शिक्षक दिवस पर विशेष—जब शिक्षण की ऊर्जा प्रशासनिक बोझ और आयोजनों में बिखर जाती है, तब शिक्षा और शिक्षक दोनों ही अस्तित्व के संकट से जूझते हैं।
शिक्षक दिवस पर सवाल: क्या हम अपने गुरुओं को उनकी असली भूमिका लौटा पा रहे हैं?
औपचारिक सम्मान के बीच दबे सच—कक्षा से ज्यादा प्रशासनिक कार्यों में उलझे शिक्षक, शिक्षा की गुणवत्ता पर गहराता संकट
विद्यालय शिक्षा की कृषि भूमि है तथा छात्र इसमें विकसित होने वाली पौध, और इन सबके बीच शिक्षक वो माली है जो अपने समय, श्रम, उपार्जित ज्ञान तथा एकाग्रता से सिंचित कर छात्रों को सामाजिक और शैक्षणिक विकास हेतु निरन्तर अनुकूलता प्रदान करता है और क्यों कि इसके एवज में उसके अपने बच्चे भी पलते हैं इसलिए इसे सेवा, परोपकार, विद्यादान इत्यादि भारी-भरकम शब्दों से लादने की अपेक्षा वह व्यावहारिक दृष्टि से देखना ज्यादा पसंद करता है। वह इसे एक ऐसे व्यावसायिक उत्तरदायित्व के रूप में देखता है जिसे यदि अपवाद छोड़ दें तो वह सदियों से नैतिकता में बंधकर निभाता चला आ रहा है और इसके बदले समाज ने भी बिना डर के उसे एक अलग दृष्टि से देखा तथा सम्मान प्रदान किया।
एक शिक्षक की कई प्रकार की अर्जित सम्पत्तियाँ होती हैं। उसके पास बच्चों का अथाह प्रेम और सम्मान तो पूँजी के तौर पर होता ही है साथ ही उसकी ये आर्थिकी और चरम पा जाती है जब उसका एक छात्र सफल होने पर चरण-स्पर्श करने के बहाने अपनी सफलता का सारा श्रेय उसके कदमों में लाकर समर्पित कर देता है। उसकी कमाई में अन्य एक और चीज शामिल होती है, वो है प्रत्येक कामयाब छात्र के हाथ में मिठाई का वो टुकड़ा जिसे बच्चा भावुक होकर, आत्मीयता और सम्मान की चासनी में डुबोकर, सबसे पहले अपने शिक्षक को खिलाने आता है। यहाँ ध्यातव्य है कि छात्र के अभिवादन मात्र के रूप में किये गये इस चरण स्पर्श का और मिठाई के एक छोटे से टुकड़े का आर्थिक मूल्य भले ही ना के बराबर हो, किन्तु भावनात्मक मूल्य एक शिक्षक की जीवन भर की अर्जित पूँजी से कई गुना उपर होता है। उसके लिए उस छात्र पर खर्ची गयी अपनी ऊर्जा, समय, उपार्जित ज्ञान और एकाग्रता का इससे श्रेष्ठ कुछ अन्य पारितोषिक हो ही नहीं सकता।
इस प्रकार यदि बारीकी से देखा जाये तो एक शिक्षक का संसार इतना ही होता है। उसके चारों तरफ कहीं छात्रों में परीक्षा की घबराहट पसरी रहती है, तो कहीं उनके भविष्य की तैयारियों के लिए बुनी गयी कुछ योजनाओं का ताना-बाना। कहीं बच्चों की मीठी और तीखी शरारतें, तो कहीं छोटी-छोटी मगर बच्चों के लिए पहाड़ जैसी समस्याओं का अंबार। कहीं एक-दूसरे की शिकायतों का हास्यास्पद दृश्य होता है, तो कहीं छात्रों और पुस्तकों का एक अनूठा झुरमुट और इन सबके बीच उनकी शिकायतों और समस्याओं के निराकरण की आशा का जो पहला और अकेला केन्द्र बिन्दु होता है वो होता है शिक्षक, जिसका फुलटाईम जॉब ही शिक्षण है। बस इतना सा ही तो था एक शिक्षक का दैनिक संसार।
