लेखक: लेफ्टिनेंट कर्नल गंभीर सिंह रौतेला | प्रस्तुति: सो.ला. सकलानी ‘निशांत’
बचपन की यादों से वर्तमान तक की यात्रा
5 मई 2025, मेरे जीवन का एक अविस्मरणीय दिन बन गया। लगभग 53 वर्षों बाद, मुझे अपने आदरणीय शिक्षक और मार्गदर्शक श्री धूम सिंह नेगी जी से पुनः मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह केवल एक संयोग या औपचारिक भेंट नहीं थी, बल्कि आत्मा से उपजी एक पुरानी अभिलाषा की पूर्णता थी।
नेगी जी जब मुझे मिले, तो उनकी आंखों में प्रसन्नता, अपनापन और वर्षों पुरानी स्मृतियों की झलक थी। हमारी लगभग दो घंटे की बातचीत में जीवन, समाज और शिक्षा से जुड़े अनेक विषयों पर चर्चा हुई।
शिक्षा, पलायन और समाज पर चिंतन
हमारी चर्चा केवल अतीत की यादों तक सीमित नहीं रही। हमने उत्तराखंड में शिक्षा की वर्तमान स्थिति, रोजगार के अवसरों की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं की समस्याएं और तेजी से हो रहे पलायन जैसे गहन विषयों पर विचार साझा किए। यह संवाद जितना भावनात्मक था, उतना ही ज्ञानवर्धक और विचारोत्तेजक भी।
एक शिक्षक जो आंदोलन बना
श्री धूम सिंह नेगी केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि एक आंदोलनकारी व्यक्तित्व हैं। उन्होंने चिपको आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और उनके इसी सामाजिक योगदान के लिए उन्हें जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
1960 के दशक में, उन्होंने सरकारी शिक्षक की नौकरी त्याग दी और जाजल गांव में एक जूनियर हाईस्कूल की स्थापना की — जब वहाँ शिक्षा की कोई सुविधा नहीं थी। यह विद्यालय आचार्य गोपेश्वर प्रसाद कोठियाल जी की परिकल्पना थी, जिसे नेगी जी ने साकार किया।
जब मैंने उनसे पूछा कि स्कूल का नाम आचार्य कोठियाल के नाम पर क्यों नहीं रखा गया, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा – “शायद उस समय समाज और शासन में वह जागरूकता नहीं थी।”
एक स्मृति, एक उपहार, एक प्रेरणा
इस भेंट को विशेष बना दिया उनकी आत्मीय भेंट — उनकी लिखी पुस्तक “मिट्टी, पानी और बयार”, जो उन्होंने मुझे स्मृति चिह्न के रूप में दी। यह पुस्तक केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और शिक्षा के प्रति उनकी गहरी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है।
हमारे साथ लिया गया एक स्मृति चित्र, मेरे लिए अब केवल एक फोटो नहीं, बल्कि एक युग, एक मूल्य, और एक प्रेरणा का प्रतीक बन गया है।
नेगी जी: शिक्षा और सेवा का जीवंत प्रतीक
श्री धूम सिंह नेगी जैसे शिक्षक और समाजसेवी उस परंपरा के प्रतीक हैं, जहाँ शिक्षा केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन दर्शन होती है। वे आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा हैं — जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद समाज में बदलाव की मशाल जलाई।
🛑 अस्वीकरण (Disclaimer):
यह लेख लेखक लेफ्टिनेंट कर्नल गंभीर सिंह रौतेला द्वारा लिखे गए व्यक्तिगत अनुभव और विचारों पर आधारित है। इसमें व्यक्त भावनाएं पूर्णतः लेखक की निजी स्मृति और दृष्टिकोण से प्रेरित हैं। इसका उद्देश्य किसी संस्था या व्यक्ति विशेष का प्रचार या आलोचना नहीं है, बल्कि एक शिक्षक के जीवन से जुड़ी प्रेरणादायक यात्रा को साझा करना है।
