लोकतंत्र में संवाद बनाम टकराव: सत्ता का दायित्व और विपक्ष की भूमिका
लोकतंत्र की शक्ति असहमति को सुनने में है, उसे दबाने में नहीं; संवाद ही लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे प्रभावी माध्यम है
— राकेश राणा
पूर्व जिलाध्यक्ष, जिला कांग्रेस कमेटी, टिहरी गढ़वाल
कार्यकारी अध्यक्ष, उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी मंच, टिहरी गढ़वाल
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इसकी सबसे बड़ी शक्ति संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिक स्वतंत्रताएँ हैं। यही व्यवस्था प्रत्येक नागरिक, छात्र, सामाजिक संगठन और राजनीतिक दल को अपनी बात शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से रखने का अधिकार प्रदान करती है। लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह सतत संवाद, जवाबदेही, सहमति और असहमति की स्वस्थ संस्कृति पर आधारित शासन प्रणाली है।
जब किसी राष्ट्रीय महत्व के विषय पर व्यापक जनचिंता उत्पन्न होती है, तब सरकार का दायित्व केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं होता, बल्कि जनता की आशंकाओं को गंभीरता से सुनना, उनका समाधान प्रस्तुत करना और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक होता है।
हाल के समय में नीट परीक्षा से जुड़े कथित प्रश्नपत्र लीक के आरोपों ने देशभर के लाखों छात्र-छात्राओं और अभिभावकों के मन में परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। ऐसी परिस्थितियों में परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच तथा दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग स्वाभाविक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन प्रश्नों को उठाना और उनका उत्तर देना, दोनों ही समान रूप से आवश्यक हैं।
संसद केवल विधेयक पारित करने का मंच नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच भी है। जब किसी मुद्दे को संसद में प्रमुखता से उठाया जाता है, तब सरकार की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी होती है कि वह तथ्यों के आधार पर स्पष्ट, संतोषजनक और उत्तरदायी जवाब दे। लोकतंत्र में जवाबदेही ही सुशासन की वास्तविक पहचान मानी जाती है।
इसी संदर्भ में लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी द्वारा संसद के भीतर छात्रों के मुद्दों को उठाना तथा उसके बाद छात्रों के समर्थन में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक राजनीति के दायरे में आने वाली गतिविधियाँ हैं। विपक्ष की भूमिका केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि जनता की चिंताओं को शासन तक पहुँचाना भी है। यदि किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा अनावश्यक बल प्रयोग, दुर्व्यवहार अथवा अभद्र व्यवहार के आरोप लगते हैं, तो ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में आवश्यक है। असहमति का उत्तर संवाद से दिया जाना चाहिए, टकराव से नहीं।
इसके साथ ही देश के विभिन्न राज्यों में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ते टकराव और एक-दूसरे के कार्यालयों के घेराव जैसी घटनाएँ भी लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए चिंता का विषय हैं। लोकतंत्र विचारों की प्रतिस्पर्धा का नाम है, व्यक्तियों के संघर्ष का नहीं। जब राजनीतिक मतभेद सड़क पर टकराव का रूप लेने लगते हैं, तब उसका दुष्प्रभाव केवल राजनीतिक दलों पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामाजिक सौहार्द पर भी पड़ता है।
यदि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं के आरोप सामने आते हैं, तो स्वाभाविक रूप से जनता जवाबदेही तय करने की मांग करेगी। ऐसे मामलों में विपक्ष द्वारा संबंधित मंत्री से नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने अथवा इस्तीफे की मांग करना लोकतांत्रिक राजनीति का एक स्थापित हिस्सा है। वहीं सरकार का दायित्व है कि वह निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी एवं पारदर्शी व्यवस्था विकसित करे।
राजनीति का उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी को शत्रु सिद्ध करना नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करना होना चाहिए। यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा व्यक्तिगत वैमनस्य और संघर्ष में बदल जाएगी, तो सबसे अधिक क्षति लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं और देश के युवाओं के विश्वास को होगी।
लोकतंत्र में सत्ता की जिम्मेदारी स्वाभाविक रूप से अधिक होती है, क्योंकि शासन संचालन का दायित्व उसी के पास होता है। इसलिए सरकार को आलोचना को लोकतंत्र का अभिन्न अंग मानते हुए उसे धैर्यपूर्वक सुनना, तथ्यों के साथ उत्तर देना और जनता के बीच विश्वास बनाए रखना चाहिए। दूसरी ओर, विपक्ष का भी यह दायित्व है कि वह अपने आंदोलनों और संघर्षों को संविधान तथा लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप संचालित करे।
आज आवश्यकता किसी राजनीतिक दल की विजय या पराजय की नहीं, बल्कि देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने की है। जब तक परीक्षा प्रणाली पूर्णतः पारदर्शी, निष्पक्ष और विश्वसनीय नहीं बनेगी तथा जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक युवाओं का विश्वास पूरी तरह बहाल नहीं हो सकेगा।
लोकतंत्र तभी सशक्त होगा, जब सत्ता और विपक्ष दोनों संविधान की भावना का सम्मान करते हुए संवाद, जवाबदेही और जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है और यही भारत की लोकतांत्रिक परंपरा की वास्तविक शक्ति भी।
संपादकीय अस्वीकरण: यह लेख लेखक राकेश राणा के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है। इसमें व्यक्त मत आवश्यक नहीं कि सरहद का साक्षी डिजिटल मीडिया के संस्थागत दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करते हों। राजनीतिक एवं सार्वजनिक मुद्दों पर प्रकाशित विचार लेखों का उद्देश्य लोकतांत्रिक विमर्श को प्रोत्साहित करना है।