लेकिन आज समय के साथ शिक्षक के समाज का स्वरूप बदल चुका है। अब उसके चारों ओर कहीं अनेकों कार्यक्रमों के आयोजन के लंबे-चौड़े फरमान लिए हुए बहुत सारी चिट्ठी-पत्रियाँ पसरी रहती हैं, तो कहीं ऑफिस से जवाब के रूप में जाने को तैयार “शीर्ष वरीयता” की हेडिंग से लिखी जरूरी डाकें बिखरी पड़ी होती हैं। कहीं किसी आयोजन की सार्वजनिक सूचना, तो कहीं किसी कार्यक्रम की फोटो सहित माँगी गयी भारी-भरकम आख्या, कहीं चुनाव का तुगलकी फरमान लिए कई महीनों तक सैक्टर अधिकारी, जोनल अधिकारी अथवा ए0आर0ओ0 हेतु नियुक्ति आदेश, तो कहीं मतगणना हेतु प्रशिक्षण इत्यादि अन्य कार्यक्रमों के क्रियान्वयन का अतिरिक्त भार। इस तरह आज एक शिक्षक का व्यावसायिक संसार पूरी तरह से बदल चुका है। क्यों कि अब इस तरह के अतिरिक्त कार्यों ने उसके मुख्य कार्य ( शिक्षण ) को फुल टाईम जॉब से बदलकर पार्ट टाइम जॉब बना दिया है।
उच्च शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा अथवा प्राथमिक शिक्षा, शिक्षा का स्तर कोई भी हो किन्तु शिक्षक की दशा और चुनौतियाँ सब जगह लगभग समान हैं , 19-20 का अंतर हो तो कह नहीं सकते । चुनौति यह कि शिक्षक के अंदर का शिक्षक तथा शिक्षण जीवित रह सके । हमारे एक सीनियर हिन्दी के प्राध्यापक, जो अब नहीं रहे, समितियों और प्राचार्य इत्यादि अन्य कई प्रभारों की अधिकता के कारण महीने में न जाने कितने दिन अपनी कक्षा में नहीं जा पाते थे और ये दर्द बहुत बार उनकी जुबाँ से छलक भी जाता था। इसलिए एक शिक्षक के लिए चुनौती एक ही है, वो ये कि शिक्षक और शिक्षण को बचाया जा सके।
आज के इस दौर में संयोजक, प्रभारी तथा नोडल इत्यादि के दलदल में फँसकर प्रत्येक क्षण एक नयाँ शिक्षक दम तोड़ रहा है । शिक्षक पर प्राचार्य का प्रभार थोपा गया तो शिक्षक मारा गया और अगर कर्मचारी का कार्यभार सौंपा गया तो भी शिक्षक मारा गया । क्यों कि शिक्षण संतुलन माँगता है, इसलिए उसका आज असली संघर्ष एक शिक्षक को बचाये रखने के लिए है । आज उसकी सारी क्षमता, समय और एकाग्रता ऐसे संघर्ष पी रहे हैं जिनका लाभ बेशक समाज को हो, किन्तु उसके विद्यालय और उसके छात्रों को बिल्कुल नहीं । वह काम तो भले ही शिक्षित व्यक्ति का कर रहा है किन्तु वह शिक्षण नहीं कर पा रहा है । और शिक्षक का कार्य किसी भी रूप में हो लेकिन केवल और केवल शिक्षण है।
तमाम तरह की समितियों के कार्य, आय दिन होने वाले आयोजन और भी न जाने कितने प्रकार के व्यवधान हैं जो कि कभी शिक्षकों को उलझाकर शिक्षण को बाधित करते हैं तो कभी छात्रों को उलझाकर और कभी दोनों को उलझाकर । दिवसों और कार्यक्रमों के आयोजनों की तो मानो होड़ लगी हो। उस पर विद्यालयों में आय दिन आने वाली डाक और उनके जवाब, एन0 एस0 एस0, नमामि गंगे, पर्यावरण प्रकोष्ठ, एण्टी ड्रग, समर्थ, निर्वाचन, मतगणना, रेड क्रॉस, रेड रिबन, यू0 सी0 सी0, छात्र-संघ, क्रीड़ा, सांस्कृतिक समिति, संबद्धता समिति, उद्यमिता इत्यादि अनेकों समितियों का उलझा हुआ भीषण जंजाल, इसके साथ चुनाव, मतगणना, जनगणना, मध्याह्न भोजन उसकी व्यवस्था एवं हिसाब, पशुगणना और आय दिन होने वाले आयोजनों के साथ कहीं-कहीं प्रभारी प्राचार्य के बोझ इत्यादि अनेकों अतिरिक्त कार्यभारों के तले छात्रों का वह शिक्षक दम तोड़ चुका है जो कि केवल छात्रों के लिए नियुक्त किया गया था। और अब उसके भीतर के शिक्षक के दम तोड़ने के बाद आज अगर उसमें कुछ जिन्दा है, तो वह है केवल और केवल संस्था का एक पढ़ा-लिखा कर्मचारी।
भले ही सर्वांगीण विकास की आड़ में जरूर हम इस तरह के आयोजनों की पैरवी कर सकते हैं लेकिन क्या इनकी मात्रात्मक सीमा तय नहीं की जानी चाहिए?
