कुम्भ पर्व १९७४ में डोंगरे महाराज के साथ एक सौ आठ कथा व्यासों में सर्वोपरि था दर्शन लाल बहुगुणा का स्थान
In the Kumbh festival of 1979 with Dongre Maharaj, the place of Darshan Lal Bahuguna was paramount in one hundred and eight stories
प्रस्तुति: हर्षमणि बहुगुणा,
सरहद का साक्षी,
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा, समाधिस्थस्य केशव:। स्थित धी: किं प्रभाषेत, किमासीत ब्रजेत किम्।।
“भागवत भूषण, आयुर्वेदाचार्य, निरभिमानी, ‘स्वयं को गढ़ने का दृढ़ संकल्प’ के धनी प्रात: स्मरणीय पं० श्री दर्शन लाल बहुगुणा जी हमारे गांव साबली की विभूति ही नहीं अपितु ‘समाज के प्रेरणा स्रोत‘ भी थे।
आज उनकी पुण्यतिथि है। ४ अक्टूबर सन् २००४ को इस अनित्य संसार में अपना भरा पूरा परिवार छोड़ कर अपने पिताश्री, श्री नागेन्द्र दत्त बहुगुणा जी व अपने परपिता श्री वासबा नन्द बहुगुणा जी के श्री चरणों में इस गांव व समाज को अर्पित सेवा का विवरण देने हेतु अन्तिम विदाई ली।
अपने चार भाइयों श्री लोका नन्द व श्री महेशानंद जी के बाद आपका आगमन इस गांव की छवि को निखारने के लिए हुआ, आपके अनुज श्री कला निधि बहुगुणा जी भी गांव की विशिष्ट विभुतियों में गिने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य करने के बाद राजकीय सेवा को प्राथमिकता न देकर, पंजीकृत चिकित्सक होने के बाद भी छोटी काशी की संस्कृति को आगे बढ़ाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
आपका अवतरण जनवरी १९१५ में इस गांव की पवित्र माटी में हुआ। छोटी अवस्था में पं० महेश्वरानंद बहुगुणा जी ने आपकी रुचि से भिन्न कथावाचक हेतु आपको प्रेरित कर अपने घर पर अपनी सु पौत्री के विवाहोपलक्षित भागवत पारायण करवा कर इस क्षेत्र में पदार्पण करवाया। आपके द्वारा सहस्त्राधिक भागवत कथायें जन समुदाय के लाभार्थ कही गई।
लोभ-लालच रहित अनेक कथाओं में उपार्जित द्रव्य विद्यालयों के संचालनार्थ समर्पित किया। मेरे गांव में आपकी प्रेरणा से अनेक उत्कृष्ट कथा वक्ता हैं। मेरे मित्र पं० श्री महावीर प्रसाद उनियाल जी के आमंत्रण पर आपने उनके यहां भी कथावाचन किया, ईश्वर कृपा से मुझे भी वहां जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
कुम्भ पर्व १९७४ में डोंगरे महाराज के साथ एक सौ आठ कथा व्यासों में आपका स्थान सर्वोपरि था। आज आपके तीनों सुपुत्र श्री अनन्त नारायण बहुगुणा, श्री बालमुकुन्द बहुगुणा व श्री इन्द्र मोहन बहुगुणा जी राजकीय सेवा से सेवा निवृत्त होकर आपकी कीर्ति पताका फहराने में अग्रसर हो रहे हैं।
ऐसी दिवंगत विभूति को मैं विनम्र श्रद्धांजली अर्पित करते हुए कोटि-कोटि नमन करता हूं, – क्योंकि वे –
वह पथ क्या, पथिक परीक्षा क्या? जिस पथ पर बिखरे शूल न हों। नाविक की धैर्य परीक्षा क्या?यदि धाराएं प्रतिकूल न हों।।
“स्व निर्माण की प्रक्रिया विश्व का सबसे कठिन कार्य माना जाता है। यह भी आश्चर्य नहीं कि इस मार्ग पर कम ही लोग चलते हैं। उनमें से कुछ ही लोग अन्तिम मंजिल तक पहुंच पाते हैं। कर्म करने की स्वतंत्रता मानव को पूरी तरह से है मात्र उसके चयन का अधिकार पूरी तरह से नहीं है।
आपकी छवि प्रखर तेजस्विता और सर्वस्व न्यौछावर करने के सिद्धांत से युक्त थी। “यह मेरी अवधारणा है। *आपने वह कर दिखाया जो किसी ने नहीं किया। यह भी प्रतीत होता है कि आपको –
न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु:। प्राप्तस्य योगाग्नि मयं शरीरम्।
“आपके गुण, कर्म, स्वभाव, विद्वता के विषयक यह अल्पज्ञ क्या कह सकता है फिर भी सूर्य को दीपक दिखाते हुए सभी ग्राम वासियों की ओर से श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए भावभीनी श्रृद्धांजलि समर्पित इस प्रार्थना के साथ कि इस क्षेत्र व इस गांव वासियों का मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे। कोटि-कोटि नमन के साथ इस जन की दृष्टि में तो आप –
“यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:, तत्र श्री र्विजयो भूतिर्धुर्वा नीतिर्मतिर्मम।।”
हमारे लिए आप योगेश्वर श्रीकृष्ण से भी बढ़कर है, अतः हमारा पथ प्रशस्त करने में कोई कमी न आने दें।
