सौर ज्येष्ठ और अधिक ज्येष्ठ मास का वैज्ञानिक एवं धार्मिक महत्व
भारतीय पंचांग की अद्भुत गणना पद्धति समझाती है समय, ग्रहों और ऋतुओं का संतुलन
विशेष लेख | सरहद का साक्षी, डिजिटल मीडिया, प्रस्तुतिः ज्योतिषाचार्य श्री हर्षमणि बहुगुणा
भारतीय सनातन संस्कृति और धर्मशास्त्र केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि गहन वैज्ञानिक एवं खगोलीय ज्ञान का भी अद्भुत उदाहरण हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्रों और सौरमंडल की गतियों का सूक्ष्म अध्ययन कर ऐसी कालगणना प्रणाली विकसित की, जो आज भी आश्चर्यचकित करती है।
भारतीय पंचांग में समय की गणना अत्यंत व्यवस्थित रूप से की गई है। सात दिनों का सप्ताह, पंद्रह दिनों का पक्ष, दो पक्षों का एक मास और बारह मासों का एक वर्ष निर्धारित किया गया है। चन्द्रमा की कलाओं की वृद्धि को शुक्ल पक्ष तथा ह्रास को कृष्ण पक्ष कहा जाता है।
भारतीय ज्योतिष और पंचांग प्रणाली में नौ प्रकार के मासों का उल्लेख मिलता है, जिनमें मुख्य रूप से चार प्रकार के मास प्रचलित हैं —
- सौर मास
- चान्द्र मास
- नाक्षत्र मास
- सावन मास
सौर वर्ष और चान्द्र वर्ष में अंतर
सौर वर्ष लगभग 365 दिन 6 घंटे 9 मिनट और कुछ सेकंड का माना जाता है, जबकि चान्द्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है। इस प्रकार दोनों में लगभग साढ़े 11 दिनों का अंतर आ जाता है।
इसी अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग 32 माह बाद एक अतिरिक्त चान्द्र मास जोड़ा जाता है, जिसे “अधिक मास” कहा जाता है। इसे पुरुषोत्तम मास या मलिन मास के नाम से भी जाना जाता है। सामान्यतः प्रत्येक तीसरे वर्ष अधिक मास आता है।
इस वर्ष ज्येष्ठ में अधिक मास का संयोग
वर्तमान वर्ष में ज्येष्ठ मास में अधिक मास का विशेष संयोग बना है। इस कारण चान्द्र ज्येष्ठ दो माह का रहेगा, जबकि सौर ज्येष्ठ सामान्य अवधि का ही होगा।
- चान्द्र ज्येष्ठ : 1 मई से 30 जून तक
- सौर ज्येष्ठ : 17 मई से 15 जून तक
- 16 जून से आषाढ़ मास प्रारंभ होगा
इसी कारण कई लोगों के मन में भ्रम की स्थिति बन रही है कि ज्येष्ठ मास अभी प्रारंभ नहीं हुआ, जबकि सोशल मीडिया और विभिन्न माध्यमों पर ज्येष्ठ मास की चर्चा हो रही है। वास्तव में यह अंतर सौर और चान्द्र गणना के कारण उत्पन्न होता है।
भारतीय पंचांग की वैज्ञानिक विशेषता
भारतीय कालगणना प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अधिक मास जोड़ने के कारण हमारे पर्व और त्योहार ऋतु चक्र के अनुसार लगभग स्थिर बने रहते हैं। यदि यह व्यवस्था न होती, तो त्योहार हर वर्ष लगभग 11 दिन पीछे खिसकते रहते, जैसा कि इस्लामिक कैलेंडर आधारित पर्वों में देखने को मिलता है।
यही कारण है कि दीपावली, होली, नवरात्र और अन्य पर्व सदैव अपनी निर्धारित ऋतु और मौसम के आसपास ही आते हैं। यह भारतीय मनीषियों की अद्भुत वैज्ञानिक सोच और खगोलीय ज्ञान का प्रमाण है।
जनजागरूकता की आवश्यकता
आज के समय में सोशल मीडिया और अधूरी जानकारी के कारण कई बार भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसे में जागरूक लोगों का दायित्व है कि वे स्वयं सही जानकारी रखें और समाज को भी तथ्यपरक जानकारी उपलब्ध कराएं।
भारतीय पंचांग केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि विज्ञान, खगोल, ऋतुचक्र और सामाजिक व्यवस्था का अनुपम समन्वय है। वास्तव में यह भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा की अद्वितीय धरोहर है।