ये हों किन्तु इस मात्रा में नहीं कि शिक्षा का दम ही उखड़ जाए । वर्ष 2024 में कुल 180 शैक्षणिक दिवसों में इस तरह के अतिरिक्त आयोजन दिवसों की संख्या 80 दिन से अधिक रिकॉर्डेड रही है । इसमें यदि बहुत कम भी गिने जायें तो कम से कम 02 वादन प्रतिदिन बाधित हो जाते हैं ,जो कि अप्रायोगिक विषयों में एक दिन के संपूर्ण शिक्षण-समय का लगभग दुगुना समय है । इस तरह से हमारे द्वारा पूरे शैक्षणिक सत्र में लगभग 45 प्रतिशत से अधिक शैक्षणिक दिवस केवल इस प्रकार के आयोजनों में बर्बाद किये जा रहे हैं।
इस प्रकार यह आयोजन केवल छात्रों का 45 प्रतिशत से अधिक समय ही नहीं पी रहे बल्कि एक शिक्षक की विद्यालय में लगने वाली 45 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा, समय और श्रम भी पी रहे हैं । इसके बाद उसकी विवशता देखिए कि 45 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा, समय, एवं श्रम समितियों, शिक्षणेतर विविध कार्यों तथा आयोजनों पर लगाने के बाद भविष्य में उसका मूल्यांकन, मूल्यांकन कर्ताओं द्वारा छात्रों की उपस्थिति, शैक्षिक प्रदर्शन, परीक्षा परिणाम और प्रवेश के आधार पर किया जायेगा । और फिर इन्हीं सब चीजों के दुष्परिणाम के लिए उसे दोषी मान भी लिया जाता है। लेकिन इन सबके लिए दोषी माना जाने वाला वह शिक्षक उतना ही जिम्मेदार है जितना कि वो बहू जिसकी सास उसे घर के काम से हटाकर बाहर के काम पर लगा दे और फिर दोषारोपण करे कि बहू घर के काम नहीं करती।
कहने को एक शिक्षक की नैतिक जवाबदेही केवल शिक्षण की है किन्तु छात्रों के हिस्से की इसकी सारी ऊर्जा, समय और एकाग्रता तमाम ऐसी समितियों और प्रभारों पर उड़ेल दी जाती है जिनका उसके शिक्षण से दूर-दूर तक कोई सरोकार है ही नहीं । धीरे-धीरे विद्यार्थियों को वह शिक्षक जो कि दिन भर समितियों और प्रभारों में उलझा हुआ है, न पढ़ाने वाला और विद्यालय प्रशासन कर्तव्यबोध रहित दिखने लगता है, जिस कारण धीरे-धीरे आगे चलकर यही असंतोष छात्र-शिक्षक संघर्ष का रूप लेने लगता है और यदि प्राचार्य का प्रभार भी किसी शिक्षक के पास है तो उसके शिक्षण की जटिलतायें और बढ़ने लगती हैं । इस प्रकार आज इस वर्ग की जटिलताओं ने इसके कर्तव्यपथ को संघर्षों और चुनौतियों से भरकर इसके कार्यक्षेत्र को एक रणभूमि बना दिया है । आज उसकी सबसे बड़ी चुनौति यह है कि उसे स्वयं को शिक्षण से जोड़े रखना है और प्राचार्य, बाबू, संयोजक, प्रभारी, सदस्य तथा नोडल इत्यादि तमाम भूमिकाओं के बीच भी खुद के अंदर के शिक्षक को जीवित रखना है।
इतना ही नहीं आगे चलकर कल उसे औचक निरीक्षण में पूछे जाने वाले उन तमाम प्रश्नों के उत्तर भी देने होगें जिनके लिए उसे जिम्मेदार ठहराया तो जाता है लेकिन वह जिम्मेदार होता नहीं।
उससे पूछा जायेगा कि बच्चे कम क्यों हैं?
