माँ ज्वाल्पा देवी के आशीर्वाद से आरंभ होगा नौ दिवसीय सप्तचंडी महायज्ञ — देवी उपासकों और ग्रामीणों में धार्मिक उत्साह, 30 अक्टूबर को होगा विशाल भंडारा।
माँ ज्वाल्पा देवी के आशीर्वाद से आरंभ होगा नौ दिवसीय सप्तचंडी महायज्ञ
गजा : डी.पी. उनियाल (SKS News)
विकासखंड नरेंद्रनगर की पट्टी क्वीली के अंतर्गत स्थित माँ ज्वाल्पा देवी मंदिर, दाबड़ा (क्वीली) में आगामी 22 अक्टूबर से 30 अक्टूबर 2025 तक नौ दिवसीय सप्तचंडी महायज्ञ का भव्य आयोजन किया जा रहा है। माँ ज्वाल्पा देवी की पवित्र डोली के उपासक चंडी प्रसाद सेमल्टी ने जानकारी दी कि यह आयोजन माँ के ही निर्देश और प्रेरणा से संपन्न हो रहा है।
उन्होंने बताया कि नौ दिनों तक मंदिर परिसर में पूजा-पाठ, हवन, देवी आह्वान और भंडारा सहित विविध धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा, जिसमें सैकड़ों भक्तों की उपस्थिति की संभावना है।
धार्मिक उत्सव का माहौल, ग्रामवासी जुटे तैयारियों में
दाबड़ा (क्वीली) क्षेत्र में इन दिनों धार्मिक उत्साह का वातावरण व्याप्त है। गाँव-गाँव के श्रद्धालु माँ ज्वाल्पा देवी के इस विशेष अनुष्ठान की तैयारी में जुटे हुए हैं। प्रधान ग्राम पंचायत दाबड़ा सुरेश कोठारी, दिलमणी कोठारी, और चंडी प्रसाद सेमल्टी (उपासक) के मार्गदर्शन में मंदिर परिसर को सुसज्जित किया जा रहा है।
ग्रामीणों के सहयोग से सफाई, सजावट, विद्युत व्यवस्था और श्रद्धालुओं के बैठने हेतु विशेष व्यवस्था की जा रही है। आयोजन समिति ने बताया कि यह यज्ञ केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि श्रद्धा, सेवा और एकता का प्रतीक होगा।
क्या है सप्तचंडी महायज्ञ का महत्व?
हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार सप्तचंडी महायज्ञ अत्यंत शक्तिशाली और कल्याणकारी अनुष्ठान माना जाता है। इसमें दुर्गा सप्तशती के 700 श्लोकों का पाठ किया जाता है, जिनमें माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की स्तुति और उनके द्वारा असुरों के विनाश का वर्णन है।
इस यज्ञ को सम्पन्न करने से न केवल भक्तों के जीवन से नकारात्मक ऊर्जाएँ दूर होती हैं, बल्कि समाज में शांति, समृद्धि और सौहार्द का संचार होता है। ऐसा माना जाता है कि सप्तचंडी पाठ करने से माँ भगवती शीघ्र प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों को मनोकामना पूर्ण करती हैं।
22 अक्टूबर को होगा शुभारंभ, जौ बोई जाएगी हरियाली के रूप में
यज्ञ का शुभारंभ 22 अक्टूबर को भक्तों के सामूहिक संकीर्तन और जौ बोने की परंपरा के साथ किया जाएगा। यह ‘हरियाली बोई’ देवी पूजन का प्रतीकात्मक प्रारंभ है, जो शुभता, समृद्धि और नई ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है।
इस अवसर पर मंदिर परिसर में सुबह से ही विशेष पूजा, कलश स्थापना और गणेश पूजन के साथ यज्ञ की औपचारिक शुरुआत होगी।
मुख्य पुजारी पंडित राजेश गैरोला शास्त्री के निर्देशन में पांच आचार्यों की टीम द्वारा नौ दिनों तक नियमित पूजा-पाठ, हवन, दुर्गा सप्तशती पाठ और आरती आयोजित की जाएगी।
ढोल-दमाऊं की गूंज में देवी का आह्वान
दाबड़ा क्षेत्र में देवी आराधना की परंपरा सदियों पुरानी है। इस आयोजन में भी पारंपरिक ढोल-दमाऊं की गूंज देवी के आह्वान को और अधिक भव्य बनाएगी।
