शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश: जिस दिन लक्ष्मी पूजन हो वही दिन दीपावली माना जाएगा — सोशल मीडिया के भ्रम के बीच संस्कृति की गहन समझ आवश्यक
टिहरी, 20 Oct. 2025 (सरहद का साक्षी) —
“ईश्वर कृपा से सदैव दीपावली होनी चाहिए; दीपावली खुशी का प्रतीक है।” — वयोवृद्ध ज्योतिषाचार्य श्री हर्षमणी बहुगुणा का यह भाव ही हमें त्योहार के पवित्र मायने की याद दिलाता है। परंतु प्रश्न उठता है — लक्ष्मी पूजन कब करना चाहिए? क्या यह केवल अमावस्या (नवरात्र/पक्ष-निर्भर) को ही सीमित है? बहुगुणा जी के स्पष्टीकरण के अनुसार शास्त्रों ने तिथ्य-निर्धारण के विषय में स्पष्ट नियम बताये हैं और समाज में व्याप्त कुछ भ्रांतियों का निवारण भी किया जा सकता है।
शास्त्रीय निर्देश और तिथ्य-विन्यास — संक्षेप में
ज्योतिष और पुराणों में तिथियों के संबंध में जो परम्पराएँ बतायी गयी हैं, वे केवल प्रथागत नियम नहीं, बल्कि खगोलीय और पंचांग- गणना पर आधारित विवेचना हैं। बहुगुणा जी के स्पष्ट शब्दों में — यदि दीपावली के अवसर पर अमावस्या दोनों दिनों पर प्रदोष काल तक बनी रहती हो (यानी तिथियों का बढ़ना-पढ़ना किसी विशेष स्थिति में हो), तो दूसरे दिन लक्ष्मी पूजन किया जाएगा। यदि किसी वर्ष में दोनों दिनों में प्रदोष-व्यापिनी अमावस्या नहीं है तो अगले (पहले) दिन लक्ष्मी पूजन होगा। शास्त्र का निर्णय तिथ्य-सम्बंधी नियमों पर आधारित है और स्थानीय पंचांग-गणना के भिन्न सिद्धांतों के बावजूद निर्णय का तात्पर्य एक समान ही रहता है।
सोशल मीडिया और मिथक — सावधानी आवश्यक
आधुनिक संचार माध्यमों ने जानकारी का प्रवाह तेज कर दिया है, परन्तु इसी के कारण कई बार असत्य या आधूरा ज्ञान भी व्यापक रूप से फैल जाता है। बहुगुणा जी ने चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया पर फैलने वाली कुछ सूचनाएँ हास्यास्पद भ्रम पैदा कर देती हैं और हमारी सनातन परंपराओं का उपहास बनने का कारण बन सकती हैं। अतः तिथियों के विषय में अंतिम निर्णय लेने से पहले विश्वसनीय पंचांग एवं पंडित-गणना का परामर्श लेना बुद्धिमानी है।
इस वर्ष की तिथियाँ — (व्योरणात्मक विवरण)
वयोवृद्ध ज्योतिषाचार्य ने वर्ष के संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेख किया कि —
- धन्वंतरि जयंती और उसके प्रभाव के कारण त्रयोदशी की रात को यमदीप/यम-दीप का उल्लेख रहता है और धन्वंतरि जयंती अपराह्न में मनायी जाती है।
- इस वर्ष रूप चौदस एवं मास शिवरात्रि व्रत के कारण तिथि-क्रम थोड़े जटिल बन गये हैं; इसलिए नरक-चतुर्दशी 20 अक्टूबर और शास्त्रसम्मत लक्ष्मी पूजन 21 अक्टूबर निर्धारित है।
- अतः गोवर्धन पूजा 22 अक्टूबर और भैया दूज 23 अक्टूबर को मनाने का निर्धारण शास्त्रीय व सामूहिक परिपाटी के अनुरूप है।