उससे पूछा जायेगा कि तुमने प्रवेश के लिए प्रयास क्यों नहीं किये?
क्या आप लोग विद्यालय में निर्धारित समय तक नहीं रहते हो?
क्या विद्यालय में शिक्षक पढ़ाते भी हैं? यदि हाँ तो फिर छात्र संख्या क्यों घट रही है?
अब इन सब प्रश्नों का कारण यह शिक्षक हो या न हो, किन्तु उत्तर इसे ही देना होगा।
इस तरह कुछ तीखे प्रश्न छोड़कर और कुछ शख्त हिदायतों एवं नाराजगियों के साथ निरीक्षक मण्डल तो विदा हो जाता है मगर शिक्षक निराश मिलता है । शिक्षक इसलिए व्यथित नहीं होता कि उसे दोषी करार दिया गया, बल्कि इसलिए व्यथित होता है कि उसे उस बात के लिए दोषी करार दे दिया जाता है, जिसके लिए वो दूर-दूर तक भी जिम्मेदार नहीं । इसलिए अब स्वयं ही स्वयं का मूल्यांकन करने लगता है-
सोचता है कि क्या मैं सही में पढ़ाना नहीं चाहता?
पर मैं तो नौकरी में आया ही पढ़ाने के लिए था, फिर पढ़ाने से मुझे क्या परहेज हो सकता है?
कभी उसे लगता है कि –
पूरे दिन भर थोपे जाने वाले शिक्षणेतर कार्यों में व्यस्त रहने के बाद भी पूरी कक्षायें कैसे ली जा सकती हैं? शायद वह सीख ही नहीं पाया।
लेकिन फिर सोचता है, कि जब विद्यालय के काम विद्यालय में पूरे नहीं होते तो घर में भी करने पड़ते हैं इसलिए यह बात तो युक्ति संगत हो ही नहीं सकती।
फिर सोचता है, क्या मैं सही में विद्यालय से नदारद रहता हूँ?
पर अगर ऐसा है तो फिर ये बायोमैट्रिक की बेढ़ियाँ किस काम की हैं, इन्हें काट कर फेंक दिया जाना चाहिए। मेरी निष्ठा और श्रम के बाद भी मुझ पर तो शक किया जा सकता है लेकिन इस पर तो यकीन किया ही जाना चाहिए । यह मशीन भले ही मेरे नैतिक मूल्यों पर आघात करती हो और मुझे अविश्वसनीय होने का आभास कराती हो, किन्तु मेरी उपस्थिति और समय निष्ठा का इससे बड़ा अन्य कोई प्रमाण भी तो नहीं । इसलिए विद्यालय में न रहने वाली यह बात तो कहीं से भी तर्कसंगत नहीं।
अव्यवस्थाओं को नजरअंदाज कर हम केवल शिक्षक और विद्यालयों पर दोषारोपण करके अपना आवेश तो शान्त कर सकते हैं, लेकिन उन प्रश्नों का निराकरण नहीं कर सकते जो आज शिक्षा-जगत में हमारी व्यवस्थाओं के सामने आँखें तरेर कर खड़े हैं।
विद्यालयों में घटती संख्या का आज भी हमारे पास कोई उत्तर नहीं । महाविद्यालयों में बीच में छोड़ने वाले (ड्रॉप-आउट) छात्र-छात्राओं की बढ़ती संख्या का आज भी हमारे पास कोई उत्तर नहीं । सरकार के धन और मानवीय संसाधन नियमित संस्थानों पर खर्च हो रहे हैं लेकिन छात्र नियमित संस्थानों को छोड़कर ओपन एजूकेशन की ओर क्यों आकर्षित हैं ? इसका हमारे पास आज भी कोई उत्तर नहीं । और क्या कक्षाओं में घटती नियमित उपस्थिति के आधार पर शैक्षणिक संस्थाओं से बच्चों के उठते विश्वास का आज हमारे पास कोई उत्तर है?
