सरहद का साक्षी,
@ कवि : सोमवारी लाल सकलानी निशांत,
ग्रहण का चांद कुछ ऐसा आया नभ में !
पूर्णमासी का चांद चमका जब अंबर में,
विधुत का प्रकाश भी धुंधलाया धरती में,
बेरूठा चांद जब पहुंचा नील – नलय में।
ग्रहण का चांद कुछ ऐसा आया नभ में।
तीर्थ व्रत पर भी ग्रहण लग गया – उपछाया,
कैसा अमृत पिया राहु केतु ने शीश कटाया!
देवताओं ने कलश भर भर कर अमृत पाया,
राक्षसों ने दो बूंद के लिए बलिदान कराया।
ग्रहण का चांद कुछ ऐसा आया नभ में।
धरती पर क्या सदा देव ही अमृत पियेंगे ?
यक्ष किन्नर गंदर्भ राक्षस सुरापान करेंगे !
महादेव ही देव अकेला जो विषपान करेंगे,
और देवता अमृतपान कर सदा अमर रहेंगे।
ग्रहण का चांद चमका कुछ ऐसा नभ में।
कोरोना के काल में धरती अम्बर में ग्रहण है।
बाहर नही निकालना भाई राहु केतु खड़ा है!
अमृतपान करने बालो को डर ग्रहण नहीं है,
कमजोर प्रतिरोधक तंत्र को राहु केतु भय है।
ग्रहण का चांद चमका कुछ ऐसा नभ में।

