
[su_button background=”#881c0a” color=”#fffffe” size=”2″ radius=”5″ text_shadow=”0px 0px 0px #000000″]सरहद का साक्षी @ कवि: सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_button]
सब चले ! मनाने आज हरेला,
लोक पर्व उत्तरांचल तरु मेला।
श्रावण मास -संक्रांति तिथि से ,
चले एक पखवाड़ा यह मेला।
आज वृक्ष लगाने वालों का रेला।
लगे ज्यों दीपावली के गढ़ भैला।
वृक्षारोपण कार्य है बहुत जरूरी ,
है कोई नहीं यह चिंता – मजबूरी।
एक पेड़ तुम भी अवश्य लगाओ,
फिर जीवन भर पावन सुख पाओ।
शुद्ध समीर ,जल छाया सुख पाओ,
प्राणवायु संग मीठे कंद फल खाओ।
विद्यालयों में भी आज पर्व हरेला ,
वृक्षारोपण कार्य यह रहे न अधूरा।
एक वृक्ष मेरा भी हर वर्ष समर्पित।
स्व. कुंवर प्रसून के नाम है अर्पित।
स्मृति जयंती मनाई थी बीते कल।
वृक्ष लगाया आज हरेला पर्व पर।
वृक्षारोपण कार्य यह सत्य सनातन,
परंपरा गतिमान यह सिद्ध अद्यतन।
एक पेड़ एक जन जब लगवाएगा,
समझो ! हरेला उत्सव तब भायेगा।
छायादार, शोभादार हम पेड़ लगाओ,
फलदार वृक्ष से तुम मीठे फल खाओ।
- कवि कुटीर, सुमन कॉलोनी चंबा, टिहरी गढ़वाल।
