श्री देव सुमन राजकीय अटल आदर्श उत्कृष्ट इंटर कालेज चंबा परिसर में स्थित, खंड उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय तथा प्राथमिक विद्यालय तल्ला चंबा की बाउंड्री वाल का एक हिस्सा कल भरभरा कर नीचे गिर गया। स्वच्छता अभियान के तहत, स्वच्छक भाई बहिनें उस समय झाड़ियों का कटान कर रही थी। गनीमत रही कि ईंटें उनके सिर के ऊपर नहीं गिरी वरना चोट लग सकती थी।
[su_highlight background=”#091688″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी @कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_highlight]
प्राथमिक विद्यालय के बच्चे नादान होते हैं और अक्सर खूब उछल कूद भी करते रहते हैं। गनीमत इस बात की भी है कि बच्चे उस समय रेलिंग के आसपास खेलकूद नहीं रहे थे वरना कोई और दुर्घटना भी हो सकती थी। इस प्रकार की घटनाएं अक्सर होती रहती हैं लेकिन प्रश्न यह है कि आजाद भारत में कार्यों की गुणवत्ता कितनी पुख्ता होती है ? इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है। अंग्रेजों के जमाने के निर्माण कार्य आज भी चिरस्थाई हैं। यहां तक की कोई कील भी उन पर नहीं ठोक सकता है। चाहे देहरादून में को पानी पिलाने वाली हमारी स्थानीय नदी सॉन्ग की घाटी से निर्मित रायपुर नहर हो या जाखंण नहर हो, या कीर्ति नगर का झूला पुल। यह केवल उदाहरण मात्र है।
ठेकेदारी प्रथा के कारण कार्यों की गुणवत्ता की अपेक्षा करना भूल है।
[irp]कहने के लिए तो हम विकसित राष्ट्रों की श्रेणी मे बढ़ रहे हैं लेकिन हमारे निर्माण कार्य अनियोजित, कमाऊ और धंधे पर आधारित हैं। ठेकेदारी प्रथा के कारण कार्यों की गुणवत्ता की अपेक्षा करना भूल है। आजाद भारत में आज भी अंग्रेजों के पैटर्न पर बने हुए अनेकों विभाग हैं और उनके निर्माण कार्य आज भी गतिमान हैं चाहे पीडब्ल्यूडी हो या कंस्ट्रक्शन कंपनियां लेकिन गुणवत्ता की दृष्टि से इनकी कार्यप्रणाली किसी से छुपा नहीं है। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री रोजगार योजना, महात्मा गांधी रोजगार योजना, सुनिश्चित रोजगार गारंटी योजना आदि के कार्य गतिशील हैं उनकी गुणवत्ता भी किसी से छुपी हुई नहीं है। हां ! कुछ आंशिक क्षेत्र अपवाद हैं। जहां जागरूकता बढ़ी है। वहां कुछ बेहतर कार्य अवश्य हुआ है लेकिन उन कार्यों का अनुकरण करने वाले कम लोग हैं। इसी कड़ी में ऋषिकेश- गंगोत्री ऑल वेदर रोड के कार्य पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े हो जाते हैं।
चालीस बयालीस प्रतिशत बजट कमीशन में ही चला जाता है!
आजादी के बाद कुछ वर्षों तक, कुछ गुणवत्ता पूर्ण कार्य हुए, लेकिन कालांतर में गुणवत्ता बढने के वजाय घट गई। लोक निर्माण विभाग या कोई और निर्माण कार्य दात्री संस्थाएं, सुनने में आया है कि चालीस बयालीस प्रतिशत बजट कमीशन में ही चला जाता है! उसके बाद कुछ मुनाफे के रूप में ठेकेदार के हिस्से भी जाता है।
[irp]मजदूर वर्ग जान पर खेलकर इन कार्यों में अपनी भूमिका अदा करते हैं। उनको कितना मिलता है, कितनी प्राप्ति होती है? यह भी किसी से छुपा नहीं है क्योंकि मजदूरों की दशा और दिशा आज भी पूर्ववत बनी है जबकि निर्माणदात्री विभागों के अधिकारी/ कर्मचारी और ठेकेदार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
कार्य छोटा हो या बड़ा, गुणवत्तापूर्ण होना चाहिए!
[irp]हमारे स्वच्छक भाई भी जमीनी स्तर पर कार्य करते हैं। उनके भी परिवार हैं। उनको भी स्वास्थ्य, शिक्षा तथा आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करनी पड़ती है। इसलिए उनका सम्मान, उनके कार्य का सम्मान किया जाना भी लाजमी है। इसलिए अपेक्षा की जाती है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, गुणवत्तापूर्ण होना चाहिए! क्योंकि यह प्राकृतिक प्रकोप या कुदरती हादसे नहीं है बल्कि मानवीय करतूतों के परिणाम होते हैं। जिसका खामियाजा सब को भुगतना पड़ता है।
*स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर, नगर पालिका परिषद चंबा, टिहरी गढ़वाल।