जी नहीं! हम निरूत्तर हैं।
एक प्रश्न है जो प्रायशः सभी शिक्षकों से कभी न कभी किसी न किसी छात्र द्वारा जरूर पूछा गया होगा-
“सर क्या आज विद्यालय में पढ़ाई होगी?”
इसे भले ही एक सामान्य सा प्रश्न समझकर हमारे और आपके द्वारा चंद शब्दों में जवाब देने के बाद नजरअंदाज कर दिया गया होगा । किन्तु यह एक सामान्य सा प्रश्न नहीं, बल्कि शैक्षणिक जगत में परिवर्तन की आवश्यकता का एक बहुत बड़ा संकेत है । छात्र के मन में उत्पन्न इस शंका के जन्म के साथ ही यह संकेत मिलता है कि हमारे शिक्षण संस्थान और हमारी शिक्षण व्यवस्था अपने मूल स्वरूप से परिवर्तित हो चुकी हैं। यह प्रश्न छात्र की एक शंका मात्र नहीं, अपितु विद्यालयों के विद्यालय होने पर और शिक्षकों के शिक्षक रहने पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर देता है।
एक आदर्श विद्यालय और व्यवस्था वही है जहाँ इस प्रकार के प्रश्न के जन्म की कोई संभावना ही न हो। जिसमें बच्चे का यह विश्वास मजबूती से बना रहे कि यदि विद्यालय है तो शिक्षण होगा ही होगा। लेकिन छात्रों के मन में इस प्रश्न के उत्पन्न होने के साथ ही शिक्षक, विद्यालय और व्यवस्था हम सब अपने-अपने कारणों से आज इसमें असफल हैं। जिन शिक्षकों से आज तक यह प्रश्न नहीं पूछा गया और जहाँ उपस्थिति शत प्रतिशत बनी रहती है, वे सौभाग्य से स्वयं को आलेख की इस पीड़ा से बाहर मान सकते हैं।
प्रवेश और उपस्थिति की घटती संख्या तथा बीच में विद्यालय छोड़ने वालों की बढ़ती संख्या स्पष्ट प्रमाण है कि आज विद्यालयों और नियमित कक्षाओं के प्रति छात्रों में तीन अलग-अलग स्तर पर अरुचि अथवा असंतोष दिखाई दे रहा है । ये तीन स्तर हैं सर्वप्रथम छात्रों का प्रवेश कम लेना, दूसरा कम प्रवेश लेने वाले छात्र-छात्राओं में से भी बहुत सारे छात्रों का बीच में छोड़ कर चले जाना, और तीसरा ये कि यदि कदाचित् छोड़ कर ना भी गये तो कक्षाओं में नियमित रूप से उपस्थित न होना। इस प्रकार आज छात्र-छात्राओं से गुलजार रहने वाले महाविद्यालय भी बच्चों के कोलाहल को तरस रहे हैं।
आखिर इन सबके पीछे कारण क्या हैं?
क्या हमने कभी संस्थानों और शिक्षकों से इस विषय में उनका मत भी जानना चाहा?
क्या इन सभी बिन्दुओं पर एक पूर्णनिष्ठ विमर्श नहीं किया जाना चाहिए?
