विभाजन की पीड़ा से सम्मान तक, टिहरी में याद किए गए विस्थापन के जख्म
पीएम मोदी की पहल से विभाजन पीड़ित परिवारों की सुध, सीएम धामी के नेतृत्व में टिहरी में सम्मान; दर्द, संघर्ष और पुनर्निर्माण की सुनाई गईं प्रेरक कहानियां
टिहरी गढ़वाल, 18 अगस्त 2026। अगस्त का महीना देश के लिए स्वतंत्रता उत्सव के साथ-साथ उन लाखों लोगों के संघर्ष, विस्थापन और पीड़ा को याद करने का अवसर भी है, जिन्होंने वर्ष 1947 के विभाजन के दौरान अपना घर, जमीन, कारोबार और जन्मभूमि छोड़कर भारत को अपना नया घर बनाया। विभाजन की वह त्रासदी केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज घटना नहीं है, बल्कि आज भी कई परिवारों की स्मृतियों और अनुभवों में जीवित है।
इसी पीड़ा और संघर्ष को स्मरण करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2021 में प्रत्येक वर्ष 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। इसके बाद विभाजन की त्रासदी झेलने वाले परिवारों की कहानियों को सामने लाने और उनके संघर्ष को सम्मान देने का प्रयास तेज हुआ।
इस वर्ष मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड में भी विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के अवसर पर विभाजन पीड़ित परिवारों की स्मृतियों और संघर्ष की गाथाओं को सामने लाया गया। टिहरी में बसे ऐसे परिवारों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने दशकों पहले सब कुछ खोकर नए सिरे से अपना जीवन खड़ा किया।
पाकिस्तान के बालाकोट से टिहरी तक का सफर
टिहरी में बसे श्री देवप्रकाश सोनी और श्रीमती पूर्णिमा सोनी बताते हैं कि उनका जन्म पाकिस्तान के बालाकोट में हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय ताराचंद सोनी वहां जड़ी-बूटियों का कारोबार करते थे।
विभाजन के दौरान परिवार को बेहद कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा। उनके मामा-मामी और तीन बेटे भारत आने के दौरान हिंसक हमले का शिकार हुए। इस घटना में मामी और एक बेटे की मृत्यु हो गई, जबकि अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए।
भारत पहुंचने के बाद परिवार ने सहारनपुर, पंजाब और जम्मू-कश्मीर सहित विभिन्न स्थानों पर संघर्ष किया और अंततः टिहरी को अपना घर बनाया।
डेढ़ वर्ष की उम्र में छूटी जन्मभूमि
श्रीमती रंजीत कौर का जन्म पाकिस्तान के हजारा जिले के दरबंद गांव में हुआ था। वर्ष 1947 में उनकी उम्र महज डेढ़ वर्ष थी। विभाजन के दौरान उनके परिवार को अपना घर-बार और सब कुछ छोड़कर भारत आना पड़ा।
परिवार ने भारत में कठिन परिस्थितियों के बीच नए जीवन की शुरुआत की। वर्षों के संघर्ष और मेहनत के बाद आज उनका परिवार टिहरी में ‘प्रगति गारमेंट्स’ के नाम से अपना कारोबार चला रहा है।
उनकी कहानी बताती है कि विस्थापन की पीड़ा के बावजूद मेहनत और हौसले से नई पहचान बनाई जा सकती है।
पाकिस्तान से पुरानी टिहरी तक संघर्ष की कहानी
श्रीमती विनोद राय एवं स्वर्गीय गुलशन राय के परिवार ने भी विभाजन की भयावहता झेली। उनके पुत्र मनोज राय बताते हैं कि परिवार को पाकिस्तान में अपनी राशन की दुकान और खेती छोड़कर रातोंरात भारत की ओर निकलना पड़ा।
चिनाब नदी के किनारे सफर के दौरान हिंसक हमलों में कई लोग मारे गए। कुछ रिश्तेदारों ने अपनी जान बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी।
परिवार पाकिस्तान से कश्मीर, पंजाब, दिल्ली और देहरादून होते हुए पुरानी टिहरी पहुंचा। यहां उन्होंने मजदूरी, सब्जी बेचने और सिलाई जैसे छोटे-छोटे कामों से जीवन को दोबारा खड़ा किया। संघर्ष का यही सफर आगे चलकर ‘शुभम साड़ी सेंटर’ के रूप में उनकी नई पहचान बना।
रिक्शा चलाकर और होटल में काम कर खड़ा किया नया जीवन
