[su_highlight background=”#880930″ color=”#ffffff”]सरहद का साक्षी @आचार्य हर्षमणि बहुगुणा[/su_highlight]
आज कल पितृपक्ष में सनातनी लोग अपने पितरों को जलाञ्जली से तर्पण करते हैं, तर्पण में समर्पण है साथ ही अर्पण भी है, तर्पण के लिए गाय का दूध, कुश, तिल व सफेद फूल आवश्यक हैं। दूध गाय का चाहिए, वैसे दूध गाय का ही होता है पर आजकल डेयरी में न जाने कैसा कैसा दूध मिलता होगा राम ही जानें।
गाय के दूध से गायों की दुर्दशा की कुछ बानगियां देखी तो रूह कांप जाती है। एक दिन ऋषिकेश जाते समय रास्ते में कुछ गोवंश दिखाई दिया तो खाली मस्तिष्क में आया कि कितना गोवंश मिलता है, गिनना प्रारम्भ किया तो भद्रकाली पहुंचते पहुंचते गिनती एक सौ चालीस से उपर हुई। तब खयाल आया कि जिस धेनु की हम पूजा करते हैं उसकी यह दुर्दशा? क्या होगा हमारा? आज मानव भौतिक प्रगति की चाह में अन्धा होकर दौड़ता हुआ व्यक्तिगत सुख सुविधाओं के लिए असत्य, अकल्याणकारी और असुन्दरता की गहरी खाई में या उस दल-दल में फंसता जा रहा है।
हमारे देश में मनीषियों की कमी नहीं है और एक से बढ़कर एक उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं, तभी तो कहा भी गया है कि-
चिरागों को मुहब्बत है, विहसते इन उजालों से।
मकां अपना पराया हो, नहीं रिश्ता दिवालों से।।
हमेशा रोशनी देते, भले ही आंधियां आयें।
ज़िन्दगी तक फना करते, नहीं डरते सवालों से।।
कहने का अभिप्राय यह है कि जिस गौ को हमने माता माना आज वह सड़क पर लावारिस हालत में भूखी-प्यासी भटकने के लिए विवश है और हम यह सोच रहे हैं कि हमारा क्या? जब हम गाय दान करते हैं तो बहुत फक्र से कहते हैं कि –
*चत्वार: सागरा: पूर्णा धेनुनां स्तनमंडले* ।
*अमृतं स्रवते नित्यं पिबंति सुर मानवा: ।।*
*गवामंगेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश* ।
*यस्मात्तस्माच्छिवं मे स्यादिह लोके परत्र च ।।
इतना ही नहीं हमारी कामना रहती है कि –
*गावो ममाग्रत: सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठत:* ।
*गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम्* ।।
आज आवश्यकता है अपने आचरण से सच्चरित्रता का पाठ पढ़ाने वाले विद्वानों की!
“हमारे पुराण, वेद, उपनिषद्, स्मृतियां गोमाता के महत्त्वपूर्ण आख्यानों से भरे पड़े हैं, हम चुन-चुन कर उदाहरण भी दिया करते हैं पर न उनकी सेवा करते हैं, न संरक्षा करते हैं। जिस प्रकार भगवान नित्य हैं उसी प्रकार गाय भी नित्य हैं क्योंकि गौमाता भगवान की पोषण करने की शक्ति है। लगभग सभी पुराणों में वर्णित है कि गौमाता का प्राकाट्य समुद्र मंथन से हुआ।
वर्णन मिलता है कि समुद्र मंथन से सुरभी मां के साथ पांच गायें उत्पन्न हुई, जिन्हें लोक माता कहा गया और यज्ञ की साधन भूत इन गायों को ऋषियों को दिया गया। कामधेनु स्वर्ग में इन्द्र को दी गई तथा अन्य नन्दा जमदग्नि ऋषि को, सुभद्रा भरद्वाज ऋषि को, सुरभी वशिष्ठ ऋषि को, सुशीला असित ऋषि को तथा बहुला गौतम ऋषि को दी गई। गौमाता की कृपा से ऋषियों ने यज्ञ सम्पन्न कर समूची सृष्टि को उपयोगी पदार्थों से परिपूर्ण किया।
गाय का दूध जरा, मरण व श्रम नाशक अमृत है। क्षीर सागर बनने का भी तो एक रहस्य है कि श्रीदामा ने दूध का पात्र भगवान श्री कृष्ण को दिया श्री कृष्ण के हाथ से वह पात्र गिर गया व फूट गया। जिस कारण दूध के गिरने से एक दूध का तालाब बन गया और वही तालाब गोलोक में क्षीरसागर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसी सुरभी गाय के रोमों से असंख्य गायों का प्रादुर्भाव हुआ। कहा जाता है कि सुरभी गाय का प्राकाट्य कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को हुआ। दूध तुरन्त शक्ति प्रदान करने वाला होता है।
“सद्यो बलकर: पय:”
गाय के विषयक जानकारी बहुत अधिक है और सभी उसकी जानकारी को रखते भी हैं पर आज कोई गाय का पोषण नहीं कर पा रहा है, न जाने क्या क्या कारण होंगे। एक बार किसी सज्जन के जन्मोत्सव पर उन्होंने गाय दान की व यह भी कहा कि आज मेरा तिरपनवां जन्म दिवस है हर जन्मोत्सव पर एक गाय दान करता हूं, उनकी बात में कितनी सच्चाई थी यह तो मानसिक अशान्ति का विषय है पर इतना निर्विवाद सत्य है कि गाय सेवा, गाय दान का अपना महत्व है।जिसे आज हम भूलते जा रहे हैं।
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मेरा मन भी गायों की दुर्दशा को देख कर अशान्त है और यह चाहता हूं कि इस मां की सेवा करने का सुअवसर प्राप्त होता तो कितना अच्छा होता। पर सेवा प्रारम्भ करने के लिए दो तीन सुयोग्य पुरूषों की आवश्यकता होगी, जगह की आवश्यकता है, परन्तु कहीं ऐसा कार्य क्रम बनाया व उन गौशालाओं की तरह ही हुआ कि जब तक राजकीय अनुदान मिल रहा है तब तक नाम मात्र की दो चार गाय रखी व अनुदान शताधिक का लेते रहे और फिर गायों को उनके हाल पर तड़पने के लिए लावारिस छोड़ दिया, कितना अधिक पाप लगेगा सोच कर रूह ही कांप जाती है। पर एक चिन्तन है कि गायों को इस हाल से उबारने की जरूरत है, यदि हम इस प्रयास में सफल होते हैं तो ये सब महामारियां, आपदाएं निश्चित रूप से दूर हो जाएंगी। तो जुड़िए इस मुहिम से और कीजिए! कामधेनुओं की संरक्षा, बहुत बड़ा सौभाग्य होगा हमारा और हमारे देश का अगर हम निस्वार्थ भाव से गौमाता की सेवा करते हैं।
आशा है इस विचार पर अवश्य चिन्तन करेंगे व इसे कार्य रूप में परिणत भी करेंगे। आज के लिए इतनी ही प्रार्थना। कृपया अपने धर्म की महानता के लिए कुछ न कुछ सहयोग करने की कोशिश कीजिएगा।
