प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा
सरहद का साक्षी
“हमारे गांव की महिमा का वर्णन बहुत कठिन है, परन्तु कतिपय विद्वत् विभूतियों को श्रृद्धांजलि दिए बिना मन को शांति नहीं मिलती है। यह एक प्रयास है, जिसमें गांव की अनुपम विभूतियां आने वाली पीढ़ी को उपकृत भी करेंगी व अपने पग चिन्हों पर अग्रसर होने की प्ररेणा भी प्रदान कर अपना आशीर्वाद आने वाली पीढ़ी पर बना कर रखेंगे।
इस श्रृंखला में ज्योतिष के सागर गांव के सयाना (सयाणा) प्रात: स्मरणीय पूज्य स्व० श्री तारा नन्द बहुगुणा (तारा दत्त) सुपुत्र स्व० श्री किशन दत्त बहुगुणा जिनका जन्म १९ जुलाई १८९९ को सावली के विद्वत् परिवार में हुआ था।
घर पर नि:स्वार्थ, नि:शुल्क ज्योतिष की पाठशाला लगाकर अपने गांव के ही नहीं पास पड़ोस के ग्रामीण जिज्ञासु युवाओं को सुशिक्षा प्रदान करते रहते थे। अटूट श्रद्धा थी अपने गांव के प्रति। इन गुरु गौरव मनीषी के दो पुत्र एक पुत्री जिन्हें सुशिक्षित कर शिक्षण कार्य में रत किया। पुत्री का विवाह हुआ किया वह पराया धन होती हैं।
चन्दा एकत्रित कर तैयार करवाया पंचायत भवन
गांव के प्रधान पद पर भी कार्य किया व पंचायत भवन को चन्दा एकत्रित कर तैयार करवाया। (जैसा मुझे ज्ञात हुआ) ऐसे महापुरुष को दुर्भाग्य बस (पांच) ५ दिसंबर १९७३ को अपना कनीयस (छोटापुत्र) आत्मज श्री हरिवंश बहुगुणा जो २४ जुलाई १९३२ को इस धरा पर अवतरित हुए थे, को अकाल कवलित देखा तो अत्यधिक आहत हुए और ७६ वर्ष की सामान्य आयु में २० मार्च १९७५ को गांव का यह ज्योतिषी इस भौतिक तन को छोड़ दूसरे लोक को आल्हादित करने के लिए परमपिता परमेश्वर की गोद में समा गया।
पिता और उनके दोनों पुत्रों का जन्म का माह श्रावण ही रहा
इनके दूसरे सुपुत्र स्व० श्री रामेश्वरानंद जो २८ जुलाई १९२८ को जन्मे वे भी कष्ट मय जीवन यापन कर (पुत्र शोक के कारण) सन् २००४ में संन्यास लेकर मानव चेतना केन्द्र आश्रम ऋषिकेश में जन जाग्रति कर फरवरी २०१८ में इस लोक को छोड़ कर वैकुण्ठ वासी हुए। क्या अद्भुत संयोग था कि पिता और उनके दोनों पुत्रों का जन्म का माह श्रावण ही रहा।”
हम आपको मात्र याद ही कर सकते हैं और विनम्रतापूर्वक श्रृद्धांजली ही दे सकते हैं। ख्याति प्राप्त यह गांव अपने गौरवशाली अतीत के अनुरूप आगे बढ़े यह अभिलाषा भी रखते हैं।”
“शायद कलियुग के दुष्प्रभाव के कारण तुला राशि के इस मनीषी को यह कठिनाई झेलनी पड़ी, यह सब वे जानते भी थे। मेरा दुर्भाग्य भी रहा कि उनका सान्निध्य प्राप्त नहीं हो सका। किमधिकम्”।
