[su_button background=”#063f0d” color=”#fffffe” size=”2″ text_shadow=”0px 0px 0px #000000″]सरहद का साक्षी @कवि : सोमवारी लाल सकलानी, निशांत[/su_button]
चार वर्ष चार माह वह, सुखा भास मे लीन,
महा संकट मे माह अब, बचे हुए दिन शेष.
चुनावी साल बेहाल है -यह उत्तरपथ है पस्त,
ख्वाबों में सही,हम अटकल पच्चीसी व्यस्त।
मंहगाई ने कमर तोड़ दी, हम बहुत लाचार,
मध्यम वर्ग के लिए ,तो जीना हुआ -दुश्वार।
रोजगार के लिए , कुछ भी तो करो सरकार,
जग मे महामारी व्याप्त है,कोरोना का काल।
धामी आ गए रेस में, है कितने दिन की ऐश!
परिवर्तन का अब दौर है,बदल रहें सब भेष।
एक काम अच्छा किया – आए जब सरकार,
हजार बढ़ा दी सेलरी, किया अतिथि सत्कार।
भू – कानून पर गौर करो,तर्ज हिमाचल राज,
क्या उत्तरांचल मे है नहीं, जरूरी यह काज।
पूर्ण बहुमत सरकार है, अच्छा मौका आज,
कल की जाने कौन है, किसका है होता राज।
सात माह के समय में,सुभाष किए परीक्षा पास,
आई सी एस बन गए, क्या है नहीं उन पर नाज ?
भू कानून बना लागू करो,रखो उत्तराखंड का मान,
वोट बढ़ाने के लिए, इससे अच्छा नहीं कोई काम।
जो जन हित कुछ कर दिया, मिले उसी को वोट,
समय रहते काम करो, बरना राजनीति मे खोट !
मंहगाई से जन त्रस्त हैं, दिल पर यह गहरी चोट,
मुफ्त का चक्कर छोड़ दो,मिलें काम के ही नोट।
* कवि कुटीर, सुमन कॉलोनी चंबा,टिहरी गढ़वाल

