिलेगा?”
“बीमारी और दुर्घटना की स्थिति में एंबुलेंस कब समय पर पहुंचेगी?”
“और जिस परिवार ने अपना सदस्य खो दिया, उसे उसके बाद सरकारी कागजों के लिए क्यों भटकना पड़ेगा?”
इन सवालों के जवाब राजनीति से नहीं, जनहित की संवेदनशील और ठोस स्वास्थ्य नीति से मिलने चाहिए।
स्वास्थ्य पर यदि शहर के नागरिक का अधिकार है, तो ग्रामीण अंचलों में रहने वाले व्यक्ति का भी उतना ही अधिकार है।
⚖️ अस्वीकरण (Disclaimer)
अस्वीकरण: यह लेख ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं, एंबुलेंस सेवा एवं चिकित्सा व्यवस्था से संबंधित एक वास्तविक घटना के आधार पर जनहित में प्रस्तुत किया गया है। इसमें व्यक्त विचार, सवाल एवं विश्लेषण ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियों को सामने रखने के उद्देश्य से हैं। लेख में उल्लिखित घटना एवं विवरण संबंधित पक्षों/स्थानीय स्तर से प्राप्त जानकारी पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, विभाग, चिकित्सक अथवा सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाना या किसी पर व्यक्तिगत आरोप लगाना नहीं है।
लेख का उद्देश्य ग्रामीण एवं दुर्गम क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, समय पर एंबुलेंस सेवा और आम नागरिक के स्वास्थ्य अधिकार के प्रति जागरूकता पैदा करना है। किसी तथ्य में त्रुटि अथवा संबंधित पक्ष की कोई आपत्ति होने पर प्रमाणित जानकारी के आधार पर उसे संशोधित/स्पष्ट किया जा सकता है।
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