आज अलग-अलग स्तर पर भले ही इन तीनों समस्याओं की सैद्धान्तिक व्याख्या अलग-अलग की जाती हो किन्तु व्यावहारिक व्याख्या केवल और केवल एक है, वो है छात्रों का शैक्षणिक तथा व्यवस्थागत असंतोष।
इन सब समस्याओं के सामान्य कारण और भी कई हो सकते हैं, किन्तु छात्रों की मनोदशा के अनुसार मुख्य कारणों में पहला कारण आय दिन विद्यालय में होने वाले आयोजन हैं तो दूसरा ऑनलाईन के नाम पर आने वाली समर्थ इत्यादि की वो तमाम जटिलतायें जिन्होंनें छात्रों को ही नहीं बल्कि विद्यालयों को भी भ्रमित किया हुआ है । इन सबके कारण अधिकांश नेटवर्क अथवा मोबाईल रहित घर-गाँव वाले छात्र-छात्राओं को बहुत सारा पैसा और समय कंप्यूटर वालों के पास बर्बाद करना पड़ रहा है । परिणाम यह कि इन सब शर्तों के साथ जो बच्चे खुद को स्थापित कर पा रहे हैं वे विद्यालय में टिक रहे हैं और बाकी या तो ओपन की ओर चले जा रहे हैं या फिर बीच में ही छोड़कर चले जा रहे हैं।
इसी प्रकार विद्यालयों में छात्रों की कम उपस्थिति का एक सामान्य कारण भले ही छात्रों की अनिच्छा को मान लिया जाये, किन्तु मुख्य कारण जो समझ में आता है वो ये कि पहाड़ों में अधिकांश परिवार ऐसे हैं जिनकी मासिक आय अधिकतम मात्र 10,000 अथवा इससे भी कम है । इस प्रकार के परिवार का बच्चा यदि 100 रु0 एकतरफा किराया खर्च करके विद्यालय आता है और दिन भर कार्यक्रम में बिताने के बाद यदि घर जाकर महसूस करता है कि आज विद्यालय में पढ़ाई तो हुई ही नहीं, तो अगले दिन उसका विद्यालय आना कठिन हो जाता है, जो कि स्वाभाविक ही है।
क्यों कि प्रश्न केवल 100 रु0 का भी तो नहीं। पर्वतीय विद्यालयों में उसके आने-जाने, गाड़ी मिलने और न मिलने की फिक्र, और फिर मिल भी जाये तो आते-जाते दो-दो बार घंटों गाड़ी की प्रतीक्षा, आखिर इन सब में लगे समय और श्रम का भी तो कुछ हासिल हो। घर में माता-पिता का हाथ न बँटा पाने का जो नुकसान होगा, सो अलग।
अनावश्यक आयोजनों और शिक्षणेतर अप्रासंगिक गतिविधियों को बढ़ावा देकर और कार्यालयीय कार्यों में शिक्षकों को उलझाकर हम केवल शिक्षक पर अन्याय नहीं कर रहे, बल्कि उसके छात्रों का शिक्षण बाधित करके उनसे उनके पढ़ने के अधिकार भी छीन रहे हैं । जिन शिक्षण संस्थाओं का एक मात्र उद्देश्य पढ़ना और पढ़ाना था उनको हमने कार्यालयों में परिवर्तित कर दिया है और शिक्षकों को कर्मचारियों में। इसलिए आज न छात्र विद्यालय से जुड़ पा रहे हैं और न विद्यालय एजूकेशनल हब के तौर पर विकसित हो पा रहे हैं। क्यों कि छात्र शिक्षक पर निर्भर हैं, शिक्षक विद्यालय पर और विद्यालय आदेशों पर, बस यही नियम है। और हमारी जड़ता कि इसके बाद भी हम कारण ढूँढ रहे हैं कि डिग्री हासिल करने के बाद भी बच्चों को कोचिंग क्यों लेनी पड़ रही है? स्कूलों के बच्चे प्राईवेट में और महाविद्यालयों के छात्र ओपन में क्यों जा रहे हैं ?
क्या ऊपर कहे गये तमाम जंजालों में दिनभर डूबने-उभरने के बाद उस शिक्षक के पास छात्र पर खर्च करने के लिए वो ऊर्जा, समय और एकाग्रता भला कहीं बचती होगी? कदापि नहीं!
