अंतिम व्यक्ति तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करने पर जोर, पराविधिक स्वयंसेवियों को स्थायी लोक अदालत की कार्यप्रणाली का प्रशिक्षण
बिजली, पानी, बैंकिंग, बीमा समेत सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं से जुड़े विवादों के त्वरित एवं सुलभ समाधान की दी जानकारी
नई टिहरी/24 अगस्त, 2026, सोमवारी लाल सकलानी ‘निशांत’। उत्तराखण्ड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, नैनीताल के निर्देशानुसार तथा जनपद न्यायाधीश एवं अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, टिहरी गढ़वाल नितिन शर्मा के आदेशानुपालन में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, नई टिहरी में पराविधिक स्वयंसेवियों एवं स्थायी लोक अदालत से जुड़े कर्मचारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करना, आमजन को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करना तथा जरूरतमंद लोगों को सस्ती, सरल और त्वरित न्याय व्यवस्था से जोड़ना रहा।
प्रशिक्षण कार्यक्रम में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव/सीनियर सिविल जज दयाराम, स्थायी लोक अदालत के सदस्य लक्ष्मी प्रसाद उनियाल तथा रिटेनर अधिवक्ता राजपाल सिंह मियां ने प्रतिभागियों को स्थायी लोक अदालत की कार्यप्रणाली, अधिकार क्षेत्र एवं आम जनता के लिए इसकी उपयोगिता के संबंध में विस्तार से जानकारी दी।
स्थायी लोक अदालत क्यों है महत्वपूर्ण?
प्रशिक्षण के दौरान बताया गया कि न्यायालयों में लंबित मुकदमों के बढ़ते बोझ को कम करने तथा नागरिकों को अपेक्षाकृत सरल एवं त्वरित विवाद समाधान उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्थायी लोक अदालतों की व्यवस्था की गई है।
विशेष प्रशिक्षण में अधिकार मित्रों एवं संबंधित कर्मचारियों को बताया गया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में ऐसे मामलों की पहचान करें, जिन्हें स्थायी लोक अदालत के माध्यम से सुलझाया जा सकता है और जरूरतमंद लोगों को इसकी प्रक्रिया के बारे में सही जानकारी उपलब्ध कराएं।
सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं से जुड़े विवादों का समाधान
प्रशिक्षण में बताया गया कि स्थायी लोक अदालत का प्रमुख क्षेत्र सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं से जुड़े विवाद हैं। इनमें परिस्थितियों के अनुसार बिजली, पानी, डाक, टेलीफोन, सार्वजनिक परिवहन, अस्पताल, बैंकिंग तथा बीमा जैसी सेवाओं से संबंधित विवाद शामिल हो सकते हैं।
इस व्यवस्था का उद्देश्य नागरिकों को लंबी न्यायिक प्रक्रिया में जाने से पहले विवाद का समाधान सुलह और समझौते के माध्यम से उपलब्ध कराना है।
मुकदमे से पहले समाधान का अवसर
स्थायी लोक अदालत की व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू प्री-लिटिगेशन तंत्र है। अर्थात किसी विवाद को नियमित न्यायालय में ले जाने से पहले स्थायी लोक अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।
प्रशिक्षण में बताया गया कि यहां पहले दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति और सुलह के माध्यम से विवाद समाप्त कराने का प्रयास किया जाता है। इससे समय और संसाधनों की बचत के साथ पक्षकारों को अनावश्यक मुकदमेबाजी से भी राहत मिल सकती है।
सरल और सुलभ प्रक्रिया पर जोर
प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को बताया गया कि लोक अदालत की व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य आम नागरिक के लिए न्याय को अधिक सरल, सुलभ और कम खर्चीला बनाना है। जरूरतमंद व्यक्ति को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने और उसे उचित विधिक मंच तक पहुंचाने में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण एवं पराविधिक स्वयंसेवियों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
सुलह न होने पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय
प्रशिक्षण के दौरान स्थायी लोक अदालत के निर्णय संबंधी प्रावधानों की भी जानकारी दी गई। बताया गया कि यदि पक्षकारों के बीच सुलह नहीं हो पाती है तो विधि के अंतर्गत लागू प्रावधानों के अनुसार स्थायी लोक अदालत मामले के गुण-दोष के आधार पर निर्णय कर सकती है। ऐसे निर्णय की वैधानिक प्रभावशीलता के संबंध में प्रतिभागियों को विस्तार से अवगत कराया गया।
गांव-गांव जाकर जरूरतमंदों की पहचान करने का आह्वान
सचिव/सीनियर सिविल जज दयाराम ने पराविधिक स्वयंसेवियों को निर्देशित किया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय रहकर ऐसे लोगों और विवादों की पहचान करें, जिन्हें विधिक सहायता या स्थायी लोक अदालत की सेवाओं की आवश्यकता है।
उन्होंने विशेष रूप से बिजली, पानी, बैंकिंग और बीमा सहित सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं से संबंधित मामलों में लोगों को उचित विधिक मंच की जानकारी देने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि किसी पीड़ित या जरूरतमंद व्यक्ति को अनावश्यक रूप से कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने के बजाय पहले उपलब्ध विधिक सहायता एवं वैकल्पिक विवाद समाधान व्यवस्था की जानकारी दी जानी चाहिए।
‘न्याय सबके लिए’ की भावना को मजबूत करने की पहल
प्रशिक्षण का व्यापक उद्देश्य केवल कानूनी प्रक्रिया की जानकारी देना नहीं, बल्कि समाज के गरीब, असहाय, वंचित और जरूरतमंद वर्ग को न्याय की मुख्यधारा से जोड़ना भी रहा।
पराविधिक स्वयंसेवियों से अपेक्षा की गई कि वे अपने क्षेत्रों में कानूनी जागरूकता का माध्यम बनें और आम लोगों को उनके अधिकारों, उपलब्ध विधिक सहायता तथा विवाद समाधान के वैकल्पिक माध्यमों के बारे में जानकारी दें।
ऐसी जागरूकता से एक ओर जहां लोगों को समय और धन की बचत के साथ उचित विधिक मंच तक पहुंचने में मदद मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर अनावश्यक मुकदमेबाजी को कम करने और न्यायालयों के बोझ को घटाने में भी सहायता मिलेगी।
अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुंचाना लक्ष्य
कार्यक्रम में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि न्याय तभी सार्थक है, जब उसकी पहुंच समाज के अंतिम व्यक्ति तक हो। आर्थिक रूप से कमजोर अथवा कानूनी जानकारी के अभाव में अपने अधिकारों से अनजान व्यक्ति को विधिक सहायता एवं सही मार्गदर्शन उपलब्ध कराना विधिक सेवा संस्थाओं की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
प्रशिक्षण कार्यक्रम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिसके माध्यम से पराविधिक स्वयंसेवियों को जमीनी स्तर पर कानूनी जागरूकता फैलाने और जरूरतमंद लोगों को स्थायी लोक अदालत सहित उपलब्ध विधिक सेवाओं से जोड़ने के लिए तैयार किया गया।