खांड क्षेत्र के सुप्रसिद्ध ढोल वादकों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया है, जो प्रतिदिन यज्ञ स्थली पर लोकधुनों और देवी वंदनाओं की स्वर लहरियां बिखेरेंगे।
देवी आराधना के दौरान भक्तजन पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य-कीर्तन करते हुए वातावरण को भक्तिमय बनाएंगे।
भक्तों को आमंत्रण, 30 अक्टूबर को विशाल भंडारे का आयोजन
आयोजन समिति ने क्षेत्र के सभी श्रद्धालुओं, देवी उपासकों और ग्रामवासियों से इस दिव्य आयोजन में सम्मिलित होने का आग्रह किया है।
महायज्ञ का समापन दिवस 30 अक्टूबर को बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन विशाल भंडारे और प्रसाद वितरण का आयोजन रखा गया है, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालु सम्मिलित होंगे।
भंडारे की तैयारी के लिए स्थानीय ग्रामीण महिलाएँ और स्वयंसेवी रसोइए मिलकर पारंपरिक व्यंजनों को तैयार करेंगे। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक होगा बल्कि सामाजिक एकता और सद्भाव का भी संदेश देगा।
माँ ज्वाल्पा देवी: श्रद्धा और आस्था की प्रतीक
माँ ज्वाल्पा देवी को शक्ति स्वरूपा, रक्षा करने वाली और मनोकामना पूर्ण करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। कहा जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से माँ की आराधना करता है, उसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।
क्वीली पट्टी का यह मंदिर स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और लोकसंस्कृति का केंद्र है। नवरात्रों और विशेष पर्वों पर यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
धर्म और संस्कृति का संगम
यह आयोजन टिहरी जनपद की उस जीवंत संस्कृति का उदाहरण है जहाँ धर्म, लोककला और परंपरा एक साथ जीवित हैं। सप्तचंडी महायज्ञ के दौरान ग्रामीण न केवल पूजा-पाठ में भाग लेंगे, बल्कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों, भजन संध्याओं और सामूहिक सेवा कार्यों में भी योगदान देंगे।
इस अवसर पर मंदिर समिति द्वारा आसपास के गाँवों को साफ-सुथरा रखने, पर्यावरण संरक्षण और प्लास्टिक मुक्त आयोजन की अपील भी की गई है।
धर्म से प्रेरित सेवा भावना
प्रधान ग्राम पंचायत दाबड़ा के सुरेश कोठारी ने बताया कि “माँ ज्वाल्पा देवी के इस आयोजन का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में एकता, सहयोग और सेवा की भावना को मजबूत करना भी है।”
उन्होंने कहा कि देवी पूजा के माध्यम से समाज में सकारात्मकता फैलाना और युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना ही इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य है।
आस्था का पर्व, जन-जन का निमंत्रण
माँ ज्वाल्पा देवी मंदिर दाबड़ा (क्वीली) में आयोजित होने वाला यह नौ दिवसीय सप्तचंडी महायज्ञ न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह देवभूमि उत्तराखंड की जीवंत लोकसंस्कृति का प्रतीक भी है।
माँ के चरणों में आराधना, भक्ति, संगीत और सामूहिकता का यह संगम हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो धर्म के माध्यम से जीवन में सकारात्मकता चाहता है।
“माँ ज्वाल्पा देवी की कृपा से यह यज्ञ क्षेत्र में सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और शांति लेकर आए।”