आज एक शिक्षक के लिए सबसे बड़ी चुनौती शिक्षण के लिए समय निकालना है। वर्तमान में शिक्षण को छोड़कर ऑनलाईन मीटिंग, कार्यालय की शीर्षवरीयता वाली डाकों का प्रत्युत्तर, अनेकों प्रभारों तथा समितियों की उत्तरदायिता, शिक्षणेतर विविध कार्यक्रमों के आयोजन इत्यादि अकथित अन्य तमाम कार्य शिक्षक के मुख्य कार्य बन चुके हैं । जब कि उसकी मुख्य जवाबदेही उन छात्रों के प्रति है जिनके लिए उसे नियुक्त किया गया है । उसकी नियुक्ति कार्यालय के कार्यों के लिए नहीं की गयी थी । लेकिन फिर भी उसे उसके मुख्य कार्य (शिक्षण) से हटाकर शिक्षणेतर कार्यों में सीमातिरेक रूप से लगा दिया जाता है। उसकी यह पीड़ा आम व्यक्ति की नजर से परे है कि कक्षा बाधित होने पर अब वह उन छात्रों को क्या बताये और कैसे समझाये?
वह बाद में जाकर उनसे क्या कहे? कि आज वो कक्षा में क्यों नहीं आ पाया? और यदि पहले बताये तो क्या बताये? कि बेटा! आज मेरे वादन में फलाँ कार्यक्रम होगा या फलाँ पत्र का दोपहर 2:00 बजे तक जवाब जाना है इसलिए कक्षा का हो पाना संभव नहीं!
छात्रों की इस जवाबदेही पर उसको अकेले ही संघर्ष करना होगा। वह नहीं करेगा तो और कौन करेगा?
इस प्रकार ये सारी विवशतायें पल-पल एक शिक्षक की हत्या कर रही हैं और आगे चलकर बड़े छात्रों वाले शिक्षण संस्थानों में यही विवशतायें शिक्षक और छात्रों के बीच संघर्ष का कारण बनती हैं ,जिसका दोषारोपण जाता है शिक्षक पर । जब कि सत्य ये है कि प्रशासनिक स्तर से एक शिक्षक की अलग-अलग दिशाओं में जवाबदेही स्वयं से तय कर, उसे दिन भर कार्यान्वित रखा जाता है, जिससे उसके पास शिक्षण के लिए समय और ऊर्जा चाहकर भी शेष नहीं बचती । इस तरह अलग-अलग दिशाओं की बहुपक्षीय जवाबदेही के कारण उसके लिए नौकरी किसी युद्ध और विद्यालय किसी रणभूमि से कम नहीं रह जाता।
अतः अंत में केवल इतना कि आज शिक्षकों को पुनः उनके शैक्षिक जगत में स्वतंत्र छोड़ने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। शिक्षकों के सेवागत जीवन पर अनुशासन हेतु प्रशासनिक नियंत्रण को नकारा नहीं जा सकता । किन्तु उनका समय, ऊर्जा, उपार्जित ज्ञान और उनके शैक्षणिक प्रयास केवल और केवल उनके छात्रों के विकास के लिए छोड़ दिये जाने चाहिए। दुर्भाग्य है कि एक शिक्षक जिसकी शतप्रतिशत नियुक्ति शिक्षण के लिए हुई थी अर्थात् जो शत-प्रतिशत छात्रों का था वह शिक्षक छात्रों के हिस्से मात्र 40 प्रतिशत भी पूरा नहीं आ पाता। इसलिए एक शिक्षक पर शिक्षणेतर कार्यों की अधिकतम मात्रा कितनी हो ? इसकी सीमा का तय किया जाना बहुत अनिवार्य हो चुका है। इसलिए नहीं कि उसे आराम दिया जा सके, बल्कि इसलिए ताकि उसका समय और ऊर्जा छात्रों के शिक्षण के लिए बचायी जा सके। हमें समझना होगा कि उस पर विद्यालय से पहला अधिकार उसके छात्रों का है, लेकिन हम छात्रों की परवाह किये बिना ही उसे एक ब्रह्मास्त्र की तरह मुख्य कार्य से हटाकर हर जगह, हर कार्य में प्रयोग कर रहे हैं।
