विश्व पर्यावरण दिवस 2026: जल संरक्षण के लिए जल स्रोतों की सुरक्षा और संवर्धन समय की सबसे बड़ी आवश्यकता
“जल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि का साझा अधिकार है”
टिहरी गढ़वाल, 05 जून 2026। रिपोर्ट: ज्योतिषाचार्य हर्षमणि बहुगुणा
विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधरोपण और पर्यावरणीय चिंतन का अवसर नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन के सबसे महत्वपूर्ण तत्व — जल — के संरक्षण का संकल्प लेने की प्रेरणा भी देता है। जल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत के अस्तित्व का आधार है। इसलिए जल स्रोतों की देखरेख, सुरक्षा एवं संवर्धन आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है।
भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में जल को सदैव जीवन, पुण्य और लोककल्याण का प्रतीक माना गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही जल के महत्व को समझते हुए इसे जीवन का मूल आधार बताया था। तैत्तिरीयोपनिषद् में कहा गया है—
“आपो वा अन्नम्। ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः।”
अर्थात् जल ही अन्न है और जीवन ऊर्जा का आधार है। जल और प्रकाश दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं तथा सृष्टि के संचालन का मूल तत्व हैं।
लोकजीवन में भी जल का महत्व सदैव सर्वोच्च माना गया है। इसी भावना को लोककवि ने इन शब्दों में व्यक्त किया—
“भूखे को दाना, प्यासे को पानी।
जिसने दिया, वह है महादानी।”
यह केवल एक लोकोक्ति नहीं, बल्कि भारतीय समाज की संवेदनशीलता और परोपकार की संस्कृति का परिचायक है।
महान कवि रहीमदास ने भी जल के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा था—
“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानस, चून।।”
वास्तव में अन्न का विकल्प फल, कंद या अन्य खाद्य पदार्थ हो सकते हैं, किंतु जल का कोई विकल्प नहीं है। यदि जल समाप्त हो जाए तो जीवन की समस्त संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं।
आज देश में घर-घर पेयजल पहुंचाने के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं। इसके बावजूद जल संरक्षण के प्रति सामाजिक चेतना का अभाव चिंताजनक है। अनेक स्थानों पर जल स्रोतों का अतिक्रमण, प्रदूषण और उपेक्षा लगातार बढ़ रही है। यदि समय रहते इन स्रोतों की रक्षा नहीं की गई तो भविष्य में जल संकट और भी विकराल रूप धारण कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में विश्व के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती जल की उपलब्धता होगी। यही कारण है कि जल संरक्षण अब केवल पर्यावरणीय विषय नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न बन चुका है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जल किसी व्यक्ति, समुदाय या क्षेत्र की निजी संपत्ति नहीं है। इस पर प्रत्येक जीव का समान अधिकार है। इसलिए जल का उपयोग संयमपूर्वक करना, जल स्रोतों की रक्षा करना तथा वर्षा जल संचयन जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना हम सभी का नैतिक दायित्व है।
यदि कोई दान सबसे श्रेष्ठ माना जा सकता है, तो वह जलदान है। प्यासे को पानी पिलाना मानवता की सर्वोच्च सेवा है। समाज में बढ़ती स्वार्थपरता और संवेदनहीनता के बीच हमें अपनी उस सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करना होगा, जिसमें प्याऊ लगाना, जल स्रोतों की रक्षा करना और जल को साझा धरोहर मानना पुण्य का कार्य समझा जाता था।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आवश्यकता इस बात की है कि समाज के जिम्मेदार नागरिक, जनप्रतिनिधि, जल निगम, जल संस्थान, स्वजल परियोजना तथा अन्य संबंधित संस्थाएं जल संरक्षण के लिए जनभागीदारी आधारित अभियान चलाएं। साथ ही प्रत्येक नागरिक जल बचाने और जल स्रोतों की सुरक्षा का संकल्प ले।
क्योंकि—
“जल है तो कल है,
जल बचेगा तो जीवन बचेगा।”
आज आवश्यकता केवल चिंतन की नहीं, बल्कि सामूहिक संकल्प और ठोस कार्रवाई की है। जल संरक्षण ही भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी और सबसे बड़ा उपहार होगा।
