दावे और दस्तावेज़ों के बीच फंसा सच: आखिर बीकेटीसी अध्यक्ष की यात्रा का खर्च किसने उठाया?
संपादकीय
दावे और दस्तावेज़ों के बीच फंसा सच: आखिर बीकेटीसी अध्यक्ष की यात्रा का खर्च किसने उठाया?
– केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’
उत्तराखंड की आस्था, श्रद्धा और सनातन परंपरा का सबसे बड़ा केंद्र माने जाने वाले श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ धाम केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का प्रतीक भी हैं। ऐसे में जब इन धामों का संचालन करने वाली संस्था श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) से जुड़े किसी विषय पर सवाल उठते हैं, तो वह केवल प्रशासनिक मामला नहीं रह जाता, बल्कि जनविश्वास से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।
इन दिनों सोशल मीडिया पर मंदिर समिति के अध्यक्ष श्री हेमंत द्विवेदी का एक वीडियो तेजी से प्रसारित हो रहा है। वीडियो में अध्यक्ष महोदय यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि वे मंदिर समिति से टीए/डीए नहीं लेते, यहां तक कि खाने, रहने और हेलीकॉप्टर यात्रा का खर्च भी स्वयं वहन करते हैं।
सामान्य परिस्थितियों में इस बयान को सार्वजनिक जीवन में सादगी और पारदर्शिता का उदाहरण माना जा सकता था। लेकिन इसी बीच सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त एक दस्तावेज़ ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
RTI में सामने आई खर्च की जानकारी
RTI कार्यकर्ता विकेश नेगी को मंदिर समिति द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में कुछ ऐसे भुगतान दर्ज हैं, जो अध्यक्ष एवं अन्य अधिकारियों की यात्राओं से जुड़े बताए गए हैं।
दस्तावेज़ में उल्लेख है कि—
1. ऊखीमठ प्रवास पर खर्च
11 मई 2025 को अध्यक्ष जी के ऊखीमठ प्रवास के दौरान आवासीय एवं भोजन व्यवस्था पर लगभग 30 हजार रुपये से अधिक का भुगतान किया गया।
2. हेलीकॉप्टर यात्रा का खर्च
12 मई 2025 को अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा अन्य अतिथियों की गुप्तकाशी से केदारनाथ धाम की हेलीकॉप्टर यात्रा के लिए लगभग 68,540 रुपये का भुगतान दर्ज है।
3. बाद की यात्राओं पर व्यय
23 और 26 मई 2025 की यात्राओं से संबंधित हेलीकॉप्टर किराए के रूप में लगभग 6,655 रुपये का भुगतान भी दर्शाया गया है।
4. अन्य मदों का भुगतान
दस्तावेज़ में विभिन्न मदों को जोड़कर कुल 1,17,970 रुपये का व्यय दर्शाया गया है।
अब सवाल उठना स्वाभाविक है
यदि सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में किया गया दावा सही है कि अध्यक्ष जी अपनी यात्रा, भोजन और आवास का खर्च स्वयं वहन करते हैं, तो फिर RTI में उपलब्ध इन भुगतानों की प्रकृति क्या है?
क्या ये खर्च वास्तव में अध्यक्ष जी से संबंधित थे?
क्या यह राशि किसी अन्य अधिकृत मद के अंतर्गत खर्च की गई?
क्या दस्तावेज़ों की व्याख्या में कोई भ्रम है?
या फिर RTI में उपलब्ध कराई गई जानकारी में कोई त्रुटि है?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल संबंधित अभिलेखों और निष्पक्ष जांच से ही मिल सकता है।
मामला केवल राशि का नहीं, विश्वास का है
लोकतांत्रिक संस्थाओं में पारदर्शिता का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि जनता का विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी होता है।
यदि अध्यक्ष जी का दावा सही है, तो RTI में उपलब्ध दस्तावेज़ उनकी छवि को अनावश्यक रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं।
और यदि दस्तावेज़ सही हैं, तो फिर सार्वजनिक मंच से दिए गए बयान और सरकारी अभिलेखों के बीच यह विरोधाभास चिंता का विषय बन जाता है।
दोनों ही परिस्थितियों में सत्य सामने आना आवश्यक है।
मंदिर समिति के कर्मचारियों पर भी उठते हैं सवाल
यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है।
यदि अध्यक्ष जी के कथन के अनुसार उन्होंने कोई भुगतान मंदिर समिति से नहीं लिया, तो फिर RTI के माध्यम से उपलब्ध कराए गए इन अभिलेखों की जिम्मेदारी किसकी है?
क्या संबंधित अधिकारियों ने अधूरी या भ्रामक जानकारी उपलब्ध कराई?
क्या दस्तावेज़ों का सही संदर्भ नहीं बताया गया?
या फिर प्रशासनिक स्तर पर रिकॉर्ड संधारण में कोई गंभीर चूक हुई?
इन सवालों के जवाब भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने खर्च से जुड़े प्रश्न।
जांच ही दूर कर सकती है संशय
सार्वजनिक जीवन में किसी भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा सबसे बड़ी पूंजी होती है। इसलिए बिना जांच के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
लेकिन जब एक ओर सार्वजनिक बयान और दूसरी ओर आधिकारिक दस्तावेज़ मौजूद हों, तो पारदर्शिता की मांग स्वाभाविक है।
इसलिए आवश्यकता है कि—
- संबंधित भुगतान अभिलेखों की स्वतंत्र जांच हो।
- खर्च की वास्तविक प्रकृति सार्वजनिक की जाए।
- यदि कोई त्रुटि हुई है तो उसे सुधारा जाए।
- और यदि किसी अधिकारी द्वारा गलत सूचना दी गई है तो उसकी जवाबदेही तय की जाए।
Conclusions:
यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। यह सवाल जनविश्वास, पारदर्शिता और जवाबदेही का है।
यदि अध्यक्ष श्री हेमंत द्विवेदी का दावा सही है, तो उन्हें स्वयं आगे आकर इस विरोधाभास को स्पष्ट करना चाहिए और यह बताना चाहिए कि RTI में दर्ज भुगतान किस संदर्भ में किए गए थे।
और यदि वास्तव में कोई प्रशासनिक त्रुटि हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच भी उतनी ही आवश्यक है।
क्योंकि आस्था के सबसे बड़े केंद्रों का संचालन केवल नियमों से नहीं, बल्कि विश्वास से चलता है। और विश्वास तभी मजबूत होता है जब सवालों का जवाब तथ्यों और पारदर्शिता के साथ दिया जाए।
(Disclaimer: यह लेख सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो तथा RTI के माध्यम से उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़ों के आधार पर उठे सार्वजनिक प्रश्नों का विश्लेषण है। अंतिम सत्य संबंधित पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रिया एवं सक्षम जांच के बाद ही स्थापित माना जाएगा।)
