प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा, सरहद का साक्षी
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।
“भगवान श्री कृष्ण ने गीता में आत्मा को अजर-अमर कहा है, है भी तो? अजर अमर, केवल काया परिवर्तन है आत्मा का। इस सुग्राम में इस तरह के अनेकों मनीषियों, विभूतियों का आगमन हुआ जिन्होंने अपने कर्म व योग के द्वारा गांव के कर्ण धारों के भविष्य को सुदृढ़ बनाने के लिए एक मजबूत बुनियाद रखी।
हम इतने में ही अपने को धन्य महसूस करते हैं कि हम उन विभूतियों के वंशज हैं! जिनके परिश्रम का फल हमें उपलब्ध हो रहा है। ऐसी ही एक विभूति ने इस गांव को पं० श्री शंकर दत्त बहुगुणा जी के यहां सन् १९११ में अवतरित हो कर पवित्र किया। आपके चाचा श्री शालिग्राम जी के पं० श्री किशोरी लाल बहुगुणा व श्री कुन्दन लाल बहुगुणा जी के रुप में दो सुपुत्र हुए।
आप को सत्य कृष्ण बहुगुणा नाम देकर आपके पिता श्री ने अलंकृत किया, आप ज्योतिष के प्रकाण्ड पण्डित व निष्काम कर्मयोगी के साथ-साथ ग्राम वासियों के अनन्य सहयोगी रहे। देर थी तो केवल इच्छा की, प्रतीत होता था कि- जैसे फल सम्मुख रखा रहता हो। (आपके घर पर आपके त्याग के परिचायक श्री चेतन लाल बहुगुणा जी ने २९ मई १९४६ को जन्म लेकर आपके परिवार की शोभा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया व बासठ वर्ष समाज की सेवा कर (शिक्षक के रूप में) १५ जुलाई २००८ को इस नश्वर शरीर को छोड़ कर अन्तिम स्वास ली।)
आपका आकर्षक व्यक्तित्व समाज की सेवा करते हुए शरद पूर्णिमा १७ अक्टूबर सन् १९८६ को सरलता के साथ अपना भरा पूरा परिवार छोड़ कर इस गांव को भी छोड़ कर अन्तिम प्रयाण किया।
इस महान कर्म योगी को कोटि-कोटि नमन के साथ अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए स्वयं को भी गौरवान्वित महसूस करता हूं कि ज्योतिष जैसे गूढ़ विषय की वर्णमाला का ज्ञान आपसे प्राप्त करने की अपनी पिपासा को शांत करने की कोशिश कर ने की चेष्टा कुछ सीमा तक पूरी की। ऐसी गुरु मूर्त्ति को हार्दिक श्रृद्धांजलि वह भी इसके अतिरिक्त यह अकिंचन क्या दे सकता है, पर इतना तो अवश्य कह सकता हूं कि –
भवानी शंकरौबन्दे श्रद्धाविश्वास रूपिणौ।
याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्त: स्वमीश्वरम्।।
“आपके पद चिन्हों पर अग्रसर हो सकें, यह प्रार्थना करते हैं। आप जैसी विभूतियों को विद्वान् ग्राम वासियों के साथ कोटि-कोटि नमन व भावभीनी श्रृद्धांजलि समर्पित सबको मार्ग दर्शन की अभिलाषा।
ॐ शान्ति, ॐ शान्ति, ॐ शान्ति!