(नोट: ऊपर दी गई तिथियाँ वार्षिक पंचांग और स्थानिक गणना पर निर्भर करती हैं; स्थानीय पंचांग से अंतिम पुष्टि आवश्यक है।)
तिथ्य-विवाद का सामाजिक-पारस्परिक परिणाम
बहुगुणा जी का रोष इस बात पर है कि जब भी धार्मिक-विचारों में असमंजस पैदा होता है, किसी न किसी का उद्देश्य लोगों को विभाजित करना ही बन जाता है। वे कहते हैं कि तीज-त्यौहारों को लेकर रची गयी षड्यंत्रकारी सूचनाएँ समाज को आपस में उलझा देती हैं — और हम अक्सर उस जाल को भाँप नहीं पाते। इसलिए सतर्कता और गहन चिंतन दोनों आवश्यक हैं — खासकर वे विषय जिनसे समाज की एकता, परंपरा और सार्वभौमिक सौहार्द प्रभावित हो सकते हैं।
पर्व का सन्देश — केवल विधि नहीं, भावना भी आवश्यक
बहुगुणा जी की यह अंतिम और सार्थक बात त्यौहार के वास्तविक उद्देश्य की ओर संकेत करती है — दीपावली खुशी, दान, सहानुभूति और सामाजिक समरसता का पर्व है। उनका सन्देश है कि:
- “भगवान की कृपा से भारत में सदैव खुशहाली रहे; हर दिन दीवाली हो।”
- किसी भी व्यक्ति को भूखा या नंगा नहीं सोने देना — यही हमारी सच्ची परंपरा है।
यदि हम इस भावना को अपनाएं, तो असल प्रगति वही होगी।
व्यावहारिक सुझाव — श्रद्धा के साथ विवेक
वयोवृद्ध ज्योतिषाचार्य का यह भी सुझाव है कि:
- पंचांग और पंडित-पुष्टि: तिथि-निर्धारण के लिए स्थानीय पंचांग या अनुभवी पंडित से पुष्टि लें।
- सोशल मीडिया पर अनावश्यक बहस से बचें: धार्मिक विषयों में अप्रामाणिक सूचनाओं को आगे न बढ़ाएं।
- त्योहारों का अर्थ समझें: केवल आराधना ही नहीं, सामाजिक दायित्व और सेवा भी त्यौहार का मूल हैं।
- शांतचित्त विवेचना अपनाएँ: जब तिथि-विवाद हो, तो शास्त्रों और परम्परागत गणना का सम्मान पूर्वक पालन करें।
आध्यात्मिकता, परम्परा और विवेक का समन्वय
वयोवृद्ध ज्योतिषाचार्य श्री हर्षमणी बहुगुणा का संदेश स्पष्ट और प्रेरणादायक है — दीपावली और उससे संबंधित तिथियों का निर्धारण शास्त्रों व पंचांग पर आधारित है; किन्तु त्योहारों का असली सार मानवता, सहयोग और भागीदारी में निहित है। इसलिए तिथ्य-भ्रमों से उपजी शंकाएँ और सोशल मीडिया के फैलाव से उत्पन्न गलतफहमियाँ हमें अपनी सांस्कृतिक संवेदनशीलता और एकता से विचलित न करें।
“यदि हमारी भावना यही रहे कि कोई भी व्यक्ति भूखा न सोएँ और कोई भी व्यक्ति नंगा न रहे — तो हमारी संस्कृति का सर्वोच्च लक्ष्य पूरा होगा। तब ही हम सतत प्रगति के पथ पर अग्रसर रहेंगे।”
आप सभी को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं!
🪔 यह पावन पर्व आपके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और ज्ञान का प्रकाश फैलाए।
ईश्वर करें हर घर में खुशहाली हो, हर हृदय में दीप जले,
और हर दिन दीपावली जैसा मंगलमय बने। 🌟
लेखक: वयोवृद्ध ज्योतिषाचार्य श्री हर्षमणी बहुगुणा (उद्धरण और विचार)
रिपोर्ट/संपादन: Kedar Singh Chauhan ‘Pravar’ — सरहद का साक्षी
