हिमवंत कवि चंद्र कुँवर बर्त्वाल की जयंती पर नागनाथ पोखरी महाविद्यालय में विचार संगोष्ठी
साहित्य, प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं के अद्भुत कवि के कृतित्व पर हुआ मंथन, विद्यार्थियों ने कविता पाठ और चित्रकला के माध्यम से दी श्रद्धांजलि
नागनाथ पोखरी, चमोली, 20 अगस्त 2026। प्रकृति के चितेरे एवं हिमवंत कवि चंद्र कुँवर बर्त्वाल की जयंती के अवसर पर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नागनाथ पोखरी में हिन्दी विभाग के तत्वावधान में विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राध्यापकों और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए बर्त्वाल के व्यक्तित्व, कृतित्व और हिन्दी साहित्य में उनके योगदान पर विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य डॉ. अभय कुमार श्रीवास्तव ने की, जबकि संचालन हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. कीर्ति गिल ने किया।
हिमालय और मानवीय संवेदनाओं के विलक्षण कवि थे बर्त्वाल
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. अभय कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि चंद्र कुँवर बर्त्वाल केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि हिन्दी साहित्य के ऐसे विलक्षण कवि थे, जिन्होंने हिमालय, प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं को अपनी रचनाओं में सजीव अभिव्यक्ति दी।
उन्होंने कहा कि साहित्य और विज्ञान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। साहित्य मनुष्य की संवेदनाओं और कल्पनाशक्ति को विकसित करता है, जबकि विज्ञान तर्क, ज्ञान और तकनीकी प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है। दोनों के समन्वय से ही समाज और राष्ट्र का संतुलित एवं संतुलित विकास संभव है।
अल्पायु में साहित्य को दी अमूल्य धरोहर
हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. कीर्ति गिल ने चंद्र कुँवर बर्त्वाल के संघर्षपूर्ण एवं मार्मिक जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उनके साहित्यिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि बर्त्वाल ने अल्पायु में ही हिन्दी कविता को ऐसी अमूल्य धरोहर प्रदान की, जो आज भी साहित्यप्रेमियों और शोधार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। उनकी रचनाओं में प्रकृति के साथ-साथ जीवन के विविध अनुभवों और मानवीय संवेदनाओं की गहरी अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
प्रकृति उनके काव्य में केवल सौंदर्य नहीं
हिन्दी विभाग की डॉ. शशि चौहान ने कहा कि चंद्र कुँवर बर्त्वाल की कविताओं में प्रकृति केवल सौंदर्य का विषय नहीं है, बल्कि वह मानवीय संवेदनाओं, सांस्कृतिक चेतना और लोकजीवन का जीवंत चित्रण भी करती है।
उन्होंने विद्यार्थियों से बर्त्वाल के साहित्य का अध्ययन करने तथा उनकी रचनाओं से प्रेरणा लेकर पर्यावरण संरक्षण और मानवीय मूल्यों को अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य निधि
डॉ. प्रियंका घिड़ियाल ने कहा कि चंद्र कुँवर बर्त्वाल का साहित्य उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य निधि है। उनकी रचनाओं में हिमालय, प्रकृति, लोकजीवन और मानवीय करुणा का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी तक बर्त्वाल के साहित्य को पहुंचाना केवल साहित्य विभाग का दायित्व नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
बर्त्वाल के नाम पर महाविद्यालय होना गौरव की बात
शिक्षाशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. रेखा चमोली ने कहा कि महाविद्यालय का नाम उत्तराखंड के महान साहित्यकार एवं हिमवंत कवि चंद्र कुँवर बर्त्वाल के नाम पर होना सभी के लिए गौरव का विषय है।
उन्होंने कहा कि किसी शिक्षण संस्थान का नाम किसी महान साहित्यकार के नाम पर होना विद्यार्थियों को साहित्य, संस्कृति, संवेदनशीलता और सृजनशीलता के प्रति निरंतर प्रेरित करता है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि महाविद्यालय भविष्य में भी साहित्यिक आयोजनों के माध्यम से बर्त्वाल के व्यक्तित्व और कृतित्व को नई पीढ़ी तक पहुंचाता रहेगा।
‘मेघकृपा’ की पंक्तियों का भावपूर्ण पाठ
भौतिक विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. योगेश प्रसाद भट्ट ने कहा कि बर्त्वाल की रचनाएं प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों का संदेश देती हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से साहित्य से प्रेरणा लेकर प्रकृति संरक्षण और सामाजिक दायित्वों के प्रति सजग रहने का आह्वान किया।
इस अवसर पर उन्होंने बर्त्वाल की प्रसिद्ध रचना ‘मेघकृपा’ की कुछ पंक्तियों का भावपूर्ण पाठ भी किया।
छात्र-छात्राओं ने कविता पाठ और चित्रकला से दी श्रद्धांजलि
संगोष्ठी में महाविद्यालय की छात्राओं पार्वती, अनुशिखा और काजोल ने अपने विचार व्यक्त किए तथा चंद्र कुँवर बर्त्वाल की रचनाओं का प्रभावपूर्ण पाठ प्रस्तुत किया।
वहीं छात्र गौरव ने चंद्र कुँवर बर्त्वाल का सुंदर चित्र बनाकर अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से कवि के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त किया।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने हिमवंत कवि चंद्र कुँवर बर्त्वाल को श्रद्धासुमन अर्पित किए। साथ ही उनके साहित्यिक अवदान को स्मरण करते हुए उनके आदर्शों और प्रकृति एवं मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. योगेश भट्ट, डॉ. शाजिया सिद्दीकी, डॉ. रामानंद उनियाल, डॉ. किरण चौहान, डॉ. श्वेता रावत, डॉ. आरती रावत, डॉ. अनुपम रावत, डॉ. आयुष बर्त्वाल, डॉ. प्रवीण मैठाणी, डॉ. सोहनी सती, डॉ. भगवती पंत, डॉ. केवला नन्द सहित शिक्षणेत्तर कर्मचारी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
इसके अलावा श्री दिनेश नेगी, श्री दिगम्बर सिंह, श्री विमल विष्ट, श्री शिवा कुंवर, श्री विक्रम कंडारी, श्री चंदन सिंह, श्री चंद्रेश भट्ट, श्रीमती ललिता भंडारी, श्री सतीश चमोला, श्री नवनीत, श्री विजयपाल, श्री विजय कुमार, श्री गुलशन, श्री प्रबल, श्री अनिल कुमार एवं श्री दीपक सिंह सहित महाविद्यालय परिवार के सदस्य मौजूद रहे।
संपादकीय दृष्टि
चंद्र कुँवर बर्त्वाल को याद करना केवल एक साहित्यकार की जयंती मनाना नहीं, बल्कि हिमालय, प्रकृति और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने का अवसर है। आज जब हिमालय पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन और बदलते सामाजिक परिवेश से गुजर रहा है, तब बर्त्वाल की प्रकृति-केंद्रित काव्य दृष्टि और भी प्रासंगिक हो जाती है।
महाविद्यालय जैसे शिक्षण संस्थानों में बर्त्वाल के साहित्य पर संवाद और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी यह उम्मीद जगाती है कि उत्तराखंड की साहित्यिक विरासत केवल पुस्तकों में सीमित नहीं रहेगी, बल्कि नई पीढ़ी के विचार और व्यवहार का हिस्सा बनेगी।
