श्रीदेव सुमन पर कविता
ShriDev Suman par Kavita
Poem on ShriDev Suman
उठो सुमन तुम आंखें खोलो…!
उठो सुमन तुम आंखें खोलो,
देखो, कौन जगाने आए हैं!
हे त्रिहरि के महा बलिदानी,
देखो! त्रिहरि से जननायक आए हैं।
नीरस पतझड़ बीत चुका है,नव पल्लव मुस्कान भरी।
भ्रमर राग मधु बयार संग, धरती माता हरीत हुई।
उठो! सुमन तुम आंखें खोलो,
देखो! कौन तुम्हें जगाने आए हैं।
उत्तरपथ व्योम क्षितिज से, भानु ताप भर लाया है।
घर बाग चमन आंगन में, अब हरियाली का आलम है।
उठो मित्र ! इस चिर समाधि से, निशांत पूर्व भर लाई है, सहस्त्र रश्मिया भर दिनकर, तुम्हें जगाने आए हैं।
उठो! सुमन तुम आंखे खोलो।
पावस ऋतु लौट गई वसुधा पर, सरिताओं में नाद भरा, जीव जंतु सब जाग गए हैं, हरित हिमालय अभिमान भरा।
स्वाधीन देश है, उठ जाग जरा! भर अमर राग अमृत यहां, तेरी प्यारी जन्मभूमि में, जन सैलाब है उमड़ पड़ा।
तुझे जगाने आज सहस्त्र जन, जगह-जगह से आए हैं।
अति आदर सम्मान प्रेम से, तुम्हें मनाने आए हैं।
काली रातें बीत चुकी है, खोल सुमन तू आंख जरा,
देख स्वतंत्र त्रिहरि भारत, विकास मार्ग का सूर्य उगा।
उठो! सुमन तुम आंखें खोलो।
उठा शीष पावन माटी से, पुन अमन की आश जगा।
मधुर महक मादकता भर, कोटि सुमन वन क्षेत्र सजा। पतझड़ का तू दर्द भुला दे, नवल क्रांति का बिगुल बजा,
स्वाधीन राष्ट्र की शुचि माटी का, माथे पर तू तिलक लगा।
उठो! सुमन तुम आंखें खोलो।
ऐ सुमन तुम आंखें खोलो, देखो! बन भ्रमर जन आए हैं,
अमर राग भर अलिसुत निशांत में, तुम्हें जगाने आए हैं।
हे प्राची के पारिजात! पश्चिम से गबर सिंह पुकार रहा। उत्तर दक्षिण से जियारानी माधो, अंबर से भानु निहार रहा।
रवि कवि मुनि जन सम्मुख तेरे, फिर तुम्हें मनाने आए हैं।
उठो सुमन तुम आंखें खोलो देखो ! कौन जगाने आए हैं।
कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत,
कवि कुटीर, सुमन कॉलोनी चंबा