श्रीमती गुलशन देवी विभाजन की स्मृतियां साझा करते हुए भावुक हो जाती हैं। वह बताती हैं कि उस समय उनके परिवार को बेहद कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा।
परिवार पहले बरेली, फिर दिल्ली और ऋषिकेश होते हुए टिहरी पहुंचा। जीवन को दोबारा शुरू करने के लिए परिवार के सदस्यों ने रिक्शा चलाया और होटलों में काम किया। लंबे संघर्ष के बाद परिवार ने टिहरी में सम्मानजनक जीवन स्थापित किया।
उनकी कहानी उन हजारों विस्थापित परिवारों की कहानी है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी।
घर, कारोबार और जन्मभूमि छोड़कर पहुंचे भारत
सरदार मनमोहन सिंह पाकिस्तान से भारत आने की स्मृतियों को याद करते हुए बताते हैं कि उनके परिवार को अपना घर, व्यापार और सब कुछ छोड़ना पड़ा।
विभाजन के उस दौर की कठिनाइयों को याद करते हुए वे बताते हैं कि परिवार ने बेहद संघर्ष किया। आज जब उनकी पीढ़ी टिहरी में स्थापित है तो वे सरकार के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि वर्षों बाद किसी ने उनकी और उनके जैसे परिवारों की पीड़ा और संघर्ष की सुध ली है।
मानसेहरा से श्रीनगर, दिल्ली और टिहरी तक
पंजाबी बिरादरी के अध्यक्ष हरिकृष्ण लांबा बताते हैं कि उनके पिता अक्सर विभाजन के समय की भयावह घटनाओं का जिक्र किया करते थे। उनका पैतृक घर पट्टल, मानसेहरा, हजारा में था।
वह बताते हैं कि विभाजन ऐसी त्रासदी थी, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। परिवार को अपना घर-बार और कारोबार छोड़ना पड़ा। उस अराजक दौर में अनेक लोगों को जान बचाने के लिए कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा।
उनका परिवार भी छिपते-छिपाते श्रीनगर पहुंचा, जहां से दिल्ली और फिर टिहरी आया। यहां उन्होंने कठिन परिस्थितियों में नए सिरे से जीवन शुरू किया।
टिहरी में बसे अनेक परिवारों की साझा कहानी
हरिकृष्ण लांबा की तरह प्रदीप कुमार, बलजीत राजपाल, राजकुमार नंद्राजोग, राकेश लांबा सहित टिहरी में बसे अनेक परिवार ऐसे हैं, जिन्होंने स्वयं या अपने पूर्वजों के माध्यम से विभाजन की उस भयावह त्रासदी को झेला है।
इन परिवारों की स्मृतियां आज भी उस दौर के दर्द, संघर्ष, विस्थापन और साहस की गवाही देती हैं। इनके लिए 14 अगस्त केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि उन लोगों को याद करने का दिन है, जिन्होंने अपना सब कुछ खोकर भी जीवन की नई शुरुआत की।
त्रासदी से आगे बढ़कर आत्मनिर्भरता की मिसाल
टिहरी में बसे विभाजन पीड़ित परिवारों की कहानियां केवल दर्द और विस्थापन की गाथाएं नहीं हैं। ये साहस, संघर्ष, मेहनत, आत्मनिर्भरता और पुनर्निर्माण की प्रेरक कहानियां भी हैं।
विभाजन के दौरान जिन परिवारों ने अपना घर, जमीन और कारोबार खो दिया था, उनकी अगली पीढ़ियों ने मेहनत के बल पर भारत में अपनी नई पहचान बनाई। व्यापार, रोजगार और सामाजिक जीवन में योगदान देते हुए इन परिवारों ने टिहरी को अपना घर बनाया और समाज के विकास में भागीदारी निभाई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में विभाजन पीड़ित परिवारों की स्मृतियों को सम्मान देना इस बात का संदेश है कि इतिहास के उस कठिन दौर को भुलाया नहीं गया है।
दर्द से नए जीवन तक की कहानी
विभाजन की विभीषिका झेलने वाली पीढ़ी ने अपना सब कुछ खोकर भी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने विस्थापन को अपनी नियति मानकर रुकने के बजाय संघर्ष को अपना हथियार बनाया और नए जीवन का निर्माण किया।
आज उनकी अगली पीढ़ियां भारत को अपना गौरव और टिहरी को अपना घर मानकर आगे बढ़ रही हैं। यही उन परिवारों की सबसे बड़ी उपलब्धि है—विभाजन की पीड़ा से सम्मान तक, विस्थापन से पुनर्निर्माण तक और संघर्ष से आत्मनिर्भरता तक की प्रेरक यात्रा।
