एक सेवानिवृत्त पुलिस कमिश्नर की कहानी जो बताती है कि जीवन में सबसे बड़ी पहचान मानवता है, न कि पद और प्रतिष्ठा।
By: केदार सिंह चौहान ‘प्रवर’ | स्रोत: WhatsApp Wall (शैक्षिक उद्देश्य हेतु)
जब तक बल्ब जलता है, तब तक उसका मूल्य है… फ्यूज़ हो जाए तो सब बराबर
एक रिटायर्ड पुलिस कमिश्नर, जो पहले अपने सरकारी बंगले में रहते थे, अब कॉलोनी में अपने खुद के घर में रहने आ गए। उन्हें अपने बारे में बहुत गर्व था। हर शाम वे कॉलोनी के पार्क में टहलने जाते, लेकिन वहाँ आने-जाने वाले किसी से बात नहीं करते, उनकी ओर देखते भी नहीं। उन्हें लगता था – “ये लोग मेरी लेवल के नहीं हैं।”
एक दिन वे एक बेंच पर बैठे थे, तभी एक बुजुर्ग वहाँ आकर उनके पास बैठ गया और सहजता से बातचीत शुरू कर दी। लेकिन कमिश्नर साहब ने उसकी बातों पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया। वे बस अपने बारे में ही बताते रहे – “मैं क्या पद पर था, मेरी क्या प्रतिष्ठा थी, मैं कितना बड़ा आदमी हूँ…”
उन्होंने कहा – “मैं यहाँ रहता हूँ क्योंकि ये मेरा अपना घर है!”
ऐसे कुछ दिन बीत गए। वो बुजुर्ग बस शांत होकर उनकी बातें सुनता रहा।
“मैंने आज तक किसी को नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य रहा हूँ…”
आख़िर एक दिन उस बुजुर्ग ने कहना शुरू किया –
“सुनिए कमिश्नर साहब, बिजली का बल्ब होता है ना – जब तक जलता है, तब तक उसका महत्व है। लेकिन एक बार फ्यूज़ हो गया, तो फिर चाहे वो १० वॉट का हो, २०, ४० या १०० – कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। दिखता तो बल्ब ही है, लेकिन अब रोशनी नहीं देता। मैं यहाँ पाँच साल से रह रहा हूँ। लेकिन मैंने आज तक किसी को नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य रह चुका हूँ।”
ये सुनकर कमिश्नर साहब का चेहरा बदल गया।
सभी फ्यूज़ बल्ब एक ही ग्रुप में आते हैं – चाहे LED हो या झूमर वाला
बुजुर्ग आगे बोले –
“आपके दाहिनी ओर जो वर्मा जी बैठे हैं, वे रेलवे में जनरल मैनेजर थे। सामने जो हँसते-बोलते रावसाहब हैं – वे आर्मी से लेफ्टिनेंट जनरल के पद से रिटायर हुए हैं। और कोने में जो सफ़ेद कपड़ों में शिवाजी जी बैठे हैं – वे ISRO के चेयरमैन थे। लेकिन उन्होंने भी कभी किसी को ये नहीं बताया। मेरा बस इतना कहना है – ये सारे लोग यहाँ हैं, बहुत ऊँचे पदों से आए हैं, लेकिन आज सब एक जैसे हैं। मुझे पहले ही बता देना चाहिए था – सारे फ्यूज़ हो चुके बल्ब एक ही ग्रुप में आते हैं। कोई भी बल्ब – ज़ीरो वॉट, १०, २०, ४०, ६०, १०० – जब तक जलता है, तब तक ही कीमती है। एक बार बंद हो गया, तो फिर चाहे वो LED हो, CFL, हॉलोजन या सजावटी – सब बराबर! हम सब यहाँ बैठे हैं – आपके सहित – फ्यूज़ हो चुके बल्ब हैं।”
जब पॉवर ही चला जाए, तो राजा और प्यादा एक बराबर
“पॉवर चला जाए, तो पुलिस कमिश्नर और कॉन्स्टेबल में कोई अंतर नहीं रह जाता। उगता सूरज और ढलता सूरज – दोनों ही सुंदर होते हैं। लेकिन लोग नमस्कार सिर्फ़ उगते सूरज को करते हैं। ढलते को कोई नहीं पूछता। इस सच्चाई को स्वीकार करना ही चाहिए। हम जिन पदों, प्रतिष्ठा, और सत्ता में जीते हैं – वह हमारी पहचान नहीं होती। वह सिर्फ़ कुछ समय के लिए होती है। और अगर हम उसे ही जीवन समझते हैं, तो याद रखना चाहिए – एक दिन सब कुछ समाप्त हो जाएगा।”
“शतरंज में राजा और प्यादा अंत में एक ही डिब्बे में जाते हैं”
“शतरंज में राजा, रानी, ऊँट, घोड़ा, प्यादा – सबका महत्व सिर्फ़ तब तक होता है जब तक खेल चल रहा होता है। एक बार खेल ख़त्म हुआ – सब एक ही डिब्बे में रख दिए जाते हैं। डिब्बा बंद!”
आज का दिन शांत है – इसका आनंद लीजिए, कल की चिंता न करें
“आज का दिन शांत है – इसका आनंद लीजिए, और प्रार्थना कीजिए कि कल भी शांति बनी रहे…”
“और आख़िर में… जीवन में चाहे जितने भी सर्टिफिकेट्स, मेडल्स, पुरस्कार मिल जाएँ – अंत में सभी को एक ही प्रमाणपत्र मिलता है… ‘मृत्यु प्रमाण पत्र’।”
मनुष्य बनिए… और मानवता के पक्षधर बनिए, न कि उसके हत्यारे
“अतः मानव होकर मानवता के पक्षधर बनिए — नाकि अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए मानवता से नीचे गिर कर मानवता के हत्यारे बनिए। अपनी शान, शौकत, यश, सम्मान, प्रतिष्ठा, धन, पद का अंहकार छोड़िए। सब को ज्ञात है कि आप यहां कैसे पहुँचे हैं। यदि आप मानव सेवा नहीं कर सकते तो अहित भी ना करें। दूसरों को गिराकर आप भले ही ऊपर उठ जाएं, लेकिन प्रकृति और ईश्वर सब जान रहे हैं — और फल प्राप्त अवश्य होगा!”
