कार्तिक पूर्णिमा का यह दिन चातुर्मास व्रत का समापन, त्रिपुरी पूर्णिमा, देव दीपावली, भीष्म पंचक समाप्ति और भगवान विष्णु के मत्स्यावतार की स्मृति से जुड़ा है। आज के जप, दान और दीपदान का फल दस यज्ञों के समान माना गया है।
आज कार्तिक पूर्णिमा का पावन दिवस है — जिसे त्रिपुरी पूर्णिमा, देव दीपावली, भीष्म पंचक समाप्ति, और गुरु नानक देव जी के जन्म दिवस के रूप में श्रद्धा व भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन चातुर्मास व्रत के समापन का प्रतीक है। सनातन धर्म की मान्यता है कि आज के दिन किए गए जप, दान और दीपदान से दस यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है।
पद्म पुराण में उल्लेख है —
“वरा्न् दत्वा यतो विष्णु र्मत्स्यरूपोऽभवत् ततः। तस्यां दत्तं हुतं जप्तं दशयज्ञफलं स्मृतम्॥”
अर्थात्, इस दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण किया था, अतः इस दिन का दान, हवन या जप दस यज्ञों के फल के समान होता है।
आज का दिन न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह हमें स्मरण कराता है कि हम अज्ञानता के अंधकार को दूर कर ज्ञान के प्रकाश को अपने भीतर स्थापित करें। दीप प्रज्वलन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि यह हमारे जीवन और समाज से अंधकार, अज्ञान और कलुषता को मिटाकर सद्बुद्धि, सुख, समृद्धि और मन की शांति की दिशा में अग्रसर होने का प्रतीक है।
सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना इस दिन के केंद्र में है —
“क्या रखा है इस असार संसार में? अपना कुछ नहीं, फिर भी हम उसे अपना समझते हैं। श्रेष्ठ वही है जो बिना दिखावे के परोपकार करता है। अपने लिए तो पशु-पक्षी भी जीते हैं, किंतु जो दूसरों के लिए त्याग करता है, वही सच्चे अर्थों में महान है।”
कार्तिक पूर्णिमा का खगोलीय योग:
यदि कार्तिक पूर्णिमा के दिन कृतिका नक्षत्र और सूर्य विशाखा नक्षत्र में हों, तो इसे पद्मक योग कहा जाता है। आज सूर्य विशाखा नक्षत्र में विद्यमान हैं, अतः यह योग अत्यंत दुर्लभ एवं पुण्यदायी माना गया है।
“विशाखासु यदा भानुः कृतिकासु च चन्द्रमा। स योगः पद्मको नाम पुष्करे स्वाति दुर्लभः॥”
पुण्य कर्मों का महत्व:
आज के दिन गंगा स्नान, दीपदान, सूर्य स्तोत्र और गुरु स्तोत्र का पाठ अत्यंत फलदायी है। श्रद्धालु पीपल वृक्ष, तुलसी के पौधे और देवालयों में दीप प्रज्वलित करते हैं। आत्मकल्याण चाहने वाले व्यक्ति सूर्य और गुरु ग्रह से संबंधित वस्तुओं का दान अवश्य करते हैं।
चन्द्र दर्शन के समय छः कृतिकाओं — शिवा, प्रीति, संभूति, अनसूया, क्षमा और सन्तति — का पूजन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
आज का यह दिवस आत्मचिंतन और ईश्वर तत्व की खोज के लिए भी प्रेरित करता है।
भगवद्गीता का यह उपदेश हमें स्मरण दिलाता है—
“इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥”
अर्थात्, आत्मा बुद्धि से भी श्रेष्ठ है, और भौतिक पदार्थों की कोई स्थायी अहमियत नहीं है।
इस प्रकार कार्तिक पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन का आध्यात्मिक उत्सव है — जो हमें ज्ञान, दया, दान और परोपकार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
♦प्रस्तुतिः आचार्य श्री हर्षमणी बहुगुणा