आलेख का उद्देश्य किसी व्यक्ति या व्यवस्था को हाशिए पर लेना नहीं बल्कि अपने राजनैतिक नेतृत्व, अधिकारियों, तथा अन्य बुद्धिजीवियों से भरे इस निर्णायक समाज का ध्यान उस बड़ी पीड़ा की ओर आकर्षित करना है जो शिक्षा जगत की सबसे बड़ी और जटिल समस्या के रूप में उभरती जा रही है। हमने छात्रों और उनके शिक्षकों के बीच में शिक्षणेतर कार्यों की एक ऐसी खाई तैयार कर दी है कि जो आने वाले समय में शिक्षा, शिक्षक, छात्र और विद्यालय इन सबके अस्तित्व को खतरे में ले आयेगी । छात्र-छात्राओं से उनके शिक्षक छीन कर हमने उनकी नियमित शिक्षा को ओपन के समान ही नहीं किया, बल्कि उससे भी बेकार बना दिया है। क्योंकि ओपन के विद्यार्थियों के पास भले ही शिक्षक न हों किन्तु बिना वजह विद्यालय आकर समय बर्बाद करने की अनिवार्यता भी तो नहीं है। जब कि नियमित विद्यार्थियों के पास एक तो अन्य कार्य पर योजित होने से शिक्षक नहीं हैं और दूसरा विद्यालय आने की अनिवार्यता अलग।
इसलिए आज हमें दूरदर्शिता के साथ बच्चों के हितों को देखना और समझना होगा। क्यों कि शिक्षा के लिए बनायी गयी हमारी सारी योजनायें तब तक सफल नहीं होंगी और निर्धारित किये गये सारे उद्देश्य तब तक प्राप्त नहीं किये जा सकेंगे जब तक कि हम अपने बच्चों को उनके हिस्से के खोये हुए मार्गदर्शक ( शिक्षक ) और विद्यालय नहीं लौटा देते । इसलिए अपनी आने वाली पीढ़ियों तथा उनके भविष्य के लिए हमें छात्रों के हिस्से के शिक्षकों की ऊर्जा, समय और श्रम का अधिकांश भाग केवल और केवल शिक्षण के लिए ही छोड़ना होगा, ताकि छात्रों के शैक्षणिक स्तर को अधिक उन्नत बनाने के लिए शिक्षक के अंदर के शिक्षक को और विद्यालय के शिक्षण को, दोनों को बचाया जा सके।
✍️डॉ. एम. एन. नौड़ियाल ‘मनन’
(कवि, लेखक, गीतकार एवं साहित्यकार)
✍️ शिक्षक दिवस पर देशभर में श्रद्धा और सम्मान की औपचारिकताएँ निभाई जाती हैं, लेकिन एक बड़ा सवाल हमेशा अनुत्तरित रह जाता है—क्या हम अपने शिक्षकों को उनकी असली भूमिका निभाने की स्वतंत्रता और गरिमा दे पा रहे हैं? विद्यालयों का हाल यह है कि शिक्षक कक्षा में पढ़ाने से ज्यादा वक्त प्रशासनिक कार्यों, जनगणना, सर्वेक्षण और विभिन्न सरकारी योजनाओं के अमल में खपाते हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है और छात्र अपने भविष्य के लिए वही हासिल नहीं कर पाते जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा ज़रूरत है—ज्ञान और संस्कार।
डॉ. एम.एन. नौड़ियाल ‘मनन’ का यह विश्लेषण बताता है कि आज शिक्षा व्यवस्था एक गंभीर मोड़ पर खड़ी है। यदि शिक्षक को बोझिल व्यवस्थागत कार्यों से मुक्त कर केवल उसके वास्तविक दायित्व—शिक्षण और छात्र निर्माण—पर केंद्रित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियाँ अधूरी शिक्षा और कमजोर आधार के साथ समाज में उतरेंगी।
शिक्षक दिवस पर हमें सिर्फ पुष्पांजलि या औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहना, बल्कि शिक्षा की जड़ों को मजबूत करने और शिक्षक को उसकी मूल भूमिका लौटाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा। यही सही मायनों में गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
*Kedar Singh Chauhan ‘Pravar’ Editor
⚖️ Disclaimer (अस्वीकरण):
यह आलेख लेखक डॉ. एम.एन. नौड़ियाल “मनन” के व्यक्तिगत विचारों, अनुभवों और विश्लेषण पर आधारित है। इसमें व्यक्त मत किसी संस्था, विभाग या संगठन की आधिकारिक राय का प्रतिनिधित्व नहीं करते। आलेख का उद्देश्य केवल शिक्षा व्यवस्था, शिक्षक और छात्र-हित से जुड़े मुद्दों पर रचनात्मक विमर्श को प्रोत्साहित करना है।
