एक चिन्तन : शुभ और अशुभ कर्म कब करने चाहिए, जानिए उत्तरायण-दक्षिणायन और अधिक मास का महत्व
उत्तरायण में शुभ कार्य और दक्षिणायन में अशुभ कर्म का उल्लेख, ज्योतिषाचार्य हर्षमणि बहुगुणा ने बताया सनातन परंपराओं का वैज्ञानिक आधार
टिहरी गढ़वाल, SKS News।
सनातन धर्म में शुभ और अशुभ कार्यों के लिए समय निर्धारण का विशेष महत्व माना गया है। ज्योतिषाचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा ने उत्तरायण, दक्षिणायन, अधिक मास एवं शुभ संस्कारों के संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि हमारे शास्त्रों में प्रत्येक शुभ कार्य के लिए उपयुक्त समय निर्धारित किया गया है, जिसका पालन करना अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि शास्त्रों के अनुसार गृह प्रवेश, विवाह, देव प्रतिष्ठा, मुंडन संस्कार, उपनयन एवं दीक्षा जैसे शुभ कार्य उत्तरायण में करना श्रेष्ठ माना गया है। जबकि दक्षिणायन में अशुभ कर्मों को करने का विधान बताया गया है।
उन्होंने शास्त्रीय श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा—
«“गृहप्रवेशस्त्रिदशप्रतिष्ठा विवाहचौलव्रतबन्धदीक्षा:।
सौम्यायने कर्म शुभं विधेयं यद्गर्हितं तत्खलु दक्षिणे च।।“»
अर्थात उत्तरायण में सभी प्रकार के शुभ कार्य किए जा सकते हैं, जबकि दक्षिणायन में अशुभ कार्य करना उचित माना गया है।
विवाह और संस्कारों के लिए कौन-से मास श्रेष्ठ?
ज्योतिषाचार्य बहुगुणा के अनुसार उत्तरायण में चैत्र मास को छोड़कर वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, मार्गशीर्ष, माघ एवं फाल्गुन मास विवाह के लिए शुभ माने गए हैं। विशेष रूप से मार्गशीर्ष मास का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि इसी मास में भगवान श्रीराम का विवाह संपन्न हुआ था।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जनसंख्या वृद्धि, स्थान की कमी और सामाजिक परिस्थितियों के कारण लोग अपनी सुविधा अनुसार विवाह एवं अन्य शुभ कार्य करने लगे हैं, लेकिन शास्त्रों में बताए गए नियमों की अनदेखी भविष्य में परेशानियों का कारण बन सकती है।
अधिक मास में शुभ कार्य वर्जित
ज्योतिषाचार्य ने स्पष्ट किया कि इस वर्ष ज्येष्ठ मास अधिक मास (मलमास) के रूप में पड़ रहा है। शास्त्रों के अनुसार अधिक मास में विवाह, गृह प्रवेश, उपनयन, मुंडन या कोई भी नया शुभ कार्य नहीं किया जाता।
उन्होंने कहा कि अधिक मास में केवल भगवान विष्णु एवं भगवान शिव की उपासना, दान-पुण्य, कथा, जप-तप, व्रत और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व होता है।
संस्कारों में जल्दबाजी नहीं, विधि-विधान जरूरी
उन्होंने कहा कि आजकल लोग नाच-गाने और आयोजन की भव्यता पर अधिक ध्यान देते हैं, लेकिन संस्कारों के समय विधि-विधान में जल्दबाजी करते हैं, जो उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि ब्राह्मण समाज का दायित्व है कि वह लोगों को सही मार्गदर्शन दे और शास्त्रसम्मत तरीके से संस्कार सम्पन्न कराए। यदि समाज को सनातन संस्कृति को बचाना है तो नियमों और परंपराओं का सम्मान करना आवश्यक है।
ज्योतिषाचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा ने कहा कि शुभ कार्यों में सही समय और विधि का पालन जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और स्थिरता लाता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे धार्मिक कार्यों को केवल औपचारिकता न समझें, बल्कि सनातन संस्कृति के मूल स्वरूप को समझते हुए श्रद्धा एवं शास्त्रीय विधि से सम्पन्न करें।
*प्रस्तुति: ज्योतिषाचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा
