करवाचौथ कविता: मेरा करवा चौथ सदा तुम…!
कल 24 अक्टूबर को करवा चौथ का व्रत था, देश की अनेकानेक सुहागिनों ने करवा चौथ का निर्जल व्रत कर भगवान गणपति से अपने सुहाग के रक्षार्थ कामना की। जाने माने कवि व साहित्यकार सोमवारी लाल सकलानी, निशांत द्वारा करवाचौथ के मौके पर सपत्नीक केक काटकर निम्न कविता की रचना की गई, प्रस्तुत है उनकी यह रचना। सरहद का साक्षी की और से उनको सपत्नीक सपरिवार हार्दिक बधाई!
मेरा करवा चौथ सदा तुम,
शरद पूर्णिमा दूज सदा तुम।
जीवन का संगीत सदा तुम,
खुशहाली का दीप सदा तुम।
मेरा करवाचौथ सदा तुम।
नित जीवन का स्पंदन तुम,
सुरलय ताल प्राण सदा तुम।
प्राण वायु रस धार प्रेम तुम,
तन मन का शुचि दर्पण तुम।
मेरा करवाचौथ सदा तुम।
शाश्वत प्रेम का प्रवाह नित तुम,
कैवल्य प्रेम की राधा हो तुम।
पारिजात से भी सुंदरतम तुम,
और हृदय का मधुर- राग तुम।
मेरा करवाचौथ सदा तुम।
चांद चंद्रमा उज्जवल किरण तुम,
सुंदरता की निश्छल मूर्ति सदा तुम।
देह -प्राण तन मन का अद्भुत नाता,
शुचि वैवाहिक प्रेम निभाती हो तुम।
मेरा करवाचौथ सदा तुम।
आशा है ‘करवाचौथ’ पर रचित इस काव्य कृति को आप पसंद करना चाहेंगे और अपने शुभचिंतकों, काव्य प्रेमियों व रचनाकारों के बीच साझा करेंगे।
